/धूर्त और मक्कार होते हैं, चरणस्पर्श के शौकीन लोग..

धूर्त और मक्कार होते हैं, चरणस्पर्श के शौकीन लोग..

– डॉ. दीपक आचार्य||

चरण स्पर्श को सदियों और युगों से श्रद्धा और सम्मान का प्रतीक माना गया है। धर्म शास्त्रों और नैतिक आदर्शों भरी परंपराओं में स्पष्ट वर्णित है कि इसका सीधा संबंध आदर-सम्मान दर्शाने से लेकर पुण्य प्राप्ति तक है और जो लोक निष्काम भाव से ऎसा करते हैं उनके लिए पुण्य संचय के सारे रास्ते अपने आप खुले हुए रहते हैं।mayawati_230_090912030217
माता-पिता, गुरु और अपने से बड़े किन्तु योग्यजनों को प्रणाम एवं चरणस्पर्श करना भारतीय संस्कृति और सभ्यता में अहम् रहा है। चरणस्पर्श यदि ढंग से किया जाए तो व्यक्ति में ऊर्जा संचरण करने के साथ ही शिक्षा-दीक्षा और शक्तिपात तक की सुचालकता को सशक्त आधार मिलता रहता है।
चरणस्पर्श की क्रिया दर्शा देना दूसरी बात है और मन तथा भावनाओं के साथ चरणस्पर्श करना दूसरी बात। आजकल चरणस्पर्श हर कहीं फैशन बन गया है। हर कोई हर किसी के चरणस्पर्श कर लेता है।
यों भी आजकल जिस हिसाब से चरण स्पर्श किया जाने लगा है उसे घुटनास्पर्श कहना ज्यादा उचित होगा क्योंकि अहंकार भरा आदमी चाहकर भी इतना झुक नहीं पाता कि सामने वाले के चरणों तक उसकी पहुंच हो सके।
चरणस्पर्श के भी अपने कायदे हैं जिनका अनुसरण कर लेने पर ही चरणस्पर्श का लाभ प्राप्त हो सकता है। किसी भी योग्य व्यक्ति का चरण स्पर्श करते समय अपनी दाहिनी हथेली सामने वाले के दाहिने अंगूठे को स्पर्श करे, तथा बांयी हथेली बांये अंगूठे को। ऎसा करने पर ही चरण स्पर्श सफल माना जा सकता है। देवी-देवताओं की प्रतिमाओं के चरण स्पर्श करते समय भी इसी बात को ध्यान में रखा जाना जरूरी होता है। आजकल लोग सीधे ही झुक जाते हैं और दांये-बांये हाथ-पांव का कोई ध्यान नहीं देते हैं। इस प्रकार के चरणस्पर्श का कोई पुण्य प्राप्त नहीं हो पाता।
चरणस्पर्श आजकल मायने बदलता जा रहा है। अब यह श्रद्धा और आदर सम्मान का प्रतीक न होकर स्वार्थ और ऎषणाओं की पूर्ति का लोकाचारी हथियार बनकर रह गया है। लोगों ने अब चरण स्पर्श को अपने काम निकलवाने और दया या कृपा पाने का ब्रह्मास्त्र मान लिया है और चाहे जहां इसका उपयोग कर गुजरते हैं।
चरणस्पर्श के लिए यह जरूरी नहीं कि सामने वाला इसके योग्य भी है या नहीं। उसकी आयु, बौद्धिक सामथ्र्य या आदर्शों तथा दूसरे सभी कारकोें को दरकिनार कर आजकल कोई भी आदमी अपने काम के लिए किसी के भी चरण स्पर्श करने का शौक पालता जा रहा है। कई लोग तो ऎसे हैं जो चरणस्पर्श के सहारे ही बरसों तक अपनी दुकानदारी चला लेते हैं।
संसार में अपने स्वार्थ के वशीभूत लोगों का अब दो भागों में ध्रुवीकरण हो गया है। एक वे हैं जो बिना सोचे-समझे सारी मर्यादाओं को ताक में रखकर किसी के भी पाँव पकड़ कर चरणस्पर्श कर लिया करते हैं और इसी में अपना गौरव मानते हैं।
दूसरी किस्म उन लोगों की है जिन्हें बड़ा और प्रभावशाली माना जाता है और जिन्हें चरण स्पर्श करवाने में सर्वाधिक आनंद मिलता है और वे उन सभी पर सबसे पहले मेहरबानी करते हैं जो लोग पूरे विनय के साथ झुकते हुए चरणस्पर्श करते रहते हैं।
चरण स्पर्श के मामले में आदमियों की एक अजीब किस्म और भी है जो कि अकेले मिलने पर या एकान्त में ही चरण स्पर्श करते हैं और इनके चरणस्पर्शी संबंधों का किसी को कोई पता भी नहीं चल पाता, सिवाय उन दोनों के।
चरणस्पर्श का सीधा संबंध या तो श्रद्धा की अभिव्यक्ति से है अथवा अपने किसी स्वार्थ की पूत्रि्त से। श्रद्धा दर्शाने वाले चरणस्पर्श गौण होते जा रहे हैं और ऎषणाओं की पूत्रि्त वाले किसी न किसी स्वार्थ के उद्देश्य भरे चरणस्पर्श का सर्वत्र खूब बोलबाला है।
बात अपने इलाके की हो या दूसरे क्षेत्रों की। अपने यहाँ दोनों ही किस्मों के लोग सभी जगह विद्यमान हैं। कई सारे तो ऎसे हैं कि जहाँ मौका मिलता है वहाँ झुक कर पाँव पकड़ लिया करते हैं। इन लोगों को कोई फर्क नहीं पड़ता कि जिनके वे चरण स्पर्श कर रहे हैं वे लायक भी हैं या नहीं।
हालात ये हो गए हैं कि जो लोग भ्रष्ट, बेईमान, नाकारा, चापलुस, व्यभिचारी, शराबी, माँसाहारी, अपराधी और बेईमान हैं, मनुष्यता की किसी फ्रेम में फिट होने लायक नहीं हैं, जिनकी कथनी और करनी में बहुत बड़ा अंतर है, चाल-चलन ही खराब है, छल-कपट से लेकर सारे दुर्गुणों से भरे पड़े हैं उन्हें भी बिना किसी संकोच के चरण स्पर्श करने वाले लोगों की संख्या अनगिनत है।
जबकि शास्त्रीय वचनों के अनुसार ऎसे लोगों के चरणस्पर्श करने वाले लोग पाप के भागी होने के साथ ही समाज के अपराधी भी होते हैं क्योंकि इन नापाक लोगों के चरण स्पर्श करने से इन लोगोें का अहं परितुष्ट एवं तृप्त होता है तथा ये लोग समाज के स्वस्थ स्वरूप एवं आबोहवा को बिगाड़ने में अहम भूमिका में आ जाते हैं जिससे मानवता को भी खतरा बना रहता है।
चरण स्पर्श करना कोई औपचारिकता नहीं है बल्कि इसके माध्यम से दोनों ध्रुवों के बीच सेतु स्थापित होता है जिसके माध्यम से ऊर्जा और आशीर्वाद की उष्मा का संचरण होता है। और यही कारण है कि साधना सम्पन्न और असली साधु-संत किसी को भी अपने पाँव नहीं छूने देते।
पर आजकल प्रभावशाली बड़े लोग हों या संसार को त्याग बैठे बाबाजी, ध्यानयोगी, महात्मा और तथाकथित तपस्वी, साधक-साध्वियाँ या गुरुओं के नाम पर गिद्ध की तरह मण्डराते मांत्रिक-तांत्रिकों से लेकर उठाईगिरे और बाबा वेश में आवाराओं की तरह घूम-घूम तक लूट मचाने वाले भिखारी तक चरणस्पर्श का जबर्दस्त शौक पाले बैठे हुए हैं।
लोगों से अपने चरणस्पर्श करवाना आजकल इन सभी लोगों के लिए स्टेटस सिम्बोल से कम नहीं है। चरणस्पर्श और जयगान, जय-जयकार ये ही तो अब बचे हुए हैं जिनसे ये पीढ़ियों से भूखे, अतृप्त और अशांत लोग खुश होते हैं।
चरणस्पर्श करने वाले जितने ज्यादा लोग, उतना इनका वर्चस्व। इन लोगों की दूसरी सारी इच्छाओं की तरह यह भी सर्वोपरि इच्छा और संकल्प हुआ करता है कि सार्वजनिक तौर पर उनके चरणस्पर्श करने वाले लोगो की भीड़ निरन्तर आकार बढ़ाती रहे।
जो लोग अपने माँ-बाप, गुरुओं, बुजुर्ग परिवारजनों और योग्य विद्वजनों के चरणस्पर्श करने को हीन समझते हैं और जिन्दगी में कभी इनके पांव छूना तो दूर, आदर तक नहीं दे पाए हैं ऎसे लोग भी इन बड़े लोगों और बाबों के चरणस्पर्श करने में पीछे नहीं रहते। ऎसे लोगों को कोई पुण्य कभी नहीं मिल सकता। अपने माता-पिता और गुरु को आदर नहीं देने वालाें का चरणस्पर्श और प्रणाम पितर या ईश्वर भी स्वीकार नहीं करते।
असली लोग हमेशा चरणस्पर्श के मोहजाल से दूर ही रहते हैं जबकि चरण स्पर्श करवाने का शौक पालने वाले सभी किस्मों के लोग धूत्र्त और मक्कार होते हैं। इस बात को चरणस्पर्श का आनंद लेने वाले लोग भले न समझ पाएं, थोड़ी-बहुत बुद्धि और समझदारी रखने वाले तो समझते ही हैं।
चरणस्पर्श की संस्कृति के पीछे छिपे रहस्यों को समझें और अपने आपको देखें कि हम कहाँ हैं, क्या कर रहे हैं, हम कौन थे, क्या हो गए, और क्या होंगे अभी। अपने स्वार्थों के लिए आखिर कितना गिरेंगे हम…….?

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.