/कानून के राज का दावा खोखला साबित हुआ सुशासन बाबू!!

कानून के राज का दावा खोखला साबित हुआ सुशासन बाबू!!

सेंट्रल बैंक से जुड़ी सहकारी समिति द्वारा  छोटे-मंझोले व्यवसायी, ठेला चालक, फुटपाथी दुकानदार, मेहनतकश और दिहाड़ी मजदूरों के खून पसीना एक कर कमाए गए 7 करोड़ रुपये का घोटाला ,  कानून का राज कायम करने का दावा खोखला ! 

– संजय कुमार ||
नालंदा जिला में सेंट्रल बैंक से जुड़े एक सहकारी समिति ने तकरीबन ७ करोड़ का घोटाला किया है. घोटाले की यह राशि बिहारशरीफ के दुकानदारों, व्यवसायियों, फुटपाथियों, मजदूरों एवं अन्य मेहनतकशों की खून-पसीने की गाढ़ी कमाई है. सहकारी समिति का संचालक सेंट्रल बैंक की हाजीपुर शाखा में प्रबंधक के पद पर पदस्थापित है. लोगों की लिखित शिकायत के एक पखवाडा बीत जाने के बावजूद अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है.
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जिला मुख्यालय बिहारशरीफ के महात्मा गाँधी रोड पर सेंट्रल बैंक ऑफ़ इंडिया की स्थानीय शाखा है. इसके विपरीत दिशा में रोड पार स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया की बाज़ार शाखा है. स्टेट बैंक से पश्चिम होटल आदित्य कैम्पस में आज से यही कोई डेढ़ दशक पूर्व सेंट्रल बैंककर्मियों ने सेंट्रल बैंक कर्मचारी स्वाबलंबी सहकारी समिति प्राइवेट लिमिटेड की स्थापना की. इस सहकारी समिति की स्थापना का मुख्य उद्देश्य सेंट्रल बैंककर्मियों एवं उनके परिजनों के हितों की पूर्ति करना था. बाद में कुछेक बैंक अधिकारी व कर्मचारियों ने इसे एक नॉन बैंकिंग चिट फंड कंपनी का रूप दे दिया. नाम के पहले सेंट्रल बैंक लगा दिया. इसका लोगो भी सेंट्रल बैंक से मिलता-जुलता ही रखा गया. इस प्रकार कंपनी ने आम लोगों के बीच अपनी साख पैदा की. इसी क्रम में इसने सहारा इंडिया की तर्ज़ पर आम जनता से दैनिक, साप्ताहिक व मासिक सावधि जमा योजना के तहत जमा राशि को दोगुना-चौगुना करने का ऐलान कर दिया.इसने बैंक की तर्ज़ पर ग्राहकों को न्यूनतम ब्याज पर लोन देने का वादा किया.प्रारंभ में नगर के कुछ चुनिन्दा ग्राहकों को लोन भी दिया. और कुछ को योजना के तहत घोषित ब्याज समेत मूलधन भी लौटाया. इस प्रकार इसने पहले बाज़ार में अपनी साख पैदा की और तब इसने पैसा- वसूली का सिलसिला शुरू कर दिया. लोगों को शक होता भी कैसे? इसके नाम के शुरू में सेंट्रल बैंक जो जुड़ा था.  इतना ही नहीं इस सहकारी समिति का अकाउंट भी सेंट्रल बैंक में ही खोला गया. जब भी कोई जमाकर्ता सवाल खड़ा करता, तो इसके स्टाफ उस व्यक्ति को सेंट्रल बैंक ले जाकर अकाउंट की तस्दीक करा देते. शक की कोई गुंजाईश नहीं रह जाती.

धीरे-धीरे कुछ को लोन देकर, कुछ को ब्याज समेत पैसे लौटा कर इसने बाज़ार में अपनी पकड़ बना ली. छोटे-मंझोले व्यवसायी, ठेला चालक, फुटपाथी दुकानदार, मेहनतकश और दिहाड़ी मजदूर अपनी खून-पसीने की गाढ़ी कमाई इसके एजेंटों से खाता खुलवा कर पैसा जमा करने लगे. इसके एजेंट जमाकर्ताओं के समक्ष सहकारी समिति को सेंट्रल बैंक का अंग बताने से तनिक भी गुरेज नहीं बरतते. इस प्रकार लोग धडाधड खाता खुलवा कर पैसा जमा करने लगे. पिछले डेढ़ दशक में स्थानीय लोगों ने यहाँ करीब ७ करोड़ रुपये जमा किये. सबसे अधिक खाता बिहारशरीफ बाज़ार समिति का है.अकेले बाज़ार समिति के दूकानदारों का लगभग साढ़े तीन करोड़ रुपये इसमें जमा थे. जुलाई के तीसरे सप्ताह में हिंदुस्तान में खबर छपी कि लखीसराय से उक्त सहकारी समिति करोड़ों लेकर चम्पत हो गई.इधर यह खबर फैली. उधर सेंट्रल बैंक सहकारी समिति के दफ्तर बंद. इससे जुड़े स्टाफ भी अचानक गधे के सर से सींग की भांति गायब हो गए. इससे जुड़े तमाम लोगों के मोबाइल भी स्विच ऑफ बताने लगा.

लोग-बाग़ समिति के दफ्तर की और दौड़ पड़े. शटर बंद देख कर लोग किंकर्तव्यविमूढ़ हो गए.शाम हो चुकी थी. बैंक का टाइम ओवर हो चुका था. अख़बारों में ऑफिस बंद की खबर छपी. अगला दिन रविवार था,पर नगर के जमाकर्ताओं में हडकंप मच गया. सोमवार को सेंट्रल बैंक से समिति के अकाउंट से पांच करोड़ निकाल लिए गए. अगले दिन जमाकर्ताओं ने गांधी मैदान में मीटिंग की और सेंट्रल बैंक गए. बैंक के अकाउंट से सारे पैसे निकाले जा चुके थे और मात्र १७ हज़ार रुपये जमा थे. यह जानते ही जमाकर्ताओं के पैर के नीचे से धरती खिसक गई. आक्रोशित लोगों ने नगर की सड़कों पर रोषपूर्ण जुलूस निकाला और डी एम के समक्ष प्रदर्शन किया. डी एम के आदेश पर लहेरी पुलिस ने मामला दर्ज किया. पर एक पखवाडा गुजर चुके हैं. पुलिस मामले का अनुसन्धान कर रही है. पर अभी तक कोई नतीजा नहीं निकल सका है.

सबसे रोचक तथ्य यह है कि सेंट्रल बैंक ऑफ़ इंडिया के स्थानीय अधिकारी-कर्मचारी उक्त सहकारी समिति से किसी भी प्रकार के बैंक से सम्बन्ध होने से सिरे से ख़ारिज कर रहे हैं.जबकि उक्त समिति के संचालक दिलीप कुमार सेंट्रल बैंक की हाजीपुर शाखा में प्रबंधक के पद पर अभी तक कार्यरत हैं. सर्वाधिक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि अख़बारों में छप जाने के बाद भी ५ करोड़ की इतनी बड़ी राशि आखिर एक ही दिन में और वह भी शाम में कैसे निकाली गयी?यदि सेंट्रल बैंक के अधिकारी-कर्मचारी इस घोटाले में शामिल नहीं हैं, तो अचानक एक ही बार में वह भी ५ बजे शाम में बैंक से करोड़ों की राशि की कैसे निकासी हुई, जबकि दो दिन पहले ही अख़बारों में घोटाले की आशंका की खबर छप चुकी थी? मतलब साफ़ है कि सेंट्रल बैंक के स्थानीय अधिकारी एवं कर्मचारियों की सांठ-गांठ से ही इस घोटाले को अंजाम दिया गया है. इतना ही नहीं,एक पखवाड़े तक जाँच करने के बाद भी किसी नतीजे पर नहीं पहुंचना पुलिस की कार्य-शैली पर सवालिया निशान खड़ा कर रहा है!और यह सब सुनियोजित तरीके से हो रहा है बिहार के मुख्यमंत्री के गृह जिला नालंदा में. मतलब स्पष्ट है कि सुशासन बाबू द्वारा कानून का राज़ कायम करने का दावा खोखला साबित हो रहा है…

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.