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जब भारत-पाक के क्रिकेटर्स एक सर्द रात हवालात की हवा खा बैठे थे…

By   /  December 26, 2012  /  1 Comment

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-पदम् पति शर्मा ||

इस समय पाकिस्तानी क्रिकेट टीम संक्षिप्त दौरे पर भारत आयी हुई है. असल में यह समय टीम इंडिया के लिए पीठ सीधी करने यानी विश्राम का था. नव वर्ष में इंग्लैण्ड के साथ उसे एक दिनी सीरीज खेलनी थी. लेकिन खेल में राजनीति-कूटनीति का घालमेल खास तौर से पाकिस्तान-भारत वर्षों से करते चले आ रहे हैं. आपसी दौत्य सम्बन्ध कुछ गड़बड़ हुए तो संवादहीनता और उनमे सुधार आते ही सबसे पहले क्रिकेट सीरीज तय होती रही हैं.Hafeez_1310136e

खिलाड़ी तो अपने बोर्ड के गुमाश्ते भर ही हैं और इन वेतनभोगियों को तो वही करना पड़ता है जो उनके आका कहते हैं. मै जानता हूं की पाक के साथ खेलने के पहले कभी भी खिलाडियों की राय नहीं ली जाती. यदि ली जाय तो टीम इंडिया ही नहीं दुनिया की किसी भी टीम के लिए पसंदगी के लिहाज से पाकिस्तान सबसे निचले स्थान पर ही आता है. आतंकवादियों द्वारा कुछ साल पहले लाहौर में मेहमान श्रीलंका टीम की की गयी थुक्का-फजीहत के बाद से तो कोई भी देश तालिबानों का अभ्यारण्य बन चुके पाकिस्तान जाने की फिलहाल सोच भी नहीं सकता. अपने यहां भी कोई उन्हें द्विपक्षीय सीरीज के लिए नहीं बुलाता, सभी को आतंक का खौफ दहलाता है. हां, भारत अपवाद है. उसका बस चले तो वह टीम को शहीद होने के लिए पाकिस्तान भी भेज सकता है. बीसीसीआई का एक वरिष्ठ अधिकारी जब यह बोलता है कि जब हमने १९७१ और कारगिल के बाद भी क्रिकेट खेली तो अब खेलने में क्या हर्ज़ है !! वे भूल जाते हैं संसद पर हमले को, वे भूल जाते हैं २६/११ और अन्य ऐसी न जाने कितनी पाकिस्तान प्रायोजित आतंकी घटनाओं को जिनमे हमारे हजारों हज़ार मासूम जान से हाथ धो बैठे थे. खैर, खेल को जंग का मैदान बना कर भावनाओं के साथ खिलवाड़ का शगल जारी है. मैंने सोचा कि क्यों न इस मौके पर उन अनछुई घटनाओं, हादसों की चर्चा की जाए. कुछ दिन पहले मैंने लिखा था कि १९७८ में कैसे भारतीय पत्रकारों को लाहौर हवाई अड्डे पर हिरासत में ले लिया गया था और कैसे एक पुलिस अधिकारी ने, जो अपने समय का जाना-माना तेज गेंदबाज था, समय पर हस्तक्षेप करते हुए उन्हें मुसीबत से छुटकारा दिलाया था. आज एक और बड़ा खुलासा यह होने जा रहा है कि १९८२-८३ सीरीज के दौरान मेहमान भारत और पाकिस्तान के खिलाड़ी किस तरह से अपने एक नशे में टुन्न साथी की बेहूदा हरक़तों के चलते पुलिस के शिकंजे में फंसे और कैसे उनको मुक्ति मिल सकी? लाहौर की वह एक सर्द रात थी…टेस्ट मैच प्रगति पर था ….खिलाड़ी पीने को बेताब …और माहौल जियाउल हक़ के चलते तालिबानी…मुल्क के सैन्य तानाशाह जिया उल हक़ ने न सिर्फ जुल्फिकार अली भुट्टो को फांसी पर लटका दिया था, बल्कि देश में पनपी जम्हूरियत की कली को भी मसल कर रख दिया था…ऐसे हालातों में शराब पीकर पकडे जाने पर अंग विशेष पर १०० कोड़े तो तत्काल नकद रसीद किये जाते थे और बाकी की सजा अलग से थी ही. इस माहौल में एशियाई ब्रैडमैन ज़हीर अब्बास को जर्रानवाजी सूझी. दोनों टीमों के अपने खासमखास खिलाडियों को उन्होंने लाहौर की सबसे पाश मगर सबसे पुरानी रिहायशी कालोनी गुलबर्ग में रहने वाले अपने एक नज़दीकी रिश्तेदार के घर दारू की दावत रखी. ज़हीर साहब जिगर मुरादाबादी से शायद वाकिफ नहीं थे, न ही उन्होंने कभी जिगर को पढ़ा ही होगा ….उस जिगर ने लिखा था…” जो जरा सा पी के बहक गया, उसे मैकदे से निकाल दो, ये कमज़र्फ का काम नहीं ये अहले ज़र्फ़ का काम है.“उस महफ़िल -ए -मैच में मोहसिन खान भी थे. कौन मोहसिन…? जिनके बारे में एक ख़ास बात आम रही क़ि `चरित्र’ उनकी गंजी थी, और जिसे वो रोज बदलते थे. पाकिस्तान के सलामी बल्लेबाज मोहसिन महज़ तीन पैग चढाने के बाद ही स्लाग ओवरों में चले गए …वे भूल गए क़ि मुफ्त में पी रहे शराब , माँ बदौलत ज़हीर के..तो कम से कम उनके रिश्तेदार की लड़कियां टीशू पेपर नहीं हैं क़ि कहीं हाथ पोंछे कहीं, मुह पोंछे ….लेकिन यही हुआ…लाख समझाया ..नहीं माने तो फिर भारत-पाक की संयुक्त टीम पर सोनी लिस्टन और मोहम्मद अली सवार हो गए …और फिर शुरू हो गया दे दना दन.. शराब की बोतलें और गिलास रॉकेट सरीखे चलते हुए शीशे तोड़कर बालकनी के पार नीचे गिरने लगे तो कालोनी की बंद बत्तियां भी खटाखट फिर से रौशन हो गयीं. …शरीफों के मोहल्ले में ये कौन नामाकूल हैं…? इसे जानने की कोशिश में लोगों ने पुलिस को इत्तला कर दी. `आयो लाल’ शैली में पुलिस आयी और झूले लाल शैली में लोगों को टांग कर ले गयी थाने. क्रिकेट इतिहास में ये पहला मौक़ा था जब दोनों टीमों के खिलाडियों को हवालात की सैर करनी पडी. इसके बाद देर रात तक कई अंकों में नाटक चला . चूंकि मामला भारत-पाक के खिलाड़ियों का था सो हर कोई सकते में आ गया था. यह खबर सार्वजनिक होने पर क्या होता, इसकी सोच ही सिहरन पैदा कर देती है. भला हो महान पूर्व पाकिस्तानी तेज गेंदबाज फज़ल महमूद साहब का जो उन दिनों लाहौर के आइजी थे और चार-पांच साल पहले भारतीय पत्रकारों को भी ऐसी ही एक जलालत से बचा चुके थे, फज़ल भाई एक बार फिर काम आये और खिलाड़ी बेआबरू होने से बाल-बाल बच गए. . सुबह हममे से किसी ने मैदान पर सूजे और सूखे चेहरे के साथ सीढियां उतर रहे मोहसिन को सुनाते हुए फब्ती कसी…’ उँगलियाँ उठेंगी सूखे हुए गालों की तरफ, एक नज़र देखेंगे गुज़रे हुए सालों की तरफ, लोग ज़ालिम हैं , हर एक बात का ताना देंगें`….बेचारे मोहसिन ने `धत’ कह कर निकल जाना ही बेहतर समझा. ये वही ज़नाब मोहसिन हैं जिन्होंने कुछ सालों बाद ही पहले रीना राय की चांदी की थाली में खाया और फिर उसी में छेद कर चलते बने. इलाहाबादी रीना कैबरे के रास्तों से निकल कर कई गलियों के मोड़ तय करते हुए बालीवुड पंहुचीं थीं. एक बिहारी बाबू अभिनेता से प्रेम की कचरकूट में कुछ वर्षों तक सोमनाथ का मंदिर बनीं और फिर मोहसिन के हत्थे चढ़ गयीं. वही मोहसिन अब पाक क्रिकेट बोर्ड के प्रबंधन में शामिल हैं. इस घटना के चंद महीनो बाद भारत दौरे पर आयी वेस्टइंडीज टीम के साथ कानपुर में खेले जा रहे पहले टेस्ट के विश्राम दिवस पर होटल में यह प्रसंग छिड़ने के दौरान दिलीप वेंगसरकर ने बड़ी मजेदार बात बताई. उन्होंने बताया कि पुलिस ने हम सभी को छोड़ तो दिया मगर जितनी भी शराब की बोतलें थी, वो सब पुलिस वालों ने आपस में बांट ली.

(पदम् पति शर्मा वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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