Loading...
You are here:  Home  >  दुनियां  >  देश  >  Current Article

पुराने वर्ष को जरूर विदा करें मगर अपनी बुराइयों के साथ..

By   /  December 31, 2012  /  2 Comments

    Print       Email
इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..

– डॉ. दीपक आचार्य||
पूरी दुनिया साल भर बाद आज फिर पुराने वर्ष को विदा देने के लिए जबर्दस्त उतावली और आतुर है. इसी दौड़ में हम भारतीय भी पिछलग्गू बने हुए सन् 2012 को अलविदा कहने के लिए क्या-क्या नहीं कर गुजर रहे हैं.welcome
कई दिनों से हमने जाने कितने जतन किये हैं अपने इस वर्ष को विदा देने के लिए. धूम-धड़ाका, शोर-शराबा और वो सारे संसाधन-सेवाओं का पूरा-पूरा और चरम उपयोग करने को व्यग्र हैं. कब काली रात आए और पुराने वर्ष को विदा देकर अंधेरे में ही नए वर्ष का स्वागत करें.
जो हम आज कर रहे हैं वह हम हर साल ही करते और दोहराते हैं. हमें वर्ष के पुराने और नए हो जाने से कोई और सरोकार हो या न हो, मगर इतना भर जरूर है कि हम इस दिन पूरे यौवन के साथ उन्मुक्त और स्वच्छंद हो जाते हैं और लगता है जैसे आज के दिन हम सारी बुराइयों और व्यसनों का भरपूर आनंद ले लेने के बाद नए साल में उन सभी को छोड़ देंगे जिसे समाज में बुरा व हीन समझा जाता है.
यह वर्ष संक्रमण ऎसा ही है जैसे कि विज्ञापन आते हैं शादी के पहले और शादी के बाद. यानि कि पुराने वर्ष की विदाई और नए वर्ष का अभिनंदन. यह बीच का काल ही ऎसा है कि हर व्यक्ति इस समय सोचता है कि वह पुराना कुछ छोड़ेगा और संकल्प लेगा कुछ नया करने का. लेकिन कितने लोग हैं जो अपने मन को दृढ़ संकल्प से बंधा रख पाते हैं. शायद नहीं.
थोड़े से बिरले लोगों को छोड़ दिया जाए तो अधिकांश हमारी तरह ऎसे ही हैं जो बाहरी आनंद पाने के अवसरों का पूरा उपभोग और उपयोग कर लिए जाने के बाद भी कुछ नया नहीं कर पाते हैं. और वहीं की वहीं रहते हैं जहां वर्षों पहले हुआ करते हैं.
न कुछ बदलाव आ पाता है, न कोई बदलाव ये ला पाते हैं. बदलाव सिर्फ इतना ही आता है कि ये लोग धीरे-धीरे आयु बढ़ाते हुए उस दिशा में बढ़ते रहते हैं जहाँ से वापस लौटना कभी संभव नहीं हो पाता है.
पुराने वर्ष को जब भी विदाई दें तब उन सारी बातों का लेखा-जोखा अपने सामने रखें जिनकी वजह से हमारे व्यक्तित्व में कमजोरियों को देखा गया, जिन बातों या विषयों ने हमें उद्विग्न, अशांत, दुःखी और व्यथित किया हो, जिन मामलों में हम असफल रहे हों, जिन बुराइयों और व्यसनों ने हमें मोहपाश में डाल रखा हो.
उन सभी विषयों का चिंतन करने के बाद इनका ध्रुवीकरण करें और उन विषयो को अलग से सूचीबद्ध करें जो हमें पुराने वर्ष के साथ ही अपने जीवन से विदा कर देनी हैं. जो अच्छी और प्रेरणादायी बातें हैं उन्हें सहेज कर और अधिक पल्लवन और विस्तार के लिए अगले वर्ष की ओर सहेज कर ले जाएं.
बुराइयों और व्यसनों तथा कमजोरियों को अपने जीवन से तिलांजलि न दे सकें तो पुराने वर्ष को विदाई देने या नए वर्ष का स्वागत करने के नाम पर धींगामस्ती और जायज-नाजायज जतन करने का कोई औचित्य नहीं है.
यह समय ही वह संक्रमण काल है जब हमें नए परिवेश और माहौल में प्रवेश से पहले अनुपयोगी विचारों और बुराइयों को हमारे जीवन से बाहर निकाल फेंकना होता है और पूरी ऊर्जा एवं उत्साह से नए वर्ष में प्रवेश करना होता है. पर बहुधा ऎसा सब लोग नहीं कर पाते हैं.
हमारे अपने इलाके की बात हो या कहीं दूर की, अपने मित्रों या परिचितों की बात हो या अपने संपर्क में आने वाले लोगों की, उन्हें देखें तो साफ पता चल जाएगा कि ये लोग पिछले कई सालों से पुराने वर्ष को विदा देने और नए वर्ष का स्वागत करने के लिए क्या-क्या जतन नहीं करते रहे हैं और पुराने-नवीन वर्ष के नाम पर कितने बड़े पैमाने पर उन्मुक्त होकर मौज उड़ाते रहे हैं फिर भी इनमें कोई बदलाव अब तक नहीं आ पाया है और जैसे थे वैसे ही आज भी हैं.
ऎसे में पुराने साल को विदा देने तथा नए साल का स्वागत करने के नाम पर आजकल जो कुछ हो रहा है उसके मूल मर्म के बारे में किसी को कुछ भी समझाने की आवश्यकता नहीं हैै.
नव वर्ष का स्वागत भी करें और पुराने वर्ष को विदाई भी दें मगर इसके नाम पर कुछ ऎसा करें कि जीवन में साल-दर-साल कुछ न कुछ बदलाव आए और उसका प्रभाव हमारे जीवन पर दिखे भी सही. तभी सार्थक हैं हमारे जतन, वरना पुराने-नये वर्ष के नाम पर नौटंकी करने का कोई मतलब नहीं है.

Facebook Comments

इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..
    Print       Email

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

2 Comments

  1. Ramesh Sharma says:

    जी हाँ, यह एक अलग किस्म का दरबार है. मीडिया दरबार…!!!

  2. जो हम आज कर रहे हैं वह हम हर साल ही करते और दोहराते हैं. हमें वर्ष के पुराने और नए हो जाने से कोई और सरोकार हो या न हो, मगर इतना भर जरूर है कि हम इस दिन पूरे यौवन के साथ उन्मुक्त और स्वच्छंद हो जाते हैं और लगता है जैसे आज के दिन हम सारी बुराइयों और व्यसनों का भरपूर आनंद ले लेने के बाद नए साल में उन सभी को छोड़ देंगे जिसे समाज में बुरा व हीन समझा जाता है.पुराने वर्ष को जब भी विदाई दें तब उन सारी बातों का लेखा-जोखा अपने सामने रखें जिनकी वजह से हमारे व्यक्तित्व में कमजोरियों को देखा गया, जिन बातों या विषयों ने हमें उद्विग्न, अशांत, दुःखी और व्यथित किया हो, जिन मामलों में हम असफल रहे हों, जिन बुराइयों और व्यसनों ने हमें मोहपाश में डाल रखा हो.उन सभी विषयों का चिंतन करने के बाद इनका ध्रुवीकरण करें और उन विषयो को अलग से सूचीबद्ध करें जो हमें पुराने वर्ष के साथ ही अपने जीवन से विदा कर देनी हैं. जो अच्छी और प्रेरणादायी बातें हैं उन्हें सहेज कर और अधिक पल्लवन और विस्तार के लिए अगले वर्ष की ओर सहेज कर ले जाएं.बुराइयों और व्यसनों तथा कमजोरियों को अपने जीवन से तिलांजलि न दे सकें तो पुराने वर्ष को विदाई देने या नए वर्ष का स्वागत करने के नाम पर धींगामस्ती और जायज-नाजायज जतन करने का कोई औचित्य नहीं है.नव वर्ष का स्वागत भी करें और पुराने वर्ष को विदाई भी दें मगर इसके नाम पर कुछ ऎसा करें कि जीवन में साल-दर-साल कुछ न कुछ बदलाव आए और उसका प्रभाव हमारे जीवन पर दिखे भी. तभी सार्थक हैं हमारे जतन, वरना पुराने-नये वर्ष के नाम पर नौटंकी करने का कोई मतलब नहीं है.

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

You might also like...

जौहर : कब और कैसे..

Read More →
Page Reader Press Enter to Read Page Content Out Loud Press Enter to Pause or Restart Reading Page Content Out Loud Press Enter to Stop Reading Page Content Out Loud Screen Reader Support
%d bloggers like this: