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बलात्कारी आते कहां से हैं?

By   /  December 26, 2012  /  5 Comments

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आज समाज और देश प्रगति व आधुनिकता की अंधी दौड़ का अनुसरण कर रहा है. ऊपरी तौर पर तो नारी की स्थिति में सुधार और स्वतंत्रता की झलक तो दिखाई देती है लेकिन आधी आबादी के प्रति समाज की सोच में आंशिक परिवर्तन ही आया है. महिलाएं भले ही कंधे से कंधा मिलाकर जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में नित नये कीर्तिमान स्थापित कर रही हैं लेकिन उन्हें अभी तक उचित स्थान प्राप्त नहीं हुआ है.

-आशीष वशिष्ठ||

दिल्ली में मेडिकल छात्रा के साथ हुए गैंगरेप की घटना ने देश की अंर्तत्तामा को झकझोर कर रख दिया है. राजधानी दिल्ली से लेकर देश के कोने-कोने में इस घटना की गूँज सुनाई पड़ रही है. लचर और अपाहिज कानून, संवेदनहीन और हठधर्मी सरकार, भ्रष्टऔर नाकारा पुलिस प्रशासन से ऊबी हुई जनता ने रायसीना के सीने पर चढक़र अपने क्रोध, संवेदनाओं, भावनाओं, असहनीय दुख से उपजी पीड़ा का जो विशाल प्रदर्शन किया है उसने सत्ताशीर्ष पर बैठे महानुभावों को सोचने को विवश तो किया ही वहीं यह संदेश भी दिया है कि जनता अब चुपचाप अत्याचार सहने वाली नहीं है. repistमौजूदा कानून में इस कुकृत्य के लिए कड़ी सजा का प्रावधान नहीं है. जनता की मांग है कि दिल्ली रेप कांड के आरोपियों को फंासी की सजा दी जाए. मेडिकल छात्रा के साथ और इससे पूर्व जितने भी ऐसे मामले हुए हैं वो किसी भी सभ्य समाज के माथे पर कलंक के समान है लेकिन कानूनी पेचीदगियों, दांव-पेंच और पुलिस की लाहपरवाही के कारण अपराधी कानून के शिकंजे से आसानी से छूट जाते हैं या फिर न्यायालय निर्णय देने में इतनी देरी कर देता है कि तब वो पूर्णत: महत्वहीन और अर्थहीन हो चुका होता है.

अपराधी को उसके अपराध की कठोर से कठोर सजा अवश्य मिलनी चाहिए लेकिन यक्ष प्रश्न यह है कि आखिरकर ये बलात्कारी और अपराधी आते कहां से हैं? प्रश्न यह भी है कि क्या वातावरण और समाज अपराधी बना रहा है.  क्या बढ़ती आपराधिक मनोवृत्ति के लिए राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक वातावरण जिम्मेदार है. क्या लचर कानून, भ्रष्ट पुलिस विभाग और कानूनी दांव-पेंच जिम्मेदार है, क्या भ्रष्टाचार, नैतिक मूल्यों का ह्रास, बढ़ती जनसंख्या, अनपढ़ता, बेरोजगारी, गरीबी, आर्थिक असमानता, वोट बैंक की राजनीति, क्षेत्रवाद की बढ़ती भावना, बढ़ता शहरीकरण, टूटता सामाजिक ताना-बाना इसके लिए कसूरवार है.  ये कटु तथ्य है कि अपराधी भी उसी समाज का अंग है जिसे हम सभ्य समाज कहते हैं. फिर ऐसे कौन से हालात हैं जो किसी युवक या बालक को अपराधी बनने को विवश करते हैं. आपराधिक मनोवृत्ति और आपराधिक व्यक्तित्व के नेपथ्य में ऐसे कई तत्त्व उपस्थित हैं जो समाज में अपराध और अपराधियों को ग्राफ बढ़ा रहे हैं, जिनको हम चिन्हित नहीं कर पा रहे हैं.

बढ़ता शहरीकरण भी अपराधियों और अपराधों में बढ़ोतरी कर रहा है. जब देश की जनसंख्या गांवों में सिमटी हुई थी तब अपराधों को आंकड़ा इतना विकराल नहीं था. खेतों की छातियों पर जब से कांक्रीट के जंगल उगने लगे हैं उसने समाज के व्यवहार और मनोविज्ञान को बदला है. बहुमंजिला इमारतों के अगल-बगल उगे स्लम में जो पीढ़ी उग और पनप रही है उसने आंख खोलते ही घर में अभाव, गरीबी, असमानता, अशिक्षा और अनैतिक आचरण पाया है तो अपने आस-पास एक अलग और रंगीन दुनिया को देखा है. सौ मीटर के अंतर पर दो अलग संसार बसते हैं और इन दोनो में आकाश और पृथ्वी के समान अंतर है. तंग, संकरी और बदबूदार गलियों में बसे स्लम का मकडज़ाल आबादी के एक बड़े हिस्से विशेषकर बच्चों और युवाओं को आखिरकर दे क्या रहा है इस पर कोई ध्यान नहीं दे रहा है. जिनके कंधों पर इनकी दशा और दिशा बदलने की अहम् जिम्मेदारी हैं उनके लिए ये आबादी वोट बैंक से अधिक कुछ और मायने नहीं रखती है. गंदी बस्तियों और मोहल्लों में नशा, अनैतिक आचरण, गाली-गलौज, देह व्यापार और एक ही कमरे में पांच-सात सदस्यों के रहने की विवशता के मध्य एक संतुलित, सभ्य और सुसंकृत नागरिकों की उम्मीद नहीं की जा सकती. जब समाज का एक बडा़ हिस्सा अभावग्रसत, गरीब, अशिक्षित, बेरोजगार, मूलभूत सुविधाओं से वंचित हो तो देश में अपराध और अपराधियों की संख्या बढऩा लाजिमी है.

ये सच्चाई है कि महानगरों की चकाचौंध और उपभोक्तावादी संस्कृति बंगलों और गंदी बस्तियों में रहने वाले युवाओं को समान रूप से आकर्षित करती है. लेकिन दोनो के मध्य आर्थिक असामनता की इतनी गहरी खाई है कि इसे लांघ पाना हिमालय पर चढऩे के समान है. ऐसी विषम और विपरित स्थितियों में अतृप्त और अधूरी इच्छाएं, सपने और कामनाएं पूरी न होने पर युवा कुंठित, असभ्य, प्रतिस्पर्धी, ईष्यालु व्यक्तित्व का स्वामी बन जाता है और यही स्थितियां और वातावरण उसे अनैतिक आचरण और अपराध की ओर उन्मुख भी करती हैं.

अशिक्षा और अनपढ़ता भी एक बड़ा कारण है जो समाज में अपराध और अनैतिकता को बढ़ावा दे रहा है. समाज में शिक्षा का प्रचार-प्रसार अत्यधिक अंसतुलित और शोचनीय दशा में है. एक ओर कावेंट और पब्लिक स्कूलों की पढ़ी-लिखी जमात है तो वहीं दूसरी ओर ऐसे बच्चों और युवाओं को बड़ा समूह है जो  शिक्षा के प्रकाश से वंचित हैं. सरकार चाहे लाखे दावे करे लेकिन देश में विकास और समाज की प्रगति में बाधक होता है ये कड़वी सच्चाई है.

पिछले दो-तीन दशकों में सामाजिक ताना-बाना बुरी तरह बिखरा है. इसके कई कारण हैं लेकिन गरीबी और बेरोजगारी मुख्य कारण हैं. नैतिक मूल्यों में गिरावट से भी मुंह नहीं मोड़ा जा सकता है. अर्थ प्रधान युग में सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक मोर्चों पर सारी व्यवस्था फेल दिखाई देती है. समाज का ध्यान आर्थिक साधनों को बटोरने और विस्तार में केंद्रित है. संयुक्त परिवार की परंपरा धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही है. एकल परिवारों की बढ़ती संख्या और पारिवारिक विघटन ने सारे समाज की दशा और दिशा बदल डाली है. दिल्ली रेप कांड के अपराधी समाज के उस वर्ग से आते हैं जहां मूलभूत सुविधाओं और संस्कारों को सर्वथा अभाव है. जब युवा वर्ग बिना किसी निर्देशन के उम्र की दहलीजें तेजी से नाप रहा हो तो उसमें भटकने की आशंका सर्वदा बनी रहती है.

 

सास्कृति का अर्थ मोटे तौर पर अब फिल्में, गीत-संगीत और फिल्मी म्यूजिक तक ही सिमट गया है. आम आदमी जो दो जून की रोटी के फेर में दिन रात एक किये है उसे सदग्रंथों और साहित्य से कुछ लेना देना नहीं है ये सच्चाई है. अगर सिनेमा को समाज को आइना मान लिया जाए तो जरा सोचिए आज बालीवुड और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं की फिल्मों और संगीत के नाम पर देश की सामने क्या परोसा जा रहा है. फिल्म, सीरियल और संगीत में कामुकता, सेक्स, प्यार, धोखा, मारपीट, प्रतिस्पर्धा, ईष्या, गंदी राजनीति और नेगटिव चरित्रों का महिमामण्डन का तत्व प्रधान है. आज भी देश के अधिकांश सिनेमाघरों में आबादी का वो हिस्सा सबसे अधिक दिखाई देता है जो अभाव का जीवन जी रहा है और जो देखता है उसे वो रियल लाइफ में अपनाने और पाने की हरसंभव कोशिश भी करता है.

बढ़ती हुई मंहगाई भी अपराध में बढ़ोतरी कर रही है. देश में औसत आय इतनी कम है कि दो जून की रोटी तो क्या महीने भर की चाय पीना भी दुश्वार है. जिस दिल्ली में मेडिकल की छात्रा के साथ जघन्य वारदात घटी उस दिल्ली की मुख्यमंत्री और सरकार यह कहती है मात्र छह सौ रुपये में महीने की मदद से गरीब आदमी एक महीना आराम से रोटी खा सकता है. जिस घर में चार से छह सदस्य हों और आटा 20-25 रुपये दाल एक सौ रुपये और दूध 40 रुपये लीटर बिक रहा हो वहां छह सौ रुपये में कोई महीना भर भरपेट रोटी खाएगा ये सोच और बयान उपहास के अलावा कुछ और नहीं कहा जा सकता है.

स्वतंत्रता के 65 वर्षों बाद देश की आबादी का बड़ा हिस्सा आज भी मूलभूत सुविधाओं से वंचित है. गरीबी, भुखमरी, बढ़ती जनसंख्या, अमीर गरीब की बढ़ती खाई, अशिक्षा, वेश्यावृत्ति,बाल विवाह, बालश्रम, बेरोजगारी का ग्राफ कम होने की बजाए बढ़ी तेजी से बढ़ रहा है. एक देश में भीतर दो देश बन और बस चुके हैं. ये वो तमाम कारण और तत्व हैं जो अपराधियों की एक ऐसी जमात खड़ी कर रही है जो एक विकसित और सभ्य समाज के बड़ा खतरा बनकर उभरकर रही है. आवश्यकता इस बात की है कि कानून के कड़े प्रावधान, अपराधियों को उनके कुकृत्य की कठोर सजा देने के साथ उन तमाम कारणों पर भी विचार करना होगा जो अपराध और अपराधियों को बढ़ावा दे रही है क्योंकि आखिरकर अपराधी उसी समाज से आते हैं जिसका हिस्सा हम और आप भी हैं.

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

5 Comments

  1. Sandeep Janu says:

    or baraskar ji kaha ho

  2. APNE SAMAJ KI VIKRIT MANSIKTA KE LOG HE HOTE HAI……….KILL THE BLOODY BASTERED

  3. bhai malume nahi pata chalega to batadunga paka

  4. bahut hi satyaparakh lekh hai… email par padhi aur comment karne ke liye yaha aane par vivash hona padaa.

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

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