/स्त्री-गरिमा का अपहरण करने वाले पुरुष के उन्माद की तीव्रता बरक़रार

स्त्री-गरिमा का अपहरण करने वाले पुरुष के उन्माद की तीव्रता बरक़रार

दामिनी केस पर हमारी प्रतिक्रिया और और स्त्री-गरिमा का अपहरण करने वाले पुरुष के उन्माद की तीव्रता में एक स्तर पर कोई ख़ास अंतर नहीं है…

-चंद्रकांता||

‘री-एक्शन’ की उम्र अधिक नहीं होती. वह पानी के बुलबुले की तरह है जिसे एक अंतराल पर फूटना ही है. इसलिए व्यवस्था पर सारी जिम्मेदारी थोप देने से स्थितियां परिवर्तित नहीं होने वाली. प्रियदर्शिनी मट्टू और आरुषि की तरह यह घटना भी कुछ दिन बाद हमारी स्मृति पर बोझ बन जाएगी. कैंडल मार्च और सभ्य समाज की ‘प्रतिक्रियावादी सक्रियता’ वक़्त के साथ थम जाएगी. Rapeउसके बाद ? फिर ऐसी ही एक दुर्घटना होगी और हमारा आत्म अचानक जाग उठेगा.  सवाल यह है कि हमारी यह चेतन आत्मा सोती ही क्यूँ है?? जब बलात्कार/छेड़खानी हर मिनट हो रहे हैं तो हमारा आत्म कभी-कभी क्यूँ जागता है ??? क्यूँ ना इस आत्म को अब जागते रहने दिया जाए और उन ईंटों को कुरेदा जाए जहाँ इस व्यभिचार की जड़ें हैं!

स्त्री के प्रति होने वाले देह- अपराध एक ऐसा अति-संवेदनशील मुद्दा है जिसे कानून से नहीं सुलझाया जा सकता. इसलिए स्त्री के हक़ में सबसे बेहतरीन कानून भी उसकी अस्मिता और अस्तित्व की सुरक्षा की गारंटी नहीं दे सकता. समाज में बदलाव हमें लाना है यदि हम सभ्य हो जाएंगे तो हमें कानून-व्यवस्था के डंडे से हांके जाने की जरुरत नहीं होगी. तो व्यवस्था पर दोषारोपण करने से अधिक कारगर है की हम खुद को बदलें. पुनः यदि व्यवस्था पूर्ण सतर्क हो भी गयी तब भी स्त्रियों की सुरक्षा के सन्दर्भ में कोई विचारणीय परिवर्तन नहीं आने वाला. क्यूंकि, स्त्री के सन्दर्भ में संस्कार घर-परिवार या समाज से मिलते हैं प्रशासन-व्यवस्था से नहीं. महिलाओं के खिलाफ पब्लिक में हुए अपराध या मीडिया कवरेज पा लेने वाले केस तो राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन जाएंगे लेकिन उस दामिनी का क्या होगा जिसकी गरिमा को लगभग हर घर की चारदीवारी में दफ़न किया जाता रहा है! ! !

अवसरवादी मीडिया, राजनीति और तथाकथित जन- अधिकार संस्थाओं की बात छोडिये किसी मुद्दे को कैश करना इनकी आदत हो चली है. अवसरवादी तत्व तो पूरे समाज का बलात्कार कर रहे हैं. इसलिए मीडिया द्वारा किये जा रहे ‘साहसी’ कवरेज, अन्ना, केजरीवाल, रामदेव या पक्ष-विपक्ष के बयानों और विभिन्न विमर्शों पर बहोत खुश होने या आक्रोश व्यक्त करने से कहीं अधिक जरुरत है की हम व्यवहार में भी अपनी सोच को बदलें. जन आन्दोलन, विरोध-प्रदर्शन भी अपनी जगह है;लेकिन एक बात जो हम सभी को स्पष्ट हो जानी चाहिए वह यह कि स्त्री देह पर पुरुष का यह उन्मांद राजनीति का विषय नहीं है इसकी जड़ें हमारे अपने समाज की संरचना और उसके पोषित संस्कारों में है.

(‘दामिनी प्रकरण’ से बेहद आहत लेकिन बुलंद हौंसलों के साथ – चंद्रकांता)

 

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.