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2013 की चिंता और चुनौतियां…

By   /  January 1, 2013  /  No Comments

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-डॉ. आशीष वशिष्ठ||

बनने-बिगडऩे के ढेरों कारनामें अपने दामन में समेटकर 2012 भारी जनाक्रोश, आंदोलन और लोकतंत्र के चारों खंभों को हिलाकर विदा हो गया। बीता हुआ वर्ष कई कारणों से आने वाले कई वर्षों तक याद रखा जाएगा। विदा होते-होते देश के दामन पर दामिनी बलात्कार कांड का गहरा दाग लगा जिसने विश्व बिरादरी के सामने हमे असभ्य, असंस्कृत और नारी अस्मिता का सम्मान न करने वाला राष्ट्र प्रमाणित किया। देश के कई राज्यों को नवीन एवं युवा नेतृत्व मिला तो वहीं तमाम विपक्षी दल भी चाहकर मोदी को गुजरात के सीएम की कुर्सी पर बैठने से रोक नहीं पाये। मैंगो पीपुल के कमेंटस ने आम आदमी पार्टी का प्रादुर्भाव कराया तो वहीं पूर्व सेनाध्यक्ष भी खुद को आम आदमी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर सरकार के विरोध में नारे लगाता दिखा।

जिसने भी सरकार के विरोध में मुंह खोला उसे बंद करने का सरकार ने ऐड़ी चोटी का जोर लगाया चाहे भले ही वो कैग हो या फिर आम आदमी। सरकार की हठधर्मिता, बेशर्मी, नाकामी पग-पग पर झलकी तो वहीं प्रशासनिक अमला भी लगभग हर मोर्चे पर फेल दिखाई दिया। मुंबई पर हमला करने वाले आंतकी अजमल कसाब को फांसी पर लटकाकर सरकार ने आंतकवाद के खिलाफ हार्ड मैसेज तो दिया लेकिन जेलों में बंद तमाम दूसरे आंतकियों पर उसकी चुप्पी उसे प्रश्नों के कटघरे में खड़ा करती है। दामिनी की मौत के बाद बलात्कार राष्ट्रीय प्रश्न और मुद्दा बनकर उभरा है और कड़े कानून की वकालत और कसरत शुरू  हो गयी है लेकिन सरकार के लिए बीते हुए वर्ष की भांति आने वाले वर्ष में चिंता और चुनौतियों का हिमालय समक्ष खड़ा है जिससे पार पाने के लिए उसे जूझना और कठोर परिश्रम करना होगा।

व्यंगचित्र: मनोज कुरील

व्यंगचित्र: मनोज कुरील

कहते है अंत भला तो सब भला। लेकिन 2012 के अंत ने पूरे देश को रूला गया। जब आप बीते हुए वर्ष की स्मृतियां समेटेंगे तो दुख का सागर आंखों में उमड़ आएगा। एक ओर प्रकृति ने कहर बरपाया तो दूसरी और हमने मानवता को शर्मसार किया। अमेरिकी पत्रिका टाइम ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को कवर पेज पर अंडर अचीवर बताया था। इस वर्ष घोटाले दर घोटाले खुले रहे, मंहगाई बढ़ती रही और जनता क्रोध और आंदोलन के  मूड में रही। राष्ट्र के समक्ष सैंकड़ों ऐसी समस्याएं और मुशिकलें हैं जो वर्षों से सिरदर्द बनी हुई हैं और राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव उनका निराकरण नहीं हो पा रहा है। यूपीए सरकार की मुशिकलें  कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। एक के बाद एक घोटालों का जो भंडाफोड़ हो रहा है उसने सरकार की रातों की नींद छीन रखी है। संसद का मानसून और शीतकालीन सत्र हंगामे की भेंट चढ़ चुका है। जनहित के दर्जनों बिल संसद पटल पर अपने पास होने की प्रतीक्षा सूची में हैं। भ्रष्टाचार ने देश की आर्थिक गति को तो  अवरूद्ध किया ही है वहीं सामाजिक, राजनीतिक और सार्वजनिक को भी गंधा दिया है।

कोलगेट के नाम से प्रसिद्ध कोल ब्लॉक आवंटन के मामले में सरकार सांसत में रही। पीएम से सीएम तक पर सवाल उठा। सत्ता पक्ष चाहे विपक्ष सब पर इसकी कालिख लगी। सरकार को उत्तर देना मुश्किल पड़ा। संसद का मानसून सत्र इसकी भेंट चढ़ा। महाराष्ट्रमें सिंचाई घोटाले में उप मुख्यमंत्री को कुर्सी गंवानी पड़ी तो उत्तर प्रदूश में एनआरएचएम घोटाले में मंत्री से संतरी तक फंसे। राजनीतिक उठापटक का दौर जारी रहा। अन्ना और रामदेव के आंदोलनों से सरकार बारम्बार हिलती रही। सरकार ने अन्ना और रामदेव के आंदोलन को कुचलने का हर संभव प्रयास किया जिससे आम आदमी की दृष्टिï में उसकी नकारात्मक छवि बनीं। लेकिन इन अन्ना और रामदेव के आंदोलन ने आम आदमी की वर्षों से सुप्त पड़ी चेतना को जगाने का महान कार्य किया। टीम अन्ना से अलग होकर अरविंद केजरीवाल ने राजनीतिक दल का गठन किया। कांग्रेस और भाजपा का विधानसभा चुनाव में मिलाजुला वर्ष रहा। दोनों दलों को सबसे बड़ा झटका उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में लगा। पिछले कई वर्षों से उत्तर प्रदेश में अपनी खोई जमीन और प्रतिष्ठा को पाने के लिए दोनों दल संघर्ष करते ही दिखे। हिन्दी पट्टीके सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी ने ऐतिहासिक जीत हासिल कर कीर्तिमान तो स्थापित किया ही वहीं प्रदेश को अबतक का सबसे युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के रूप में मिला। गुजरात विधानसभा चुनाव पर देश और दुनिया की नजर थी। तमाम कोशिशों के बावजूद मोदी कुर्सी बचाने में सफल रहे। मोदी का बढ़ता कद कांग्रेस और विशेषकर राहुल गांधी के समक्ष बड़ी चुनौती बनकर उभरा है।

आम आदमी आवश्यकताओं, पीड़ा और कष्ट को समझने में सरकार पग-पग पर असफल दिख रही है। मंहगाई ने आम आदमी की मुश्किलें बढ़ा रखी हैं। मूल्यों पर नियंत्रण करने की बजाय सरकार उदारवादी नीतियों के नाम पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हाथों देश को परतंत्र करने का जाल बुन रही है। खुदरा बाजार में विदेशी निवेश को हरी झंडी दिखाकर सरकार ने खुदरा व्यापार से जुड़े लाखों व्यापारियों और उनके परिवारों को फुटपाथ पर लाने का कुचक्र रच दिया है।  देश में आम वस्तुओं की जमाखोरी, काला बाजारी, अनियंत्रित कीमते, मांग और पूर्ति का गड़बड़ाता चक्र, व्यापारिक वर्ग और औद्योगिक घरानों की दबंगई के सामने सरकार और सरकारी मशीनरी नतमस्तक है। सरकार और कृषिमंत्री के पास वही रटे-रटाएं बहाने हैं। मंहगाई की समस्या सरकार के लिए सिरदर्द बनी रहेगी इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है।

व्यंगचित्र: मनोज कुरील

व्यंगचित्र: मनोज कुरील

सीमापार व देश में पनप रहा आंतकवाद पिछले कई दशकों से देश की सुरक्षा एजेंसियों के लिए चुनौती बना हुआ है। मुंबई में आंतकी घटना के अपराधी आंतकी अजमल कसाब को फांसी की सजा देकर सरकार ने विश्व समुदाय को कठोर संदेश दिया है कि आंतकवाद को अब और नहीं सहा जाएगा, लेकिन इस मोर्चे पर काफी कार्य शेष है। नक्सलवादी सरकार और तंत्र के लिए बड़ा सिरदर्द बने हुएह हैं।  बीते वर्ष में कई प्रदेशों विशेषकर असम और उत्तर प्रदेश में हुए संाप्रदायिक दंगों ने खुफिया तंत्र की नाकामी को उजागर किया है वहीं देश की आंतरिक सुरक्षा, शांति और सौहार्द के लिए खतरा बनकर उभरा है।

गत वर्ष की भांति नये वर्ष में भी समस्याएं और परेशानियां जस की तस दिख रही हैं। मंहगाई, गरीबी, आर्थिक असमानता, राजनीतिक उठापटक, किसानों के अंतहीन कष्टï, अशिक्षा, अनपढ़ता, महिलाओं और बुजुर्गों के प्रति बढ़ते अपराध और अत्याचार का लंबी कतार सरकार और राष्टï्र के समक्ष मुंह बाए खड़ी हैं। सरकार का हठधर्मी और निर्लज्ज व्यवहार लोकतांत्रिक परंपरा, नीति, व्यवस्था और आस्था को चूर-चूर कर रहा है। केंद्र और राज्य सरकारों के बीच मतभेद और तनातनी, कानून और प्रशासन की बिगड़ती स्थिति, जनसंख्या विस्फोट, खस्ताहाल स्वास्थ्य सेवाओं के साथ मूलभूत सुविधाएं यथा रोटी, कपड़ा और मकान की समस्या भेंटस्वरूप ही मिलेगी। गुर्जरों एवं जाटों के आरक्षण और प्रोन्नित में आरक्षण की आग दिनों-दिन फैलती जा रही है, इनसे निपटना सरकार के लिए बड़ी चुनौती होगी। वहीं विदेश नीति, रक्षा नीति, आर्थिक मोर्चे पर सरकार को मुश्किलों का सामना करना होगा। राजनीतिक मोर्चे पर देश की राजधानी दिल्ली सहित कई राज्यों में विधानसभा चुनाव तो होंगे ही वहीं मध्यावधि आम चुनावों को लेकर भी कयास लग रहे हैं ऐसे में यूपीए और एनडीए का अपने कुनबे को जोडक़र रखना मशक्कत का काम होगा। महिलाओं के प्रति अपराधों पर रोक लगाने के लिए सरकार कानून में आवश्यक संशोधन करेगी इसकी संभावना है।  सार यह है कि पिछले वर्ष की भांति सरकार को चिरपरिचित समस्याओं के साथ ही साथ नयी समस्याओं से निपटने की चुनौती मिलेगी।

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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