/आखिर क्या कहती है लाबिंग..

आखिर क्या कहती है लाबिंग..

-योगेश कुमार मिश्रा||

सरकार के विधेयक पारित कराने के बाद देश में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश एफडीआई का रास्ता साफ हो गया। यानि आने वाले दिनों में वॉलमार्ट, टेस्को और कार्फूर जैसे सुपर मार्केट के महारथियों का इस्तकबाल भारतीय सरजमीं पर तहेदिल से किया जाएगा। सरकार के मुताबिक एफडीआई देश की अर्थव्यवस्था दुरुस्त करने में सहायक होगी। वहीं किसानों को बिचौलियों से मुक्ति मिलेगी। हालांकि सरकार के ये दावे कितने अफसाने और कितने हकीकत बन पाएंगे,यह तो आने वाला वक्त ही walmartबताएगा। लेकिन सरकारी आंकड़ों के इतर बुनियादी सवाल वही है कि आखिर किसानों को उचित मूल्य दिलाने का दावा करने वाली सरकार को विदेशों के अनुभव कुछ अलग ही कहानी कहते हैं।
लोकसभा में वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा कहते हैं कि एफडीआई से देश में 40 लाख रोजगार के नये अवसर पैदा होगें। दावा है कि अगले तीन वर्षों में वॉलमार्ट 40 लाख कर्मचारियों को भारत में रोजगार देगा।
सरकार के इसी दावे को टटोले तो आज वॉलमार्ट के 28 देशों में जितने कुल स्टोर्स हैं उसकी तुलना में तकरीबन दोगुने स्टोर अकेले भारत में खोलने पड़ेंगे। इसका एक फौरी आंकड़ा लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज दे भी चुकी थी। रिटेल क्षेत्र के चारों टॉप ब्रांड्स का औसत निकाल लिया जाए तो प्रति स्टोर कर्मचारियों की संख्या 117 बनती है। चारों ब्रांड मिलकर वाणिज्य मंत्रालय के रोजगार देने के दावे को पूरा करना चाहें तो उन्हें कुल 34,180 स्टोर्स खोलने पड़ेंगे। वाणिज्य मंत्रालय के रोजगार टारगेट को पूरा करने के लिए हर शहर में औसतन 644 सुपरमार्केट खोलने पड़ेंगे। यह आंकड़े फिलहाल एफडीआई के दिवास्वप्न को हकीकत के धरातल पर लाकर खड़ा करते हैं। दूसरी ओर भारत में विदेशी कंपनियों का बढ़ता लाबिंग कल्चर भी भारतीय बाजारों के लिए खतरे की घंटी से कम नहीं है। टूजी घोटाले में नीरा राडिया का नाम आने से देश की सियासी व्यवस्था के लिए भी बड़ा सवाल खड़ा कर दिया था। इसके बाद बीते दिनों अमेरिकी सीनेट में वॉलमार्ट का भारत में लाबिंग के लिए 125 करोड़ रुपये खर्च करने की स्वाकारोक्ति भी कई सवालों को जन्म देती है।
वॉलमार्ट ने कहा है कि उसने भारत में अपने लिए दरवाजे खुलवाने के लिए साल 2008 के बाद से अब तक अमेरिकी कानून निमार्ताओं के साथ लॉबिंग पर 25 मिलियन अमेरिकी डॉलर यानी करीब सवा सौ करोड़ रुपए खर्च किए हैं। दरअसल अमेरिका में कंपनियां हर माह औसतन 1234 करोड़ रुपये लाबिंग पर खर्च करती है। आंकड़ों के मुताबिक 2011 में अमेरिका में 12,220 लॉबिस्ट पंजीकृत थे।
ट्रांसपरेंसी इंटरनेशनल के मुताबिक कंपनियां अपने फायदे के लिए लाबिस्टों की नियुक्ति करती हैं। कंसास विश्वविद्यालय के अध्ययन के आंकड़ों पर नजर डाले तो बीते सालों में 93 दिग्गज कंपनियों ने लाबिंग पर 1,456 करोड़ रुपये खर्च किए। बदले में तकरीबन 3.2करोड़ का लाभ हुआ। बुसलेन में तकरीबन 15हजार लाबिस्ट यूरोपीय संघ की वैधानिक प्रक्रिया को प्रभावित करने का प्रयास करते हैं। भारत में बढ़ती संभावनाओं को लेकर विदेशी कंपनियां कई वर्षों से बाजार में उतरने को आतुर थी। इनमें वित्तीय सेवा प्रदाता मोर्गन, स्टेनले, न्यूयार्क लाइफ इंश्योरेंस आदि प्रमुख हैं।
दूसरी हकीकत यह भी है कि देश में मनमोहन सिंह की आर्थिक नीतियों ने जिस तरह में देश में आर्थिक विषमताओं को बढ़ाया है। उसने भी सामाजिक सरोकारों पर सवालिया निशान खड़ा किया है। देश में बढ़ती नक्सली समस्या, बुंदेलखंड से लेकर महाराष्ट्र तक आत्महत्या करते किसान भी इसी बढ़ते और तरक्की करते भारत की भयावह तस्वीर है। सरकार के अनुमान के मुताबिक 121 करोड़ आबादी के देश में महज 28 हजार 650 परिवारों के पास देश की कुल तादाद की 42 फीसदी है। यानि आर्थिक सुधार के आसरे काला धन, भ्रष्टाचार और सियासत के सहारे व्यापार में मुनाफा कमाने का जो खेल खेला गया उसने इंडिया और भारत के बीच गहरी खाई पैदा कर दी है। इसे देश के प्रधानमंत्री भी खुले मन से स्वीकार कर चुके हैं। एफडीआई के गिरफ्त में रोजगार गंवाने वाले 6 करोड़ व्यापारी मजदूर बन गए। वहीं महंगाई से आज भी 40 करोड़ जद्दोजहद करती है। विकास के अट्टालिकाओं को गढ़ते 6 करोड़ अपनी ही जमीन से बेदखल हो चुके है। इसको लेकर आज भी अलीगढ़ के टप्पल में किसान आंदोलन होते रहते हैं। विकास की सुनहरे सपनों को सहेजने में 9 करोड़ लोग मनरेगा पर आकर टिक गए हो। वहीं देश के 42 करोड़ लोगों का जीवन महज राशन कार्ड पर ही आधारित रह गया हो। इसके अलावा 6 करोड़ लोग बीपीएल कार्ड के आसरे कैश सब्सिडी की आस देख रहे हैं। अब ऐसे दौर में सियासत भी सामाजिक सरोकार से इतर पूंजी और मुनाफे के बीच नागरिकों को दरकिनार कर महज उपभोक्ताओं की बात करे। तो वाकई बड़ा सवाल खड़ा होता है। कि दावों और दलीलों के बीच कहीं उन गरीबों का भविष्य तो दांव पर नहीं लगाया जा रहा है जिनके आसरे में राजनेता सत्ता की सीढ़ियों पर पहुंचते हैं। धरतीपुत्र, माटी के लाल, गरीबो के हित चिंतक जैसे विश्लेषण भी कागजों और बयानों में सिमटकर रह जाएं। दरअसल, सवाल महज लाबिंग और रिश्वत का नहीं रहा बल्कि असल सवाल उस सियासत पर जाकर आ टिका है जहां एक लाख 76 हजार करोड़ के घोटाले को भी सियासी रहनुमा दलीलों के आसरे जीरो लॉस की थ्योरी पर लाकर खड़ा कर देते है। जहां औने-पौने दामों पर कोयले की खदानों की लूट को भी जायज और गरीबों के हित के लिए बताया जाता है। अब ऐसे में आश्चर्य नहीं कि गाहे-बगाहे सरकार लाबिंग और रिश्वतघोरी को भी जायज ठहरा दे। आने वाले दिनों एफडीआई को देश की तस्वीर और तकदीर बदलने के लिए अभूतपूर्व क्रांति की संज्ञा दी जाने लगे। वाकई हमारे मनमोहिनोमिक्स का यही तो मायाजाल है। जाहिर है अब सवाल उनसे नहीं जो व्यापार के मकसद से आ रहे है बल्कि सवाल तो उनसे जो भारत भाग्य विधाता है। ऐसे में शेर की पंक्तियां अतिश्योक्ति भले ही लगे बावजूद इसके भविष्य का चित्रण जरूर कराती हैं।
ये कारवां क्यों लुटा, मुझे इसका गिला नहीं।
मुझे रहजनों से शिकायत नहीं, तेरी रहबरी पर मलाल है।

 

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