/दामन के दाग का दर्द..!

दामन के दाग का दर्द..!

-प्रणय विक्रम सिंह||

गुजरते साल की इस हाड़ कपकपा देने वाले सर्द मौसम के दरम्यान मन दरक सा गया है. मन दहाड़े मार-मार कर रो रहा है. भारत ने अपनी जुझारू बेटी को खो दिया है. कहते है कि उसका नाम दामिनी था. दामिनी की शहादत का दाग भारतीय सभ्यता के दामन पर लगा वह दाग है जो अब रहती कायनात तक धुल नहीं सकता पर मुझ जैसे करोड़ों अभिभावकों ने यह दाग अपने दामन के साथ-साथ अपने दिल पर लिया है. दामिनी तुम मर नहीं सकती क्योंकि तुमने तो मर कर इस मरे हुए समाज को जिन्दा कर दिया है. मेरी सोनचिरैया मन आहत है.

व्यंगचित्र: मनोज कुरील
व्यंगचित्र: मनोज कुरील

अब तुम्हारी खिलखिलाहट तुम्हारे बाबुल नहीं सुन पाएंगे. वह आंगन आज भी मायूसी से तुम्हारी बाट जोह रहा है जिसकी छाती पर तुमने अपना पहला कदम रखा था. हमारे पास तुम्हारे कराहते हुए 13 दिनों के लिए कोई मरहम नहीं था. हम शर्मिंदा हैं कि हम तुम्हें वह समाज नहीं दे सके जिसमे तुम खिल सकती लेकिन तुम्हारी कुरबानी जाया नहीं गयी. जो समाज देखना, सुनना बोलना प्रतिक्रिया करना भूल गया था वह आज चौराहों पर मातम कर रहा है. समाचारपत्रो में प्रकाशित हो रही तुम्हारे संघर्ष की दास्तान तुम्हारे लाखों बहनों,भाइयों और साथियों की मुऋियों को आंदोलित कर रही है.

Police detain a demonstrator in front of the India Gate during a protest in New Delhiआजाद भारत का पहला आन्दोलन है जो स्वस्फूर्त है. सडकों पर उमड़े हुजूम का कोई नेता नहीं है,हर प्रदर्शनकारी खुद में व्यवस्था के नाम बगावत का परचा बन गया है. तुम्हारी मौत की सच्ची खबर झूठी है. तुम जिन्दा हो उन लोगों के अहसास में जो पानी के तेज धारों के बीच अविचल खड़े रहे,तुम सांस ले रही हो उन लोगो में जो पुलिस की लाठियों के दर्द में तुम्हारी कराह की गूंज सुन रहे हैं. मेरी बच्ची तुम जिन्दा हो उन लाखों माता-पिता के आंसुओं में जिन्होंने तुम्हारी हर कराह में अपनी बेटी को मरते देखा. तुम कैसे मर सकती हो? मर तो गया है यह शवधर्मी समाज,उसकी सड़ी-गली परम्पराएं,उसकी बुजदिल मर्यादाएं. मैं जानता हूं बेटियां पराया धन होती है उन्हें तो एक दिन अपने बाबुल का आंगन छोड़ दूर उड़ ही जाना होता है. बेटी की विदाई तो हर बाबुल का स्वप्न होता है जो तुम्हारी जैसी करोड़ों बेटियों के जन्म लेने के साथ ही माता-पिता की आंखो में सजने लगता है, पर दामिनी ऐसी दुखद विदाई का सपना तो किसी ने भी नहीं देखा था.

तुम्हारी दुखद विदाई के साथ ही वर्ष 2012 भी विदाई की देहरी पर खड़ा है. अपने साथ खट्टे-मीठे अनुभवों और स्मृतियों की झोली हमें सौप कर वह अलविदा कह रहा है. वह झोली जब मैं देखता हूं तो ऐसा लगता है मानो बहुत कुछ किसी ने चुरा लिया हो. खाली सी लगती है वह थाती, जो 2011 ने जाते-जाते हमें सौंपी थी,उसको हम विरासत नहीं बना सके. समय तो गतिशील है,हमेशा एक समान नहीं रहता है. समय की यही परिवर्तनशीलता ही सृष्टि का आधार है. चांद,सूरज,तारे,गृह-नक्षत्र सभी कुछ उसकी परिवर्तनशील प्रवृति का परिणाम है. वर्ष,माह और दिन सभी कुछ समय को काल खंडों में मापने की मानवीय कवायदे हैं. इन्ही कोशिशो को अगर कैलेण्डर के खांचों में बाट कर गुजरते लम्हों द्वारा वक्त की पेशानी पर लिखी इबारत को पढने की कोशिश करें तो समय की निर्ममता का आभास होता है….मर्यादाएं टूटी तो अस्मत के लुटने का तमाशा बीच चौराहों पर हुआ.

INDIA

बाबुल की सोनचिरैया के पंख समाज के बबूलों में फंस कर नुच गए,तो सडक से संसद को चुनौती मिलने का क्रम टूटा नहीं बल्कि धीरे-धीरे संस्कार बन कर भारतीय लोकतंत्र की धमनियों में सांसे लेने लगा है. बन्दूक से समाज को बदलने की जिद पर अड़े नक्सली बूटों की धमक और वातावरण को विषाक्त करते बारूदों की गूंज से हिंदुस्तान का जम्हूरी आकाश लाल बना रहा.

जाते-जाते २०१२ ने इतने गंभीर घाव दिए हैं कि कराहने में भी दर्द ही होता है. दर्द से कराहना और कराहने में दर्द का आशय समझने वाले ठीक से समझते हैं. विश्व पटल पर उगते भारत को महाशक्ति के रूप में स्थापित करने की कवायदों को मर्यादाहीनता की चरमपंथी क्रियाओं से जबरदस्त धक्का लगा है. भारत में ऐसा पहली बार हुआ है कि जनता,नौजवान और समाज की बेटियां राजपद पर आकर आन्दोलन कर रहे हों और सरकार तथा पूरी व्यवस्था बेबस और लाचार नजर आए. वर्ष भर घटनाओं के थपेड़ों से जूझते भारत के समाज के लिए गम्भीर चुनौती सामने दिखाई पड़ रही है. एक तरफ यह उभार और दूसरी ओर तंत्र की विफलता लेकिन इसी के समानान्तर देश की राजनीति में एक युवा नायक के अभ्युदय को भी इस साल ने दिखाया है. देश के कई राज्यों में इस वर्ष चुनाव हुए. उत्तर प्रदेश में सर्वाधिक युवा नेतृत्व को सत्ता मिली तो उम्मीद बंधी की अखिलेश की चमक से यूपी रोशन होगा. हिमांचल में कमल मुर्झा गया और दागी बन चुके वीरभद्र सिंह को सिंहासन मिला साथ ही शपथ से ठीक पहले उन्हें बेदाग भी घोषित कर दिया गया. मोदी की धमक गुजरात चुनाव परिणामों में दिखी. विकास और सक्षम नेतृत्व के बल पर नरेन्द्र मोदी की हैट्रिक ने देश की राजनीतिक धारा को काफी हद तक हिलोरों में तब्दील किया है और निश्चित तौर पर २०१४ में होने वाले लोकसभा चुनाव के मुद्दों के अक्स और संकेत इसी साल मिलने भी लगे हैं. राजनीति में पहले ही उतर चुकी टीम केजरीवाल ने आखिरकार अपने राजनीतिक दल का नाम भी तय कर लिया. आम जनता के हितों की लड़ाई (?) लड़ रहे अरविन्द केजरीवाल और उनके सहयोगी आम आदमी पार्टी के जरिए अन्य राजनीतिक दलों से अलग दिखते हुए किस तरह अपनी पहचान बना पाएंगे इसका पता तभी चलेगा जब वे चुनाव मैदान में उतरेंगे. लेकिन केजरीवाल और उनके साथियों को इसका आभास होना चाहिए कि अब उन्हें उन अनेक सवालों से जूझना होगा जिनसे अभी तक उनका साबका नहीं पड़ा अथवा जिनके जवाब देने की उन्हें जरूरत नहीं पड़ी.

औद्योगिक उत्पादन में गिरावट-निर्यात में कमी के साथ व्यापार घाटे और खुदरा मुद्रास्फीति में वृद्धि के कारण आर्थिक मोर्चे पर व्याप्त निराशा और उदासी का माहौल साल भर कायम रहा. 2012 में निजाम की भ्रष्ट और लकवाग्रस्त सरकार के तौर पर बदनामी हुई, आर्थिक विकास दर धीमी रही, उच्च वित्तीय घाटे से जन्मी महंगाई निरन्तर बढ़ी. रेटिंग एजेंसिया मूडी और स्टैंडर्ड एंड पुअर ने पहले ही भारत की रेटिंग कम कर उसे कबाड़ माने जाने वाले देशों से केवल एक ज्यादा का दर्जा दिया था. दीगर है कि यदि भारत की रेटिंग कम होकर कबाड़ की श्रेणी में पहुंच जाती तो शेयर बाजार बुरी तरह गिर जाता और रुपये की कीमत 60 रुपए प्रति डॉलर हो जाती. इससे तेल सहित तमाम आयातों के दाम बढ़ जाते और महंगाई दहाई के अंकों में पहुंच जाती. इन आशंकाओं ने मनमोहन सिंह और चिदंबरम के जैसे सुधारवादियों के हाथ मजबूत किए. आखिर में सोनिया गांधी भी उनके साथ आई और खुदरा क्षेत्र में एफडीआई पारित हो गया. इसके बाद जनवरी 2013 से लाभार्थियों को 51 जिलों में सीधे नकदी हस्तांतरण का प्रस्ताव आया जिसे 2014 में सारे देश में लागू किया जाएगा. इसमें भी जोखिमें हैं. कई बाधाएं आना लाजिमी है. संभव है कि कई पात्र लोग छूट जाएंगे जबकि कुछ अपात्रों को नकद पैसा मिल जाएगा. किंतु समय के साथ यह अनियमितताएं भी ठीक की जा सकती हैं.

भ्रष्टाचार का दर्द साल भर सालता रहा. विरोधी संस्था ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की रिपोर्ट के मुताबिक इस वर्ष भ्रष्टाचारी देशों की सूची में भारत का 84वां स्थान है. एक लाख 86 हजार करोड़ रुपये के कोयला घोटाले में तो आज तक नैतिक आधार पर किसी की भी सत्ता से विदाई नहीं हुई लेकिन लगभग 70 हजार करोड़ रुपये के बताये जा रहे राष्ट्रमंडल खेल घोटाले में कुछ लोग जेल तो गये, पर उन्हें वाकई कोई सजा मिल पायेगी, इसमें आम आदमी को तो शक है. शक हो भी क्यों नहीं, जब उन्हीं जेल जा चुके चेहरों में से एक को संसद की समिति का सदस्य बना दिया जाये और दूसरे को भारतीय ओलंपिक संघ का महासचिव. बेशक यह बेलगाम भ्रष्टाचार सिर्फ राजनीति में ही नहीं है, नौकरशाही भी इसमें खूब गोते लगा रही है. तभी तो बड़े अधिकारियों से लेकर छोटे बाबुओं तक से करोड़ों की बरामदगी हुई, पर सरकार के चेहरे पर शिकन नजर नहीं आती. भ्रष्ट आचरण से ऐसा माहौल बनता है जिसमें साफ-सुथरी प्रतिस्पर्धा के लिए जगह नहीं बचती है, आर्थिक प्रगति अवरुद्ध होती है और अंततरू भारी नुकसान होता है. यह वर्ष मुम्बई हमले के प्रमुख आरोपी कसाब के अपने अंजाम को प्राप्त होने को गवाह बना. उसे फांसी के फंदे पर झूलता हुआ देख कर आहत राष्ट्र को थोड़ा करार जरूर मिला है, लेकिन राष्ट्र के सवा अरब लोगों की सामूहिक चेतना अफजल गुरु जैसे अनेक मास्टर माइंड को फांसी पर लटकते देख कर ही संतुष्ट होगी. आशा है, वह दिन भी शीघ्र ही आएगा. वैश्विक धरातल पर महाबली अमेरिका में राष्ट्रपति के रूप में ओबामा के पुनरू निर्वाचन ने उदारवाद के युग के शेष होने की मुहर लगा दी. जिस तरह अमेरिका में प्रवासी गोरी जर्मन बिरादरी ने थोक में काले ओबामा को मत दिए उससे अमेरिकी समाज की विस्तृत सोच का सन्देश समूची दुनिया में गया है. आशा है रणनीतिक स्तर पर अमेरिका और भारत अधिक नजदीक आएंगे. फिलिस्तीन को यूएनओं में मिली मान्यता ने दुनिया के एक ध्रुवीय होते जा रहे की आशंका पर झुठला दिया है. पदोन्नति में आरक्षण की मांग ने सियासत ही नहीं पूरे समाज को झकझोर दिया. आरक्षण की बुनियादी आधार पर चिन्तन मनन भी शुरू हो गया पर इस विभाजनकारी मांग ने पारित होने से पहले समाज को तकसीम करना शुरू कर दिया है कर्मचारी संगठनों में हुआ विघटन इस बात की गवाही दे रहा है. सेना और सरकार के विवाद ने कुछ नए सवालों को जन्म दिया तो देश में बेरोजगारों को मिल रहे बेरोजगारी भत्ते ने युवाओ को बड़ा सहारा भी दिया. आतंकवाद ने हमेशा की तरह देश की आत्मा को लहूलुहान किया किन्तु केंद्र और सूबाई सरकारों की मतभिन्नता के कारण इस वर्ष भी आतंक से लडने की साझा रणनीति तैयार नहीं हो सकी. नक्सलियों का कहर आधे देश को लाल करता रहा जिला कलेक्टर से लेकर विधायक तक उनके दुस्साहस का शिकार बने.

यह सही है कि देश ने इस एक साल में बहुत सी उपलब्धियां हासिल की लेकिन देश ने जो खोया है उसे वापस पाना बहुत मुश्किल है. भारत की विरासत से उसकी थाती खिसकी है और गुब्बारा हाथ आया है. गुब्बारे से जीवन नहीं चल सकता. थाती का खिसकना दुखदाई होता है और उसे वापस पाना उससे भी कठिन है. यहां यह भी उल्लेख करना समीचीन होगा कि अनगिनत हस्तियां जिन पर हम नाज किया करते थे इस साल हमसे जुदा हुई हैं. चित्रपट से राजेश खन्ना और यश चोपड़ा का जाना सामान्य घटनाएं नहीं हैं. दारा सिंह का महाप्रयाण,भीमसेन जोशी और पण्डित रविशंकर का निर्वाण जैसी दुरूखद घटनाओं को न यह देश भूल पाएगा और न कला जगत. राजनीति, खेल, कला, संगीत, साहित्य और सृजन की दुनिया से और भी बड़ी नामचीन प्रतिभाएं इस साल पृथ्वी से विदा हुईं जिन्हें अब हम केवल श्रद्धांजलि ही दे सकते हैं. यह साल वास्तव में एक सामान्य वर्ष की तरह नहीं बल्कि एक ऐतिहासिक युग की तरह गुजरा है. इस गुजरते २०१२ को आखिरी सलाम करते हुए यही कामना है कि नव वर्ष के नव प्रभात की नवीन रश्मियां नयी आशाओं का संचार करेंगी. यह देश नूतन ऊर्जा के साथ नए समाज को रचने की ओर अग्रसर होगा जहां भय, भूख, भ्रष्टाचार समेत अनेक समस्याओं के समाधान मौजूद होंगे इसी आशा के साथ सभी सुधी पाठको को नूतन वर्ष की मंगल कामनाएं.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.