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समाचार पत्र: कल और आज

– बसु जैन||

समाज से गहरे जुड़ाव और उसका प्रतिबिंब प्रस्तुत करने के कारण समाचार पत्रों को समाज का दर्पण कहा गया है। सामाजिक जीवन में दिन-प्रतिदिन घटने वाली घटनाओं का ब्योरा और उन पर निष्पक्ष टिप्पणियां प्राप्त होने से समाचार पत्रों पर आज हमारी निर्भीरता बढ़ गई है। समाचार पत्रों की भी भूमिका पर विचार करना आज प्रत्येक नागरिक के लिए आवश्यक हो गया है।

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इतिहास के पन्नों को पलटकर देखें तो पता चलता है कि हर युग में समाचार पत्रों ने अपनी ठोस और व्यवहारिक पहचान बनाई है। समाज में जब भी कोई क्रांति होती है या कोई नया परिवर्तन होता है, तब समाचार पत्र को एक बड़े सहायक के रूप में खड़े हो जाते हैं। समाचार पत्र एक ऐसा साधन हैं, जिसके माध्यम से कोई दल या विचारधारा सूदूर बैठे लोगों तक अपने विचारों को पहुंचा सकता है।
इतिहास गवाह है कि विश्व के दो विनाशकारी युद्धों के दौरान लोगों को समाचार पत्रों ने एक ओर मनोबल ऊंचा उठाए रखा तो दूसरी ओर किसी खास क्षेत्र के लोगों के मानस को कुचलने का काम भी किया। इससे प्रतीत होता है कि समाचार पत्र किसी को उठाते हैं तो उसको गिरा भी सकते हैं।
आज विविध तरह के रोचक, रहस्यमय और तथ्यात्मक सामग्री का संवाहक होने के कारण समाचार पत्रों को सूचना और जानकारियों का सबसे श्रेष्ठ और शक्तिशाली स्रोत माना जाता है। समाचार पत्रों के विकास की संघर्षमय कथा पढ़ते समय पता चलता है कि विश्व के अनेकों देशों में एक तरफ जहां उन पर नियंत्रण और प्रतिबंध लगाकर तानाशाही शासन ने जनगण को अंधेरे में रखा तो वहीं दूसरी तरफ जनतंत्रात्मक देशों में जनआकांक्षाओं का सही प्रतिनिधित्व भी समाचार पत्रों के जरिए हुआ।

लेकिन आज के आधुनिक युग में वैज्ञानिक तकनीकों के विकसित होने के बाद समाचार पत्रों की संख्या में जितनी तेजी से वृद्धि हुई है उतनी तेजी से इनकी विश्वसनीयता और प्रमाणिकता में कमी आई है। आज के समाचार पत्र निहित स्वार्थों के पोषक, राजनीति संचालक और लोगों को गिराने और उठाने वाले बन गए हैं। आज पूंजी अखबारों को छोटे और बड़े समाचार पत्रों का दर्जा प्रदान करती है।

बड़े पूंजीपतियों द्वारा निकाले जा रहे समाचार पत्र आज के दौर में तरक्की कर रहे हैं। इन बड़े समाचार पत्रों में वही प्रकाशित होता है, जो मालिक को पसंद होता है। चाहे वह फिर जनसमस्याओं की अनदेखी और जनता के विचारों से खेलने वाली खबर ही क्यों न हो। कहीं-कहीं पर तो संपादक, प्रकाशक, विज्ञापन व्यवस्थापक और रिर्पोटर सब कुछ मालिक ही होता है। ऐसे में सवाल उठता है कि समाज का सशक्त माध्यम कही जाने वाली पत्रकारिता को आखिर किसके हाथों छोड़ा जाए। जो समाचार पत्र समाज का दर्पण कहे जाते हैं, क्या वो आज के दौर में सिर्फ मालिक के हाथों की कठपुतली बनकर रह गए हैं। ऐसे में सोचने वाली बात यह है कि भीविष्य में जनता की नजर में समाचार पत्रों की भीूमिका क्या रह जाएगी? हमें इन समाचार पत्रों की हालत पर सोचने की जरुरत है, नहीं तो पत्रकारिता और समाचार पत्र समाज का आईना नहीं रहेंगें और एक दिन वो आएगा जब जनता का समाचार पत्रों पर से विश्वास उठ जाएगा।

 

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