/नाम पर कानून बनाने की मांग और उसकी सार्थकता

नाम पर कानून बनाने की मांग और उसकी सार्थकता

-विनायक शर्मा||
केंद्रीय मंत्री शशि थरूर का विवादों से विशेष रिश्ता है. वह जब भी कुछ बोलते हैं या सोशल साईट पर लिखते हैं एक विवाद खड़ा हो जाता है. परन्तु इस बार उनके लेखन से उनकी अपनी ही पार्टी और दल को अधिक परेशानी हुई है. पाश्चात्य पृष्ठभूमि और विचारों से प्रभावित शशि थरूर जो वर्तमान में केंद्रीय सरकार में मानव संसाधन मंत्री भी हैं, ने दिल्ली में बलात्कार की शिकार हुई दामिनी (काल्पनिक नाम) का वास्तविक नाम उसकी मृत्युपरांत भी सार्वजानिक ना करने पर सवाल उठाये हैं और बलात्कार जैसे जघन्य अपराध की रोकथाम पर बनाये जाने वाले संशोधित कड़े कानून का नाम भी दामिनी के वास्तविक नाम पर रखने की वकालत की है.shashi-tharur
शशि थरूर द्वारा व्यक्त किये गए इस विषय के पक्ष और विपक्ष में आ रहे वक्तव्यों पर पक्ष-विपक्ष की राजनीति प्रारंभ हो गई है. भाजपा ने पहले तो इसे गैरआवश्यक बताते हुये कड़े कानून बनाने की मांग से ध्यान हटाने का आरोप जड़ दिया परन्तु बाद में पीडिता (दामिनी) के परिवारवालों की सहमति होने की शर्त के साथ स्वीकृति दे दी. वहीँ कांग्रेसपार्टी के प्रवक्ता ने पहले तो इसे शशि थरूर की निजी राय बता कर पल्ला झाड़ना चाहा. परन्तु बाद में एक लंबा चौड़ा स्पस्टीकरण आया जिससे आभास होता है कि शशि को हिदायतों के साथ फटकारा गया है कि इस प्रकार के विचार सार्वजानिक ना कर के उन्हें पार्टी फॉर्म या मंत्रिमंडल के समक्ष रखने चाहिए. दलों के आंतरिक मामलों से जनसाधारण का कोई सरोकार नहीं होता है, परन्तु जो प्रश्न शशि थरूर ने जनता के सामने उठाये हैं उन पर तो एक स्वस्थ चर्चा अवश्य ही की जा सकती है.
सर्वप्रथम हमें यह जानना होगा कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वार दिए गए दिशानिर्देशों के तहत ही बलात्कार की पीडिता का नाम और चित्र गुप्त रखा जाता है. इसके पीछे न्यायिक कारण ना होकर सामाजिक कारण अधिक समझ में आते हैं. बलात्कार की पीडिता के साथ एक जघन्य अपराध हुआ है और इसमें उसका कोई दोष नहीं है परन्तु सहानुभूति के चलते, महज चर्चा करने के नाते या फिर तानों और फिकरों के जरिये पीडिता और उसके परिवार को ना केवल गहरे मानसिक अत्याचार और आघात झेलने पड़ते हैं बल्कि समाज में उनका जीना दूभर हो जाता है. इन्ही सब कारणों को समझते हुये माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने बलात्कार की पीडिता और उसके परिवार का नाम और चित्र गुप्त रखने या मीडिया में प्रकाशित ना किये जाने के निर्देश दिए हैं. इस प्रकार की गोपनीयता के पीछे उनकी निजता एक बड़ा कारण है. निजता के इस प्रश्न पर यदि पीडिता या उसके परिवार को कोई ऐतराज ना हो तो नाम प्रकाशित किया जा सकता है जैसा कि दामिनी के परिवारवालों ने वास्तविक नाम जाहिर करने की इच्छा व्यक्त कर के एक बहादुर परिवार होने का सन्देश दिया है. बलात्कार जैसे जघन्य अपराध का सामना करने के लिए पीडिता, उसके परिवारजनों, कानून के संरक्षकों और सारे समाज को बहादुरी और सख्ती से सामने आना होगा जिससे इस प्रकार के अमानवीय और अपराधिक कुकर्म करने पर ना केवल रोक लगे बल्कि समाज में पीडिता और उसके परिवार को पीडित और साहसी परिवार की नजरों से देखा जाये ना कि हेय या सहानुभूति की नजरों से. इस प्रकार का वातावरण यदि समाज में पैदा होगा तो नाम या चित्र गुप्त रखने का कोई औचित्य नहीं रहा जायेगा. शायद शशि थरूर के कथन के पीछे यही मानसिकता काम कर रही होगी.
दूसरा प्रश्न है कि बलात्कार के कानून को सख्त बनाये जाने के संशोधन को दामिनी का वास्तविक नाम दिए जाने की मांग का. हम गाहे-बगाहे विदेशों का उदाहरण देते हैं. विदेशों में समय-समय पर बनाये जानेवाले कानून या उनके संशोधनों को पीड़ित या व्यक्ति विशेष का नाम दिए जाने की परम्परा रही है. भारत में आज भी भवनों, मार्गों, पुलों या चौक-चौराहों का नामकरण दिवंगत नेताओं या किसी नामचीन के नाम से किया जाता है. मूर्तियां लगाईं जाती हैं और इन सब के लिए तयशुदा मार्गदर्शिका भी सरकार के पास है. इसकी कितनी पालना होती है यह एक अलग विषय है. हाँ, इस विषय में एक बात समझ में आती है कि स्वतन्त्र भारत में किसी व्यक्तिविशेष के नाम से कानून बनाया जाये या संशोधन किया जाये, संविधान या नियमों में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है. इसमें कोई दो राय नहीं है कि कानून समाज के लिए ही बनाये जाते हैं. यदि मांग उचित है तो आवश्यक प्रावधान भी किया जा सकता है. इसके लिए यदि संविधान में संशोधन की आवश्यकता हो तो वह भी किया जा सकता है. स्वर्गीय राजीव गांधी का कथन था कि परम्पराएँ और परिपाटियां तोडी जा सकती हैं. ऐसे में कांग्रेस,भाजपा या किसी अन्य दल को बलात्कार के कानून में संशोधन का नाम दामिनी के वास्तविक नाम पर रखने से ऐतराज क्यूँ ? समाचारों की माने तो लड़की के घरवालों का कहना है कि यदि इस उद्देश्य के लिएउनकी बेटी का नाम सार्वजनिक किया जाये तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं होगी वरन यह लड़की के लिए गर्व की बात होगी. वहीँ दूसरी ओर गृह मंत्रालय सूत्रों के मुताबिक दंडसंहिता के कानूनों को पीड़ित के नाम पर रखने का कोई प्रावधान नहीं है.
शशि थरूर की मांग के पक्ष में जानीमानी पूर्व पुलिसअधिकारी और वर्तमान में अन्ना हजारे की सहयोगी किरण बेदी भी उतर आई हैं और उन्होंने विदेशों में चल रही इस प्रकार की प्रथा का भारत में भी अनुसरण करने पर जोर देते हुये नए क़ानून या संशोधन का नाम निर्भय रखने की मांग की है. नाम की मांग के पक्ष या विपक्ष में चाहे जो तर्क दिए जा रहे हों परन्तु इस विषय पर देश के जानेमाने संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप का मानना है कि भारत में पीड़ित के नाम पर कानून बनाना बेशक एक नया सुझाव है, परन्तु इसमें कोई कानूनी अड़चन नहीं है, केवल सिर्फ सरकार को इसपर फैसला लेना है. विदेशों में पीड़ितों के नाम पर कानून बनाये जाने का एक लंबा इतिहास है. इस प्रकार नाम पर कानून बनाने का कारण शायद विषम परिस्थितियों या अपराधों का सामना करनेवाले पीड़ितों को ना केवल सदा याद रखना बल्कि उन्हीं की बदौलत बनाये जानेवाले कानून की सहायता से अन्य लोगों को बचाया जा सका, इसी भावना को ध्यान में रखते हुये ही कुछ विशेष प्रकार के अपराधों के पीड़ितों या विशेष प्रकार के कानून को बनाने की मांग को उठानेवालों के नाम पर कानून या उसके संशोधनों को नाम दिए जाने की प्रथा है जिसके द्वारा उन लोगों को सम्मानित व सदा याद किया जाता है. उदाहरण के लिए: जेसिका कानून, मेथ्युशीपर्ड और जेम्स बयीर्द्य जुनिओर घृणा अपराध रोकथाम नियम, लिंडबरघ कानून, मेगन कानून, ब्रेडी विधेयक, रेयान व्हाइट केयर नियम व दोंडा वेस्ट कानून आदि आदि.
भारत में पीड़ितों के नाम पर कानून तो नहीं, हाँ पुरुस्कार देने की प्रथा अवश्य ही रही है. रंगा-बिल्ला नामक आरोपियों ने १९७८ में संजय और गीता नाम के भाई-बहन का पहले अपहरण और बलात्कार किया बाद में दोनों का क़त्ल कर दिया था. १९८२ में आरोपियों को फांसी देने के बाद से ही बहादुरी के लिए हर वर्ष संजय चोपड़ा और गीता पुरुस्कार दिया जाता है. दामिनी का नाम जिन्दा रखने के उद्देश्य से ही उत्तर प्रदेश के बलिया स्थित उसके पैतृक गांव मेड़वार कलां के प्राथमिक विद्यालय का नामकरण उसके नाम पर किये जाने की घोषणा करते हुये ग्राम प्रधान शिवमंदिर सिंह का कहना है कि देश में बलात्कार जैसे जघन्य अपराध को रोकने के लिये नयी अलख जगाने वाली इस गांव की बेटी की याद को हमेशा बरकरार रखने के लिये गांव के प्राथमिक स्कूल का नाम उसके नाम पर रखा जाएगा.
वैसे भाजपा के शाहनवाज खान और कांग्रेस के मनीष तिवारी का यह कहना कि अभी तो आवश्यकता इस बात की है कि शीघ्र ही कड़ा कानून बने जिससे भविष्य में इस प्रकार के वीभत्स अपराधों पर त्वरित करवाई संभव हो सके, ही अधिक प्रासंगिक लगता है. बलात्कार जैसे जघन्य अपराध की रोकथाम और सजा के लिए वर्तमान कानून में सख्त व कड़े संशोधन किये जाएँ और उसे किसी भी पीडिता के नाम दिया जाये यही दिवंगता को सच्ची श्रद्धांजलि होगी.
(विनायक शर्मा विप्र वार्ता के संपादक हैं)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.