/कटघरे में सीबीआई की साख..!

कटघरे में सीबीआई की साख..!

-डॉ. आशीष वशिष्ठ||

देश की प्रमुख जांच एजेंसियों में शुमार सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इंवेस्टीगेशन अर्थात सीबीआई का प्रयोग राजनीतिक हित साधने और विरोधियों को औकात में रखने के लिए किया जाना कोई नयी खबर नहीं है. कांग्रेस ब्यूरो ऑफ इनवेस्टीगेशन का तमगा तक सीबीआई को मिल चुका है. विपक्ष शुरू से सीबीआई के दुरूपयोग का आरोप लगाता रहा है, लेकिन सत्तारूढ़ पार्टी और सीबीआई ने हमेशा अपने ऊपर लगे तमाम आरोपों का खण्डन किया है.  लेकिन सीबीआई के पूर्व निदेशक यू एस मिश्रा ने यह बयान देकर कि सीबीआई दबाव में काम करती है, जांच एजेंसी अंदरूनी हालातों, कार्यप्रणाली और राजनीतिक cbi1312630दखलअंदाजी की सारी कहानी बयां कर दी है. प्रोन्नति में आरक्षण के मुद्दे पर सरकार का सहयोग न करने पर केन्द्र सरकार  समाजवादी पार्टी को घेरने के लिए सीबीआई का बेजा इस्तेमाल कर रही है, ये गंभीर आरोप समाजवादी पार्टी ने यूपीए सरकार पर लगाये हैं.  कुछ दिन पहले ही बीएसपी प्रमुख मायावती ने भी राज्यसभा में खुलासा किया था कि सीबीआई का उनके खिलाफ दुरुपयोग किया गया था. लखनऊ की एक सभा पर कांग्रेस पर हमला करते हुए कहा है योगगुरू बाबा रामदेव ने कहा था कि संसद में एफडीआई के मुद्दे पर सरकार को मिली जीत वस्तुत: सीबीआई की जीत है. रामदेव का इशारा सपा और बसपा का इस मुद्दे पर सरकार को समर्थन से था कि इन दोनों ने सीबीआई के डर से सरकार का साथ दिया.

इंटेलीजेंस ब्यूरो [आईबी] के पूर्व निदेशक अजित डोभाल ने भी सत्तासीन दलों द्वारा सरकारी मशीनरी खासकर जांच एजेंसियों के दुरूपयोग का बयान हाल ही में दिया है उन्होंने सीबीआई के पूर्व निदेशक यूएस मिश्रा के बयान का समर्थन भी किया है. डोभाल के अनुसार, सरकारी मशीनरी के दुरूपयोग के मामले में कांगे्रस सबसे आगे रहती है. सीबीआई स्वतंत्र जांच एजेंसी नहीं है ये बयान सीबीआई के पूर्व निदेशक जोगिंदर सिंह भी दे चुके हैं. जांच एजेंसियों के पूर्व आला अधिकारियों द्वारा राजनीतिक हस्तक्षेप, दबाव और दुरूपयोग के बारे में जो बयानबाजी की जा रही है वो सोचने को विवश करती हैं कि हित साधने और स्वार्थ सिद्घि के लिए राजनीतिक दल और नेता किस तरह जांच एजेंसियों को दुरूपयोग करते हैं. वास्तव में जांच एजेंसियां राजनीतिक आकाओं की कठपुतली और अर्दली मात्र बनकर रह गयी हैं. ये स्थितियां जांच एजेंसियों को संदेह के कटघरे में खड़ी करती हैं और यह साबित करती हैं वहीं सरकार की मंशा की पोल भी खोलती हैं कि किस तरह सत्तासीन दल सरकारी मशीनरी को पार्टी का कार्यकर्ता समझते हैं. ये बात प्रमाणित हो चुकी है कि जांच एजेंसियां निष्पक्ष नहीं है और वो राजनीतिक आकाओं के इशारे पर हिलती-डुलती और जुबान खोलती हैं. अब सवाल उठता है कि क्या वास्तव में सीबीआई अब सरकार का एक हथियार बन गई है? जिसका प्रयोग वो अपने राजनीतिक हित साधने और विरोधियों को डराने-धमकाने के लिए करती है. राज्यमंत्री नारायणसामी कहते हैं कि ‘जहां तक सीबीआई की बात है यह एक स्वतंत्र संस्था है जो अपने अधिकार क्षेत्र के भीतर काम करती है और हमारी सरकार की ओर से कोई राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं होता.’ लेकिन असलियत किसी से छिपी नहीं है.

संवैधानिक व्यवस्थानुसार विधायिका का स्थान सर्वोच्च है. ऐेसे में राजनीतिक इच्छाशक्ति के सरकारी मशीनरी एक इंच भी इधर से उधर नहीं होती है. नौकरशाहों से लेकर चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी तक सब गुटों में बंटे हैं. कोढ में खाज का काम वोट बैंक की राजनीति और वोट बैंक को सहेजने की ङ्क्षचता में राजनीतिक दल और नेता अच्छे-बुरे का ख्याल किये बिना हर वो काम करने पर उतारू रहते हैं जिससे उनकी कुर्सी बची रहे और वो सत्ता सुख उठाते रहे. विधायिका की देखादेखी कार्यपालिका भी उसी रास्ते पर चलने लगी है. मलाईदार और पावरफुल पोस्टिंग की चाह में नौकरशाह सत्ता की चौखट पर लेटे दिखाई देते हैं. एक दारोगा रेंक का अधिकारी स्थानीय एमपी और एमएलए के दरवाजे पर अपनी नौकरी बचाने और मलाईदार पोस्टिंग के लिए जितनी भागदौड़ और गणेश परिक्रमा करता है अगर उसका दसवां हिस्सा भी वो ईमानदारी से अपनी डयूटी बजाने में करे तो देश से अपराध और अपराधी खत्म नहीं तो कम तो जरूर हो जाएंगे. लेकिन भ्रष्टï व्यवस्था और उसके पालनहारों ने ऐसी व्यूह रचना रच रखी है कि ईमानदार प्रयास नक्कारखाने की तूती बनकर रह जाते हैं.

जांच एजेंसियों और पुलिस-प्रशासन का बेजा इस्तेमाल नयी बात नहीं है. जांच एजेंसियों के अधिकारी अपने राजनीतिक आकाओं की पसंद और नापसंद के अनुसार ही काम करते हैं. राजनीतिक दबाव, हस्तक्षेप और दखलअंदाजी के चलते यह कह पाना कि जांच एजेंसियां पूर्ण निष्पक्षता, ईमानदारी और जवाबदेही से काम करती है पर बड़ा प्रश्न चिन्ह लगाता है. सीबीआई का राजनीतिक दुरूपयोग तो एक बड़ा मसला है ही वहीं इसकी लचर कार्यशैली और सुस्त रफ्तार भी किसी से छिपी नहीं है. दर्जनों दफा अपनी कार्यप्रणाली के लिए कोर्ट से फटकार खा चुकी सीबीआई की खाल शायद इतनी मोटी हो चुकी है कि उसकी सेहत पर किसी फटकार, आरोप और आलोचना का कोई असर नहीं पड़ता है. आरूषी हत्याकांड, निठारी कांड, उत्तर प्रदेश के एनआरएचएम घोटाले एवं डॉ. सचान हत्याकांड में सीबीआई की नाकामी की कहानी को खुद ब खुद बयां करते हैं.

इतिहास गवाह है कि जब कोई जांच सीबीआई को सौंपी जाती है तो खूब हो-हल्ला मचता है और सीबीआई सुर्खियों में छाई रहती है. लेकिन दो-चार दिन की गहमागामी के बाद सीबीआई केस को ऐसा उलझाती और घुमाती है कि जलेबी और अमरती बनाने वाला हलवाई भी शरमा जाए. 1995 में हरियाणा के यमुनानगर जिले में 12वीं क्लास की छात्रा रेणुका शर्मा की अपहरण, बलात्कार के बाद हत्या कर दी गई थी. केस जांच की जिम्मेवारी सीबीआई को सौंपी गई लेकिन आठ वर्षे तक लगातार जांच करने के बाद जब सीबीआई किसी नतीजे पर न पहुंच पाई तो पंजाब एण्ड हरियाणा हाईकोर्ट ने सीबीआई को कड़ी फटकार तो लगाई ही, वहीं उसकी कार्यप्रणाली और जांच के तरीकों पर एतराज भी जताया. आज इस घटना को 17 वर्ष का लंबा समय बीत चुका है लेकिन रेणुका के माता-पिता को न्याय की प्रतीक्षा है. रेणुका शर्मा जैसे सैंकड़ों अनसुलझे मामले हैं जो सीबीआई के नकारेपन के मुंह बोलते उदाहरण हैं. हालात इस कदर बिगड़ चुके हैं कि नेता संसद में खड़े होकर सरकार पर सीबीआई के दुरूपयोग के आरोप लगा रहे हैं.

जांच एजेंसियों की स्थापना जिस उद्ेश्य से की गई थी आज वो उसमें पूरी तरह नाकाम साबित हो रही हैं. राजनीतिक हस्तक्षेप ने जांच एजेंसियों को पालतू और घरेलु जांच एजेंसी बना दिया है. किसी जमाने में जांच एजेंसियों पर देश की जनता को पूरा भरोसा था. बड़े और गंभीर मामलों में जनता की सीबीआई जांच की मांग करती थी लेकिन अब सीबीआई की साख में गिरावट आ चुकी है और जनता उस पर भरोसा नहीं करती ये कड़वी सच्चाई है. स्वस्थ लोकतंत्र, कानून की रक्षा, अपराधों की रोकथाम और गुनाहगारों को जेल तक पहुंचाने में जांच एजेंसी की भूमिका अहम् होती है. ऐसे में जरूरी है कि जांच और सुरक्षा से जुड़ी एजेंसियों को काम करने की स्वतंत्रता प्रदान की जाए और उन्हें सरकारी और राजनीतिक दबाव और प्रभाव से मुक्त रखा जाए. वहीं जांच एजेंसियों के अधिकारियों को भी राजनीतिक आकाओं की बजाय संविधान और देश की प्रति वफादारी दिखानी चाहिए तभी कानून का राज स्थापित होगा और अपराध कम होंगे.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.