/नेतृत्व को नकारती भीड़…

नेतृत्व को नकारती भीड़…

-डॉ. आशीष वशिष्ठ||

दिल्ली में चलती बस में हुये कुख्यात बस रेप काण्ड के विरोध में दिल्ली समेत देश भर में विरोध दर्ज कराने और आरोपियों को कड़ी सजा की मांग के लिए सडक़ों पर लाखों की संख्या में एकत्र हुई भीड़ नेतृत्व विहीन थी. भारत जैसे देश में जहां आम आदमी को केवल वोट समझा जाता हो, जहां आम आदमी की स्थिति पशुओं से भी बदतर हो, आम आदमी साढ़े छह दशकों के उपरांत भी मूलभूत सुविधाओं से वंचित हो, जहां आम आदमी की नियति हाथ जोडक़र जी हजूरी करना माना जाता हो, जहां जात-पात, वोट बैंक की राजनीति सिर चढक़र बोलती हो, जहां विधायिका स्वयं को संसद और संविधान से ऊपर मानती हो, जहां नेता देश को अपने पिताजी की जागीर समझते हों, जनता से दुव्यर्वहार और विश्वासघात को अपना धर्म समझते हों, जहां प्रजातंत्र केवल नाममात्र का ही शेष हो. प्रजा पर तंत्र पूरी तरह हावी हो चुका हो, जहां जनता दो जून की रोटी के फेर में चौबीस घंटे व्यस्त रहती हो वहां शक्तिशाली सत्ता और मशीनरी के समक्ष आम आदमी का एकजुट होकर सरकार के विरुद्ध मोर्चा खोलना इस शताब्दी की बड़ी घटनाओं और में से एक है. स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरांत ये शायद पहला ऐसा अवसर होगा जब देश की जनता किसी मुद्दे पर स्वस्फुर्त होकर सडक़ों पर बिना किसी नेतृत्व के निकली हो. देश के आम आदमी के परिवर्तित व्यवहार और आचरण से विधायिका और कार्यपालिका के माथे पर गहरी चिंता की लकीरें उभर आई हैं.14558_4972058268116_1673419196_n

जनता के अभूतपूर्व प्रदर्शन और राजनीतिक दलों को घास न डालने की इस हरकत से सत्ता के शिखर पर बैठे महानुभावों गहरे सदमें में हैं. जनता के आक्रोश को ठण्डा करने के प्रयास जारी हैं लेकिन एक प्रश्न बारम्बार राष्ट्र के नीति निर्माताओं और सत्ताधीशों के मनोमस्तिष्क में काले बादल की भांति उमड़-घुमड़ रहा है कि आखिरकर वो क्या बात थी कि जिसने जनता ने इतना उद्वेलित किया और वो बिना किसी नेतृत्व के सडक़ों पर निकल आई. वो कौन से तत्व या परिस्थितियां थी जिसने जनता के क्रोध को उबाल और उछाल दिया. बलात्कार की घटनाएं तो देश में कोई नयी बात नहीं है लेकिन फिर ऐसा क्या हुआ कि दिल्ली रेप काण्ड को लेकर एकाएक वर्षों से सुप्त पड़े आम आदमी की अंर्तत्तामा जाग गयी और वो सत्ता से दो-दो हाथ करने को तैयार हो गया. इन तमाम प्रश्नों के उत्तर जानने के लिए सरकार और सरकारी मशीनरी माथापच्ची कर रही है लेकिन एक बात स्पष्टï है कि जनता के क्रोध, विद्रोही स्वभाव और क्रांतिकारी व्यवहार ने सरकार की रात की नींदे छीन ली हैं.

देश में बलात्कार के आंकड़ों पर दृष्टि डाले तो स्थिति की गंभीरता का पता चलता है कि देश में आम आदमी के साथ कितना अन्याय, अनाचार और शोषण हो रहा है. आम आदमी के दु:ख-दर्द और कष्ट सुनने वाला कोई नहीं है. सरकारी रिकार्ड के अनुसार देश में प्रत्येक 22 मिनट में एक बलात्कार की घटना घटित होती है. दामिनी रेप कांड के बाद भी बलात्कार की घटनाएं कम होने का नाम नहीं ले रही हैं.  देश की विभिन्न न्यायालयों में बलात्कार के हजारों केस लंबित पड़े हैं. बलात्कार और महिलाओं के प्रति होने वाले अपराध से देश के आम आदमी को पीड़ा पहुंचती है लेकिन दो जून की रोटी के फेर में पड़ा आम आदमी गरीबी के दुष्चक्र और मुसीबतों के चक्रव्यूह से चाहकर भी बाहर निकल नहीं पाता है. वहीं वर्षों से नेतााओं की पीछे चलने की मनोवृत्ति के कारण आम आमदी अपने क्रोध, भावनाओं और संवेदनाओं को व्यक्त कर पाने में स्वंय को असमर्थ, असहाय और असहज अनुभव करता है. शायद आम आदमी की अंर्तमन में यह बात गहरे से पैठ कर गयी थी कि बिना किसी नेतृत्व के उनकी बात सुनी ही नहीं जाएगी. उन्हें शक्तिशाली सत्ता और पुलिस-प्रशासन से निपटने और उलझने के कोई नेतृत्व अवश्य चाहिए. बिना नेतृत्व के धरना, प्रदर्शन, मार्च और आंदोलन हो ही नहीं सकता. लेकिन आम आदमी के इन पूर्वाग्रहों और धारणाओं को बदलने में पिछले दो वर्षों के दौरान अन्ना और रामदेव कि आंदोलनों ने अहम् भूमिका निभाई. अन्ना और रामदेव के आंदोलन भले ही सफल न हुए हों लेकिन उन्होंने आम आदमी को अपनी शक्ति पहचानने और अधिकारों के प्रति जागृत करने का नेक कार्य तो किया ही जिसके लिए वो धन्यवाद के पात्र हैं.

अन्ना और रामदेव के आंदोलनों में आम आदमी और विशेषकर युवाओं ने बढ़-चढक़र भागीदारी निभाई. घपलों, घोटालों, कांड और भ्रष्टाचार तक आकंठ में डूबी सरकार ने अन्ना और रामदेव की आवाज बंद करने का हरसंभव प्रयास किया. देश की जनता ने बहेद निकट से सरकार के हठधर्मी, बेशर्म और षडयंत्रकारी रूप को देखा. जनता के मन में भ्रष्टï और षडयंत्रकारी सरकार, नकारा पुलिस-प्रशासन, लूले-लंगड़े कानून, अंधी अदालतों और गुलाम मानसिकता की गिरफ्त में फंसी कार्यपालिका के प्रति मन में अनादर का भाव है. अन्ना और रामदेव भीड़ से निकले वो चेहरे थे जिन्होंने आम आदमी के संघर्ष करने के साहस और उत्साह को बढ़ाया. सोशल नेटवर्किंग साइटस ने भी देश की जनता विशेषकर युवाओं को एक मंच पर एकत्र होने के लिए प्रोत्साहित किया. दामिनी रेप काण्ड ने एकाएक पूरे देश को एक जुट कर दिया और रायसीना हिल्स से लेकर देश के कोने-कोने में लोग दामिनी को इंसाफ दिलाने और आरोपियों को सख्त सजा दिलाने की मांग लेकर निकल पड़े. दामिनी के साथ जो बर्बरता हुई जनता उससे तो दुखी और आहत है ही वहीं सरकार और व्यवस्था प्रति उसके मन में दोगुना क्रोध है. जनता के बदले व्यवहार से सरकार सकते में आ गयी. शुरूआती हठधर्मी रवैये के बाद सरकार को झुकना और नरम होना पड़ा. इस आंदोलन की विशेष बात यह भी रही कि जनता ने किसी भी राजनीतिक दल को सडक़ पर उतरकर राजनीति करने और चमकाने का कोई अवसर नहीं दिया. आम आदमी पार्टी और रामदेव ने आंदोलन में कूदने की कोशिश तो की लेकिन जनता ने उन्हें कोई भाव नहीं दिया. जनता के मनोभाव समझते हुए राजनीतिक दलों ने दूरी बनाना श्रेयस्कर समझा.

दामिनी रेप काण्ड ने समूचे विश्व के समक्ष हमारी गर्दन झुका दी है और मानवता को शर्मसार किया है लेकिन दामिनी ने खुद गहरी नींद सोकर भी देश की सुप्त पड़ी चेतना और आम आदमी की संवेदना, भावना और सामाजिक सरोकारों को जगाने का महान कार्य किया है. राजनीतिक व्यवस्था और नेतृत्व से ऊब चुकी जनता का बिना नेतृत्व के सडक़ों पर उतरना स्वस्थ लोकतंत्र और लोकतांत्रिक प्रणाली का लक्षण है, आवश्यकता इस ऊर्जा के सकारात्क प्रयोग की है. सामाजिक आंदोलन में युवाओं की भागीदारी सकारात्मक और सुखद भविष्य का संकेत है. सामाजिक समस्याओं और मुद्दों पर आम आदमी की सक्रिय भागीदारी और सरोकार की प्रवृत्ति सत्ता और तंत्र को स्वत: सुधरने को विवश करेगा.

राजनीतिक दल और नेता फिलवक्त भी जनता के क्रोध और भावनाओं का रूख मोडऩे के प्रयास में जुटे हैं. लेकिन इस बार माहौल काफी बदला हुआ है. आम आदमी की भावनाओं, बदले रवैये और व्यवहार के कारणों पर विचार करने की बजाय सत्ता और नेतृत्व उन उपायों पर चिंतन, मंथन कर रहा है जिससे भविष्य में जनता एकजुट न होने पाये. सत्ता आम आदमी की शक्ति को कम करके आंक रही है. इस मौके पर मशहूर जनकवि अदम गोंडवी का एक शेर बरबस ही याद आता है-

जल रहा है देश, ये बहला रही है कौम को,

किस तरह अश्लील है संसद की भाषा देखिए…

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.