/यह हादसा नहीं मुकम्मल बयान है…

यह हादसा नहीं मुकम्मल बयान है…

-प्रणय विक्रम सिंह||

देश दुराचार की घटना से आहत है. संसद, सडक, सियासत सभ्यता सभी हतप्रभ है. दुराचार रोकने की नयी-नयी तरकीबें सुझाई जा रही है. वारदात के शहर सरकार-ए-सरजमीं नयी दिल्ली के पुलिस कमिश्नर अपनी सेवाओ के चाक चौबंद होने का दम भर रहे हैं. समूचे देश में ऐसा वातावरण बन गया है मानो अब समाज से नारी के शोषण उसकी यौनिकता पर हमला करने वाली मानसिकता का वजूद नष्ट ही जायेगा. दिल्ली समेत छोटे-छोटे शहरो में मानवता को शर्मसार करने वाली घटना के विरुद्ध प्रतीकात्मक रोष दिखने की लिए मोमबत्ती मार्च भी बहुतायत संख्या में समाचार चौनलो और प्रिंट माध्यमो की सुर्खियों का हिस्सा बन समाज के पलते गुस्से को प्रकट कर रहे है, पर इन सबके बीच पीडि़त लडकी जिंदगी और मौत के बीच संघर्षरत है. सूनी आंखों में तैरते आंसुओ के साथ अस्पताल की छत निहारती पीडि़ता के दर्द को शायद कोई नहीं बाट सकता.

व्यंगचित्र: मनोज कुरील
व्यंगचित्र: मनोज कुरील

घटना के बाद पांच बार कोमा का आघात झेलने के बाद यदि उसका जीवन बच भी जाता है तो क्या उसकी जिंदगी पर छाए अमावस के काले बादल छट जायेंगे. उसके अब जीवन को सामान्य तरीके से जीवन जीने की कितनी प्रतिशत सम्भावनाएं है. यौन शुचिता को जीवन देकर भी अक्षुण्ण रखने की नसीहत देने वाले दोहरी मानसिकता के समाज को पीडि़ता की जीवन रक्षा की दुआ मांगने का क्या हक है? क्या अब कोई उत्तर प्रदेश जैसे पिछड़े सूबे के मध्यम वर्गीय परिवार का पिता अपनी बेटी को पढने के लिए किसी महानगर में भेजने का दुस्साहस करेगा. शायद नहीं. आखिर कब तक चलेगा यौनिक अपराधों का यह अमानवीय सिलसिला? कब तक लुटती रहेगी हव्वा की बेटियों की अस्मत? कब तक शिकार होती रहेगी हवस के भेडियों द्वारा मानवता की जन्मदात्री. खैर सवाल बड़ा है जवाब व्यवस्था के साथ-साथ समाज, संस्कार, सियासत और शिक्षा पद्धति आदि सभी को देना है.

दरअसल हमारी सभ्यता अधिनायकवादी मानसकिता का क्रूर प्राकट्य है. यहां आदि काल से स्त्री का शोषण भिन्न-भिन्न तरीको से होता रहा है. दुर्भाग्य है कि आज भी महिलाओं के विरुद्ध यौन हिंसा को इस नाम पर जायज ठहराया जा रहा है कि वे अपनी सीमा लांघ रही हैं. पर यह कोई नई बात नहीं है. आदिकाल से ही इस पुरुषवादी समाज ने सदैव अपने पापों के लिए हव्वा की बेटियों को ही जिम्मेंदार माना है. जैसे राम-रावण युद्ध का कारण सीता का लक्ष्मण रेखा लांघना बताया गया और पूरा महाभारत र्द्रौपदी की करनी का फल था ऐसा प्रचारित किया जाता है. शायद रात के समय अहिल्या के पास इर्न्द्र देवता पधारे, यह भी अहिल्या की गलती थी, सजा मिली, वह शिला बना दी गई. बहरहाल, औरत हमेशा ही समाज का निशाना रही है.

प्राचीन काल से आज तक न जाने कितनी सदियां बीत गई, कितने चांद-सूरज ढल गये, कितनी सभ्यताओं ने अपने चेहरे बदले. क्या मेनका के विश्वामित्र, जाबालि के ऋ षि स्वामियों से लेकर चित्रलेखा के कुमारगिरि तक बदले? क्या ये सब कुलटाएं थींइनके तो परिधान भी आधुनिक नहीं थे. इन सवालों को दरकिनार करते हुए दोष स्त्रियों पर ही लगाया गया कि इन्होंने महान ऋषियों, ब्रह्मचारी तपस्वियों को रिझाया. दरअसल आज समाज में मूल्यों का संकट है. कहीं भी हमारे आसपास कोई ऐसा व्यक्तित्व नहीं है,जो नए मूल्यों के निर्माण का रोल मॉडल बने. दूसरे, समाज में चरित्र निर्माण की भारी कमी है. महिलाओं के प्रति सम्मानजनक व्यवहार को लडके न तो घर में देखते हैं और न बाहर. यह बहुत आम है कि घर में पत्नी की मामूली सी बात पर पति उसकी पिटाई कर दे या उसके साथ गाली-गलौज या अमर्यादित व्यवहार करे. दूसरा पारिवारिक स्तर पर भी कुछ दायित्व बोध जाग्रत करने की आवश्यकता है. मैं कई महिलाओं को जानता हूं जो अपनी बेटियों से ये नहीं पूछती है कि वो अगर महानगर में रह रही है तो वहां किस तरह से रह रही है, रात को कितनी बजे तक बाजार में घुमती है? कई बार ये भी देखा है कि पति रिश्वत की कमाई घर ला रहा है तो बीबी बेहद खुश होती है. ऐसी कितनी औरतें है जो अपने पति को रिश्वत लेने से मना करती है. सवाल है कि बलात्कार के मामले में रिश्वत कहां से आ गई. एक बुराई क्या दूसरी बुराई से गुथी हुई नहीं है? हम कदाचार, दुराचार और व्यभिचार की व्यवस्था का एक हिस्सा है, इसको पोषित करने में हमारा भी रोल है. महिलाए जींस पहनती है बहुत बढिया बात है मेरी भी सभी बहने पहनती है. लेकिन जींस पहन कर पुरुष जैसा आचरण संभव नहीं है. प्रकृति ने पुरुष-महिला में अंतर यूं ही नहीं बनाया. व्यवहार में दिखता है कि कई जींस पहने हुए महिलाए-युवतियां जब सब्जी छांटने या किसी काम से नीचे बैठती है तो उनकी जींस उनके कुल्हे से आधी नीचे उतरी हुई होती है, बड़े खतरनाक दृश्य होते है, बड़ी शर्म आती है क्या इन महिलाओं-युवतियो के घर में इनकी मां व पति इस हालात से अंजान होंगे? अब जब वो इतनी आधुनिक बन गई है तो कुछ तो ध्यान उन्हें रखना चाहिए. अपनी जिद से खुद के अंदाज में जिंदगी जीने की कीमत हम सब के चुकानी पड़ती है. जब दरवाजा खुला रहता है तो चोर आता ही है. लेकिन यह समस्या का कारण नहीं वरन भेडिये द्वारा घात लगाकर हमला करने की आवृति को कम करने के आयुर्वेदिक नुस्खे हैं जिसमें साइड इफेक्ट नही होते. किसी भी शहर में सभ्यता तभी जीवित रह सकती हैजब वहां मां-बहनें सुरक्षित हों. समाज के कर्णधारों को सोचना चाहिए कि हमें कंक्रीट के जंगल नहीं बनाने, हमें ऐसे शहर बनाने हैं, जहां लोग इज्जत से रह सकेंजहां कानून का राज हो, जहां लोग एक-दूसरे की परवाह करते हों. चयन लोगों को करना है, उन्हें कैसा समाज चाहिएउन्हें कैसा शहर चाहिए. अगर हम इस अक्षम्य शोषण के सिलसिले को मिल-जुल कर नहीं तोड़ेंगे, तो फिर सबको तैयार रहना चाहिए, क्योंकि दुनिया में किसी का भी समय हमेशा अच्छा नहीं रहता.

जब संसद में बैठने वाले लोग ही नारी के प्रति भोगवादी द्रष्टिकोण रखते हो तो कोई कैसे कानून और समाज के उनके प्रति सम्मानजनक भाव रखने की अपेक्षा कर सकता है. कभी इसी संसद में बयान देते हुए समाजवाद के सबसे बड़े हस्ताक्षर मुलायम सिंह ने कहा था कि अगर महिलाये संसद में आ गई तो सांसद उनको देख कर सिटी बजायेंगे. उन्होंने ही कहा था कि खूबसूरत महिलाये चुनाव में ज्यादा सफल होती है. केंद्रीय मंत्री श्रीप्रकाश जैसवाल ने पुरानी औरत में वो मजा न होने का ऐतिहासिक खुलासा सरेआम करके यूरेका कर दिया था. बाकी जनप्रतिनिधियों पर महिलाओ के शोषण और फिर हत्या के मामले तो आये दिन सामने आते रहते है लेकिन कोई हलचल नहीं होती. खैर इस घटना ने कई सवालों को जन्म दिया है. जैसे यह सार्वजनिक वाहनों में यात्रियों की सुरक्षा का भी सवाल है. निजी वाहनों, ऑटो रिक्शा, टैक्सी आदि की तुलना में सार्वजनिक वाहन, मुख्यतरू बसें ज्यादा सुरक्षित होनी चाहिए. ये युगल जिस बस में बैठे, वह उसको सुरक्षित समझते हुए बैठे. सार्वजनिक वाहनों में यात्रियों की सुरक्षा पर यह बहुत बड़ा आघात है. सार्वजनिक यातायात से जुड़े लोगों को इस बात पर सोचना चाहिए कि इस शहर में सार्वजनिक यातायात कितना सुरक्षित है क्योंकि तमाम लोग सार्वजनिक यातायात पर भरोसा करते हैं. उन्होंने यह सोचकर इस घटना को अंजाम दिया कि वे इस घटना को अंजाम देकर निकल जाएंगे.

महिला अपराधों के प्रति समाज की उदासीनता इस तरह की घटनाओं का कारण बनती है इसलिए हर किसी को इस पर सोचना होगा. सामाजिक संवेदनशीलता किस कदर छीजती जा रही है इसका अंदाजा सामूहिक बलात्कार के ताजा वाकये से भी लगाया जा सकता है. पीडि़त युवती और उसके मित्र को अपराधियों ने नग्न हालत में सडक पर फेंक दिया था. पुलिस के आने तक वे उसी दशा में पड़े रहे, भीड़ में से कोई उन्हें ढंकने के लिए भी आगे नहीं बढ़ा. यह अफसोस की बात है कि समस्या को पूरे परिप्रेक्ष्य में देखने और उसके मद््देनजर बहुमुखी रणनीति बनाने के बजाय बलात्कारियों को फांसी देने की मांग कई सांसदों ने भी कर डाली. लेकिन क्या बलात्कार के लिए फांसी देने से बलात्कार रुक जाएगा, जैसी कि लगातार मांग बनाई जा रही है? बलात्कारी के शिश्नोच्छेद की भी मांग हो रही है. ऐसी मांग का क्या अर्थ है? फांसी की भूखी भीड़ को कुछ लाशें चाहिए ही चाहिए जिससे उसकी क्षुधा कुछ देर को शांत हो. फिर उन्माद का कोई और मुद््दा आ जाएगा. क्या मृत्युदंड से इन घटनाओं को काबू किया जा सकता है?

समाज मानता है कि शील भंग के बाद पीडि़ता किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं बची, उसकी इज्जत लुट गई, वह बरबाद हो गई. बलात्कारी को मृत्युदंड या शिश्नोच्छेद की मांग करने वालों के भी मूल्य यही हैं कि अब स्त्री के पास बचा ही क्या. शील गया तो सब गया. सुषमा स्वराज के रुदन में कहें तो अब उसका जीना-मरना एक समान है. भारत जैसा संस्कारी मुल्क जहां दुराचार का पैमाना प्रति मिनट के हिसाब से तय होता है, वहां इस तरह की घटना का राष्ट्रीय क्रंदन का विषय बनना समाज के बदलने का संकेत अवश्य है पर इन आन्दोलनों, प्रदर्शनों से हासिल क्या होने जा रहा है? क्या समाज अब समाधान की दिशा में बढ़ रहा है? नहीं. समाधान तो सामाजिक चरित्र के बदलने से ही निकलेगा. सामाजिक चरित्र विकारों के स्थान पर विचारों की स्थापना से ही संभव है. यह सम्भावना संस्कारो से ही पनपेगी, जिसके लिए पारिवारिक स्तर पर मर्यादित आचरण को सामान्य व्यवहार बनाने की आवश्यकता है, तब जा कर समाधान निकलेगा पर क्या तब तक अस्मत यूं ही लुटती रहेगी? शायद आज राष्ट्र उत्तर चाहता है. राष्ट्र उबल रहा है. वक्त गुजरने के साथ-साथ गुस्से की आंच पर इंसाफ की मांग और पकने लगी है. एक तरफ जब समूचा उत्तर भारत शीत लहर में ठिठुर रहा है, निर्धन तबका सरकार से अलाव और रैन बसेरा जैसी दस्तूरी सहूलियतों की बाट जोह रहा है, उस ठिठुरन में दिल्ली, बदलाव की बुनावट बुन रही है.

नौजवान-वृद्ध, स्त्री-पुरुष साहस के साथ अधिनायकवादी सरकार की बर्बर पुलिस का सामना कर रहे है. बड़ा ही विरोधाभासी वातावरण हो गया है सत्ता और समाज के दरम्यान. सरकार कहती है कि समझौता करो जनता है कि संघर्ष पर आमादा है. वह कहती है समाधान से कम पर कोई बात नहीं. शायद आम अवाम के इस बागी तेवर का अंदाजा सोनिया गांधी को है तभी वह अर्ध रात्रि को घर से बहार निकल कर प्रदर्शनकारियों से रूबरू होने को विवश हुई. पर आश्चर्य वार्ता किससे करे? क्यूंकि यह विरोध प्रदर्शन किसी बैनर की उपज तो है नहीं, वह तो स्व-स्फूर्त है इसका तो कोई अगुवाकार भी नहीं है. सोनिया गांधी को इन्ही बातो ने सोचने पर विवश कर दिया होगा, अवश्य ही उन्होंने ने जनता के आक्रोश में विप्लव की गूंज सुनी होगी. उन्होंने भी दुराचार से संबंधित कानून को और सख्त बनाने पर हामी भरी हांलाकि फांसी की सजा से न इत्तफाकी भी जताई. लेकिन इसके बावजूद पुलिस का आचरण नहीं बदला.

पुलिस ने बर्बरता की हदों को तोड़ते हुए प्रदर्शन कर रही महिलाओं, बच्चो और वृद्धजनों पर जमकर लाठी चार्ज किया क्योंकि उसे उद्देश्य से कोई मतलब नहीं था. न्याय की आवाज उठाने वाला प्रत्येक शख्श में वह निजाम के खिलाफ बगावत देख रही थी. पुलिस की न्यायप्रियता की तारीफ करनी होगी की उसने लिंग, जाति, पंथ, आयु के भेद से ऊपर उठते हुए सबके साथ सामान व्यवहार किया. साम्यवाद की प्रचारक बन गयी हमारी पुलिस. सरकार की उदासीनता व पुलिस की बर्बरता के बीच कुछ युवा धमनियों का लहू, लावा बन प्रतिक्रिया कर बैठा और एकाएक आन्दोलन में आक्रोश बढ़ गया. पुलिस को उसी की विधा में उत्तर मिलने लगा. अधिकारियों के बयान आने लगे कि अराजकता फैल रही है, मानो उससे पहले यहां राम राज्य था. लाठी, डंडे, गैस का इस्तेमाल पुलिस का विशेषाधिकार है यदि जनता प्रतिक्रिया स्वरुप उसी विधा को अपना ले तो अराजक कहलाती है. जम्हूरियत में जनता का मार खाना उसकी नियति है और मारना बगावत. खैर सत्ता और समाज के मध्य रस्साकसी चल रही है. पीडि़ता की हालत भी बेहतर और नाजुक हालातों के बीच हिचकोले खा रही है. चौराहों पर आम चर्चा पीडि़ता के बचने से लेकर अब उसके भावी जीवन में क्या शेष रह गया है, को लेकर चल रही है, जो ठिठुरती सर्दी में भी बरबस ऊष्णता उत्पन्न कर देती हैं. सरकार कह रही कि प्रदर्शनकारी हिंसक हो रहे हैं पता नहीं सरकार किस आधार पर यह बात कह रही है? अरे भाई आंसू गैस के गोले, कलेजे को चीरते ठंढे पानी की धार, और जिस्म समेत रूह को घायल करती लाठियों के बरक्स यदि जनता की तरफ से भी कुछ प्रतिक्रिया हो ही गयी तो समूचे आंदोलनध्प्रदर्शन को हिंसक कह देना कहां तक उचित होगा.

किसी भी आदमी ने अभियुक्तों के खिलाफ कोई हिंसा नहीं की. वह सकुशल तिहाड़ जेल भेज दिए गए. जिस पुलिस थाने में वह रखे गए थे वह अब भी अपने पूर्व वजूद को बरकरार रखे है. समस्त सत्ता प्रतिष्ठान अपनी जगह पर कायम हैं. मुख्यमंत्री शीला दीक्षित बड़े दिन की पार्टी में भी शिरकत कर रही है. व्यवस्था अपने दैनिक स्वरुप में गति कर रही है. आखिर अराजकता कहां है? आखिर जनता अपनी लुटती अस्मत, नुचती आबरू की आहों को लेकर कहां जाये? कैसे दर्ज कराये अपना विरोध? क्या सब कुछ देखते रहना, मुर्दा खामोशी को ओढ़ लेना ही जम्हूरियत का हासिल है? दुराचार की घटना महज चोट नहीं बल्कि व्यवस्था की प्रासांगिकता के खिलाफ मुकम्मल बयान है. हुक्काम को अब समझ लेना चाहिए कि यह महज इत्तेफाक नहीं है, क्योंकि

…हादसा एक दम नहीं होता,
वक्त करता है परवरिश बरसों!

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.