/दामिनी का दमन पूर्ण अंतिम संस्कार आपातकाल नहीं तो और क्या है?

दामिनी का दमन पूर्ण अंतिम संस्कार आपातकाल नहीं तो और क्या है?

दामिनी के माता पिता को दबावपूर्वक ले जाकर पौ फटने के पहले ही दामिनी की चिता सजा देना और संस्कारों के विपरीत सूर्योदय के पूर्व अंतिम संस्कार का दबाव बनाना अघोषित आपातकाल नहीं तो और क्या है?

प्रवीण गुगनानी||

हमारे सभ्य समाज में जीने के अधिकार से क्रूरता पूर्वक वंचित कर दी गई दामिनी जो अपने प्राण गवांकर पुरे राष्ट्र को संज्ञा, प्रज्ञा और विग्या का एक नया अध्याय पढ़ा गई उसके अंतिम संस्कार के विषय में हमारे समाज को विचार करना ही होगा. आज जब पूरा राष्ट्र दामिनी की स्मृतियों के साथ दुखी, संतप्त होनें के साथ साथ अपनी बेटियों के लिए चिंतित और परेशान भी है तब एक बात निःसंदेह कही जा सकती है कि दामिनी हमारें सुप्त और उदासीन समाज के लिए एक नायिका बन गई है. दामिनी ने जिस प्रकार की पाशविक और दिल दहला देनें वाली यंत्रणा झेली और उसके बाद तेरह दिनों तक असीम जिजीविषा के साथ मृत्यु से अनथक किन्तु असफल संघर्ष किया वह भारतीय समाज के लिए एक चिरस्थायी कथा बन गई है.damini

प्रश्न यह नहीं है है कि दामिनी के नाम पर हम कानून बना पायें या नहीं बल्कि प्रश्न यह है कि हम मध्यमवर्गियों की नायिका को क्या हमारा समाज, शासन और सरकार चैन की मृत्यु भी दे पायी? बिना गुरेज उत्तर देना होगा कि हम दामिनी को मृत्यु के बाद एक गरिमापूर्ण अंतिम संस्कार नहीं दे पाए. यह शर्म, खेद, अफ़सोस, दुःख और डूब मरने वाला विषय है कि जिस दामिनी की के साथ हुए बलात्कार के लिए हम दुखी हैं, जिस दामिनी के इलाज में चले घटनाक्रम से हम पछता रहे हैं, जिस दामिनी की मृत्यु के बाद हम संतप्त हैं, जिस दामिनी के अपराधियों के लिए हम सख्त सजा मांग रहे हैं, जिस दामिनी के साथ हुए बलात्कार ने हमारें समाज को आत्मपरीक्षण के लियी मजबूर कर दिया है उसी दामिनी के मृत्यु संस्कार को न तो हम देख समझ पाए और न ही उसमें सम्मिलित हो पाए!!                                                                                                                                                                      बड़ी शर्म के साथ कहना पड़ रहा है कि आज का नेता वर्ग जो कि राजनीति में अपनें वंश की स्थापना कर जाता है और उसके वंशवादी उत्तराधिकारी अपनी राजनीति को पकानें और समाज की हमदर्दी सुहानुभूति अर्जित करनें के लिए अपने परिवार के किसी भी व्यक्ति की मृत्यु होने पर हस्पताल के डाक्टरों के साथ मिल कर मृत्यु की घोषणा शनिवार रविवार देख कर कराता है! वह ऐसे समस्त प्रयत्न करता है कि अंतिम यात्रा में लोग बड़ी से बड़ी संख्या सम्मिलित हो!! नेता का परिवार अंतिम यात्रा में भीड़ बढानें के लिए अपनें क्षेत्र में अपनें समर्थकों के सहारें से आस पास के गावों और शहरों में आनें जानें के लिए बसें और ट्रकें भी उपलब्ध करा देते है!!! नेताओं के परिवार मृत्यु के सहारें भी राजनीति करनें का कोई अवसर नहीं चुकते हैं!!!!

प्रश्न यह है कि अपनी मृत्यु को भी अवसर और मौके में बदल देने वाला नेता समाज हम मध्यम वर्गियों की भावनाओं को क्यों अनदेखा कर गया? क्यों नेता समाज और प्रशासन ने दामिनी की संघर्ष पूर्ण मृत्यु की दुखद गाथा के अंतिम अध्याय से देशवासियों को वंचित कर दिया?? आखिर शासन, प्रशासन और नेताओं को किस बात का डर भय था? आखिर क्या ऐसी परिस्थितियां थी कि दामिनी जैसी वीरांगना और समाज को झकझोर कर जागृत कर देनें वाली दामिनी को अपराधियों की भाँती गुमनामी से अंतिम संस्कार का दंड झेलना पड़ा है?

दामिनी ने जिस प्रकार इस देश की बेटियों को एक स्वर में बोलना सिखाया और इस समाज को अपनी बेटियों की बात सुनना समझना सिखाया है उससे तो देश का दायित्व बन गया था कि वह अपनी इस बेटी को लाखों करोड़ों की संख्या में श्मशान पहुंचकर विदा करता किन्तु दिल्ली ने देश के नागरिकों को उनकें इस नेसर्गिक अधिकार से भी वंचित कर दिया है. दामिनी के माता पिता को दबावपूर्वक ले जाकर पौ फटने के पहले ही दामिनी की चिता सजा देना और संस्कारों के विपरीत सूर्योदय के पूर्व अंतिम संस्कार का दबाव बनाना अघोषित आपातकाल नहीं तो और क्या है? शासन और प्रशासन ने इस बात को भली भाँति समझना चाहिए था कि दामिनी के प्रकरण ने हमारें समाज को मातृशक्ति के प्रति हमारें दृष्टिकोण को झकझोर कर बदलनें का अद्भुत और अविस्मरणीय कार्य कर दिया है. बड़ी लम्बी कालावधि के बाद भारतीय समाज में मातृशक्ति के प्रति आदर और सम्मान प्रकट करनें की प्रवृत्ति विकसित  करनें के प्रति संकल्पशक्ति प्रकट करनें का अवसर भारतीय समाज के सम्मुख प्रस्तुत हुआ है.

दामिनी के अंतिम संस्कार में यदि पुरे समाज, दिल्ली और देश को सम्मिलित होने देने का अवसर देने से इस सरकार का क्या बिगड़ जाता? शान्ति भंग होनें का डर बताकर और क़ानून व्यवस्था बिगड़ने का भय बताकर सरकार ने इस राष्ट्र के साथ अघोषित आपातकाल लगाने का आचरण किया है! दिल्ली में बैठे नेता और अधिकारी भले ही बड़ी भीड़ जुटने और उसके आक्रोशित होनें से आशंकित रहें हो किन्तु उनका यह पलायन करने वाला आचरण हमें हमारें नागरिक अधिकारों से वंचित कर गया है यह इस लोकतांत्रिक ढंग से चुनी और घोर अलोकतांत्रिक आचरण कर रही सरकार और हमारे जागृत होते समाज को स्मृति में रखना चाहिए. आपातकाल भले ही केवल अन्तिम संस्कार के दौरान कुछ घंटों के लिए लगा हो पर लगा अवश्य था मेरी ऐसी व्यवस्थित और सुस्पष्ट मान्यता है.

Facebook Comments

संबंधित खबरें:

म.प्र. के आदिवासी बहुल जिले बैतुल में निवास. "दैनिक मत" समाचार पत्र के प्रधान संपादक. समसामयिक विषयों पर निरंतर लेखन. प्रयोगधर्मी कविता लेखन में सक्रिय .