Loading...
You are here:  Home  >  मीडिया  >  Current Article

उत्तराखण्ड के सूचना विभाग में हजारो की टीवी फिल्में लाखो में बनाने का खेल..

By   /  December 20, 2012  /  No Comments

    Print       Email
इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..

-नारायण परगाई||
देहरादून। उत्तराखण्ड के सूचना निदेशालय में सरकार की विकास योजनाओ पर आधारित लघु फिल्मों एवं टीवी, विडियो, स्पॉट, प्रायोजित कार्यक्रमों के निर्माण को लेकर हजारो की फिल्में लाखो में बनाने का खेल षुरू कर दिया गया है और इस खेल को अंजाम देकर बाहरी कंपनियो को फायदा पहुचाने की स्क्रिप्ट सूचना विभाग के शिखंडियो ने अंजाम दे डाली है। DAVP 1उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद यह पहला अवसर होगा जब सूचना निदेशालय में फिल्मो के निर्माण का काम बाहरी एजेन्सियो को सौंपा जाएगा इस काम के लिए लाखो रूप्ए घूस लिए जाने की जानकारियां भी हासिल हो रही हैं और बताया जा रहा है कि इन फिल्मो के निर्माण का काम एक ऐसे व्यक्ति को सौंपे जाने की तैयारी है जिसने कुछ समय पूर्व ही उत्तराखण्ड में अपनी टीवी फिल्म कंपनी को डीएवीपी में सूचीबद्व करवाया है।

उत्तराखण्ड में सरकार की विकास योजनाओ को टीवी चैनलो के माध्यम से आम जनता तक पहुचाने के लिए सूचना एवं लोकसम्पर्क विभाग हर साल विभिन्न एजेन्सियो/फर्मो से निविदाओ के माध्यम से टैंडर करता है और अब तक उत्तराखण्ड DAVP 2के स्थानीय फर्मो के लोग ही फिल्मो का निर्माण करते आए हैं। इससे जहां स्थानीय लोगो को रोजगार उपलब्ध हो रहा था और जो टीवी फिल्म 60 सैकैण्ड की मात्र 35 से 50 हजार में बनकर तैयार हो जाती थी वह फिल्म अब डीएवीपी के रेट कार्ड अनुसार साडे तीन लाख की बनकर तैयार होगी। उत्तराखण्ड में सरकार के खजाने की माली हालत बेहद खराब है और कई विभागो में सरकार को कर्मचारियो का वेतन देने के लिए धन उपलब्ध कराने में एड़ी चोटी को जोर लगाना पड़ रहा है वहीं दुसरी तरफ खुद मुख्यमंत्री के अधीन आने वाला सूचना विभाग सरकार की योजनाओ के लिए टीवी चैनलो को दिए जाने वाली फिल्मो के निर्माण पर हजारो के बजाए लाखो रूप्ए खर्च करने की तैयारी में जुट गया हैं।

इस काम के लिए बाकायदा बीती 8 दिसम्बर को DAVP 3समाचार पत्रो में टैंडर निकाला गया और 18 दिसम्बर को इस टैंडर में भाग लेने वाली फर्मो को काम देने की तैयारी कर ली गई। सूचना विभाग के सूत्रो से मिली जानकारी के अनुसार 17 दिसम्बर तक करीब 30 से अधिक विभिन्न फर्मो द्वारा फिल्मे बनाने के लिए टैंडर खरीदे गए और 20 से अधिक फर्मो द्वारा टैंडर डाले गए। इस टैंडर को डाले जाने की पहली शर्त फर्म को डीएवीपी में सूचित होना अनिवार्य था जिसमें उत्त्राखण्ड से सलीम सैफी की न्यूज वायरस प्राइवेट लिमिटेड कंपनी ही डीएवीपी में सूचीबद्ध थी हालाकि डाले गए टैंडरो में न्यूज वायरस ने भी प्रतिभाग किया है और बताया जा रहा है कि सूचना विभाग के शिखंडियो ने शर्तो में डीएवीपी में सूचीबद्ध होने की शर्त सिर्फ इसलिए रखी है जिससे न्यूज वायरस को फायदा पहुचाया जा सके क्योकि उत्तराखण्ड की कोई भी फर्म इसके अलावा डीएवीपी में सूचीबद्ध नही है। सूत्र यह भी बताते हैं कि इस फर्म की बनाई गई बैंलेंस सीट में काफी कमियां हो सकती हैं और आखिर इतनी जल्दी इस फर्म को डीएवीपी में किस तरह सूचीबद्ध किया गया है यह भी सवालो के घेरे में आता दिख रहा है।

सवाल यह उठ रहा है कि जब उत्तराखण्ड में सरकार के पास बजट की स्थिति बेहद खराब हैं और देश के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा सीमित खर्चो में ही प्रदेश को चलाने की बात कह चुके हैं तो फिर किस आधार पर सूचना विभाग के अधिकारी मुख्यमंत्री की बातो को ठेंगा दिखाते हुए हजारो की बनने वाली टीवी फिल्में लाखो रूप्ए में बनाए जाने का खेल क्यो खेल चुके हैं। सूचना विभाग के इस कदम से स्थानीय फिल्में बनाने वाले लोगो में नाराजगी खुलकर सामने आ रही है इस कारोबार से जुड़े कई लोगो ने मुख्यमंत्री से इस प्रकरण की शिकायत भी कर दी है अब देखना होगा कि सूचना विभाग के इस शिखंडियो की चाल से सूचना डीजी दिलीप जावलकर निकल पाते हैं या नहीं।

Facebook Comments

इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..
    Print       Email

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

You might also like...

एक जज की मौत : The Caravan की सिहरा देने वाली वह स्‍टोरी जिस पर मीडिया चुप है..

Read More →
Page Reader Press Enter to Read Page Content Out Loud Press Enter to Pause or Restart Reading Page Content Out Loud Press Enter to Stop Reading Page Content Out Loud Screen Reader Support
%d bloggers like this: