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राज्याश्रय वैभव दे सकता है, आत्मीय लोक-प्रतिष्ठा कभी नहीं..

By   /  January 1, 2013  /  No Comments

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– डॉ. दीपक आचार्य||

समाज में विभिन्न प्रकार की धाराओं का प्रवाह हर युग में बना रहता है. व्यक्ति अपनी जड़ों को मजबूत बनाने और अपनी लोकप्रियता बढ़ाने के लिए निरन्तर उन सारे कर्मों का सहारा लेता रहता है जो कभी अच्छे और कभी बुरे  माने जाते हैं.donkeyelephant

लेकिन इतना जरूर है कि आदमी अपनी ही अपनी मान-बड़ाई और ख्याति पाने के लिए वह सब कुछ कर देने के लिए तत्पर हो जाता है जिससे उसे कहीं न कहीं से लाभ या सम्मान पाने की उम्मीद हो.

जीवन भर कुछ न कुछ पाने और निरन्तर जोड़ते रहने, बहुधा हराम का कुछ न कुछ पा जाने की उम्मीद में आदमी अपने सिद्धान्तों और आदर्शों की बलि चढ़ाने से भी नहीं चूकता.

अपनी विद्वत्ता और बुद्धि तथा ईश्वरीय संबल का भरोसा रखने वाले लोग खुद की मेहनत और बौद्धिक बल के सहारे आगे बढ़ने के लिए प्रयत्नशील रहते हैं और कालजयी लोकप्रियता प्राप्त करने में सफल हो जाते हैं.

यह आत्मीय सफलता का आनंद ही उन्हें इतना सुकून दे जाता है कि उन्हें सुकून का अहसास करने के लिए किसी और माध्यम की कोई तलाश नहीं हुआ करती.

ये लोग लोक प्रतिष्ठित भी होते हैं और वर्षों से लेकर सदियों तक इनके कर्म को सराहा जाता है. ये लोग जो कुछ होते हैं वह लोक धाराओं की बदौलत.

आदमियों की एक दूसरी किस्म ऎसी है जो कि परायेपन के आधार पर जीवित रहती है और इनका पल्लवन पराश्रित होकर या राज्याश्रित होकर ही संभव है.

ऎसे लोगों में बुद्धिवाले भी हो सकते हैं, अद्र्ध बुद्धि वाले भी और मंद बुद्धि वाले भी. होशियार भी हो सकते हैं और डेढ़ होशियार भी. इन सभी में से जिन्हें अपनी बुद्धि और कौशल पर भरोसा होता है वे भी, और जिन्हें नहीं होता है वे भी हमेशा चकाचौंध और सम्मान की भूख के मारे अपने कत्र्तव्य कर्मों को भूल-भुलाकर उन रास्तों का सहारा ले लेते हैं जिन पर स्वाभिमान और गौरव भले न मिले, पर सम सामयिक सम्मान या प्रतिष्ठा का अहसास तो कर ही सकते हैं, चाहे वह क्षणिक और मिथ्या ही क्यों न हो.

सम्मान और प्रतिष्ठा की तीव्र भूख के आगे ये लोग सब कुछ कर लेने और करवा लेने के लिए विवश और आतुर रहते हैं. इन लोगों को लोकधाराओं के सम्मान की कोई दरकार नहीं होती है बल्कि हमेशा किसी न किसी का सहारा पाकर ये छलांग लगाते, कूद-फांद करी आगे बढ़ने की दौड़ में श्रेष्ठ धावक के रूप में लगे रहते हैं.

अनुशासन और मर्यादाओं के बाड़ों से एक बार छलांग लगा कर बाहर निकल जाने के बाद तो इनका सारा डर इतना टूट चुका होता है कि ये जमाने भर के सारे बाड़ों और चहारदीवारियों को फाँदते हुए बंदरिया उछलकूद करते हुए न जाने कहां से कहां पहुंच जाते हैें. यह बंदरिया अभिनय और बाड़ों से छलांग लगा लेने के नायाब और नवाचारों से भरे-पूरे करतब ही हैं जो इन्हें जमीन से ऊपर ही ऊपर पहुंचा देने का कौशल रखते हैं.

अपनी सारी आदमीयत को अलविदा कह देने वाले ये लोग कभी किसी की परिक्रमा में रम जाते हुए तरह-तरह के नृत्य करने लगते हैं, कभी अहर्निश उनका जयगान करते रहते हैं जिनसे इन्हें थोड़ा सा संबल मिल जाया करता है और कभी उन सारी हदों को पार करते हुए अपने आकाओं के सामने ऎसे पसर जाते हैं जैसे कि भगवान ने यह मनुष्य देह उन्हें इसीलिए नवाजी है.

अपने लाभ और स्वार्थ पूरे करने की खातिर ये लोग अपने माँ-बाप, बंधु-भगिनियों, घर वालों से लेकर पास-पड़ोस, जाति-बिरादरी से लेकर क्षेत्रवासियों तक को भूल जाते हैं और स्वार्थ की किसी मछली की तलाश में एकाग्र बगुले की तरह व्यवहार करते हैं.

उनकी यह साधना ही है कि वे उन सभी भोगों को प्राप्त कर लेते हैं जो उन्हें इच्छित होता है. वे चाहकर भी नहीं प्राप्त कर सकते हैं तो वह है सर्वस्पर्शी व्यक्तित्व और आत्मीयता.

हमारे अपने क्षेत्र की ही बात क्यों करें, अपने इलाके भर में और दूसरी जगहों पर भी ऎसे खूब लोग हैं जो मिथ्या प्रतिष्ठा और दंभ में अपनी कुल परंपरा, वंश गौरव और स्वाभिमान को गिरवी रखकर ऎसी-ऎसी हरकतों में जुटे हुए हैं जिनसे मानवता शर्मसार होने लगी है.

पर जिन लोगों को अपने स्वार्थ से मतलब है वे नालायक लोग अव्वल दर्जे के बेशर्म होते हैं इस कारण लोगों की नज़रों में भले ही वह इंसानियत का अपमान हो लेकिन इन लोगों को यही लगता है कि वर्तमान युग के वे सिकंदर ही हैं और जब तक आकाओं का वरदहस्त उन पर है, तब तक उनका वैभव रहेगा ही रहेगा.

खुद भी अमरत्व का उद्घोष करते हैं और अपने आकाओं के लिए अमरत्व पाने की निरन्तर कामना करते रहते हैं क्योंकि आकाओं की मौजूदगी है तभी तक उनका वजूद है, वरना उनमें खुद में ऎसी कौनसी प्रतिभा है कि जमाने भर को भ्रम में रख पाएं.

आजकल ऎसे लोगों की भरमार हो चली है जो इंसानियत की बजाय जाने कौनसी हैवानियत का आवाहन करने में लगे हुए हैं. सच में कोई अवगुणों का साकार रूप देखना चाहे तो इन लोगों की जिन्दगी अपने आप में पूरी फिल्म है.

लोकधाराओं से प्रतिष्ठित व्यक्तित्व हृदयस्पशी और आत्मीय अनुभूति कराने वाला होता है जबकि राज्याश्रयी या पराश्रित व्यक्तित्व आभासी से कहीं कुछ अधिक नहीं होता.

जितनी हवा फूंकी होगी, उतना चलेगा, फिर धड़ाम. हमारे यहाँ पुतले भी खूब हैं और इनकी संख्या से कहीं ज्यादा हैं इनमें हवा भरने वाले. और इससे भी कहीं ज्यादा हवा निकालने और हवा खिसका देने वाले हैं.

जो लोग जीवन निर्माण के संकल्पों के साथ कुछ कर गुजरने के लिए निकल पड़े हैं उनके लिए लोकाश्रय और खुद पर भरोसा ज्यादा जरूरी है क्योंकि यही अपने व्यक्तित्व विकास का आधार है.

राज्याश्रयी या पराश्रयी लोगों का वजूद ज्यादा समय तक टिक नहीं पाता और जितना ज्यादा ऊँचा चढ़ता है या दिखता है, उतना ही तेजी से जमीन पर गिर भी जाता है. इसलिए जो कुछ करें अपने दम पर करें, परायों के दम पर तो वे लोग चलते और जीते हैं जिनमें आदमी होने के लक्षण या पुरुषार्थ का माद्दा नहीं हुआ करता.

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  • Published: 5 years ago on January 1, 2013
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  • Last Modified: January 1, 2013 @ 10:24 pm
  • Filed Under: समाज

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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