/क्या हम अपने भीतर के बलात्कारी को फाँसी चढ़ाने के लिए तैयार हैं..?

क्या हम अपने भीतर के बलात्कारी को फाँसी चढ़ाने के लिए तैयार हैं..?

-कमर वहीद नकवी||

उस अनाम शहीद को सलाम, जो इस देश की पुरुष-प्रणीत और पुरुष-नियंत्रित विकृत समाज व्यवस्था की बलि चढ़ गयी. उसके साथ जो कुछ हुआ, क्या उसके दोषी केवल वही बलात्कारी हैं? क्या उन बलात्कारियों को फाँसी पर चढ़ा देने भर से, क़ानून में बदलाव लाकर, फ़ास्ट ट्रैक अदालतें बना कर हम कुछ हासिल कर पायेंगे? बिलकुल नहीं. ये सब तो नितान्त सतही तरीक़े हैं जो इस पूरे मामले से उपजे जनाक्रोश को समय के साथ निपटा देंगे और नारी के शोषण और उत्पीड़न का घड़ियाली महाभोज यथावत चलता रहेगा.

कमर वहीद नकवी
कमर वहीद नकवी

क़ानून अपना काम करे, जल्दी से जल्दी करे, बलात्कारियों और हत्यारों को कड़ी से कड़ी सज़ा मिले. सरकार भी इससे हिली है, क़ानून में बदलाव की बात शुरू हो गयी है, उम्मीद है कि यह काम भी जल्दी हो जायेगा, फ़ास्ट ट्रैक अदालतें बनें, महिलाओं के विरुद्ध होनेवाले अपराधों के बारे में पुलिस की मानसिकता में बदलाव लाया जाये आदि-आदि—- ये सब तो होगा, लेकिन सवाल तो इससे कहीं बड़ा है और वह यह है कि क्या हम अपने भीतर के बलात्कारी को फाँसी चढ़ाने के लिए तैयार हैं?
इसी फ़ेसबुक पर इसी घटना पर कुछ मित्रों ने बहुत ज़रूरी मुद्दे उठाये. उन सबको समेट कर देखें तो समझ में आ जाता है कि बलात्कार जैसे जघन्य अपराध को रोकने लिए क़ानून, पुलिस, अदालत, फाँसी आदि का एक सीमित उपयोग तो है, लेकिन यह वास्तविक समाधान नहीं है. इसके लिए अपने भीतर ज़रा गहरे झाँकना होगा.
किसी मित्र ने लिखा कि हमारी सारी गालियाँ माँ-बहन से रिश्ता जोड़ कर क्यों हैं? जब आप गालियाँ देते समय किसी की माँ-बहन से रिश्ता जोड़ रहे होते हैं तो क्या आप मन ही मन बलात्कार नहीं कर रहे होते हैं? उस अनाम की शहादत पर ग़ुस्से से उबल रहे देश को संकल्प लेना चाहिए कि वह अपने सोच से, अपने मन से ऐसी सारी गालियों का पूरी तरह सफ़ाया कर देगा. आप यह संकल्प लेंगे?
इंडिया गेट पर प्रदर्शन करने गयी बहुत-सी महिलाओं ने शिकायत की किस तरह वहाँ नारेबाज़ी का नाटक कर रहे बहुत-से लोगों ने छेड़खानी की कोशिशें कीं. इनमें से ज़्यादातर या शायद सभी महिलाओं ने ऐसी ओछी हरकतों को उस समय बर्दाश्त कर लिया (क्योंकि किसी ऐसे हैवान की पिटाई की कोई ख़बर देखने को नहीं मिली). क्या आप संकल्प लेंगी कि ऐसी घटनाओं को सहन नहीं करना है, उनका हर हाल में प्रतिरोध करना है, अगर अकेले सम्भव नहीं तो स्कूलों में, कालेजों में, विश्वविद्यालयों में, अपने-अपने कार्यालयों, मुहल्ले में, कॉलोनी में, अपार्टमेंट में छोटे-छोटे समूह बना कर यह किया जा सकता है.
आइए हम संकल्प लें कि दहेज के लिए किसी महिला को किसी भी रूप में प्रताड़ित नहीं किया जायेगा, ताने भी नहीं कसे जायेंगे कि कम दहेज लेकर आयी है. महिला ही दहेज लेकर क्यों आये? पुरुष क्यों न दहेज दे?
आइए हम संकल्प लें कि महिला भ्रूण हत्या आज से बिलकुल बन्द कर देंगे! आख़िर महिला भ्रूण को क्यों मारते हो आप? पुरुष भ्रूण को क्यों नहीं मारते?
आइए हम संकल्प लें कि अपने-अपने कार्यालयों में किसी प्रकार का यौन उत्पीड़न नहीं करेंगे और नहीं होने देंगे.
ऐसा नहीं है कि इनमें से कई सारे अपराधों में सिर्फ पुरुष शामिल हैं. महिलाएँ भी बराबर की हिस्सेदार होती हैं, क्योंकि वे पुरुषवादी समाज की ग़ुलाम दासियों की तरह ‘कस्टमाइज़ड’ हो चुकी हैं.
तो देवियो और सज्जनो, एक मिनट अपने बारे में भी सोच कर देखिए. क्या आप इनमें से कुछ बदलना चाहते हैं? ये सब चीज़ें हमारे हाथ में हैं, जिन्हें हम कर सकते हैं. इसके लिए कहीं जा कर नारे लगाने की ज़रूरत नहीं है, यह मूक क्रान्ति आपके अपने घरों में हो सकती है, आप इस क्रान्ति के नेता बन सकते हैं. क्या तैयार हैं आप?
हमारे समाज का पूरा सोच विकृत है. कोई प्रेमिका की क़ीमत 50 करोड़ लगा कर अपनी राजनीति करता है, कोई महिलाओं को ‘डेण्टेड-पेण्टेड’ कह देता है, तो कोई ‘परकटी’ बता कर मखौल उड़ाता है, बहुतों को कपड़ों पर आपत्ति होती है तो कोई कह देता है कि उस अनाम लड़की ने विरोध ही क्यों किया, समर्पण कर दिया होता तो ऐसी हालत में न पहुँची होती! यह एक महा-महा पुरुष समाज है, जो हमेशा औरत को अपने भोग, शोषण और सौदे की वस्तु की तरह देखा है, तभी तो चालचलन और चरित्र से जुड़ी सारी शर्तें सिर्फ औरतों पर लागू होती हैं. ऐसे बीमार समाज में बलात्कारी, यौन-शोषक और छेड़खानी करनेवालों के हौसले तो बुलन्द होंगे ही. कड़ा क़ानून बना कर, फ़ास्ट ट्रैक अदालतें बना कर, बलात्कारियों को फाँसी पर चढ़ा कर हम बलात्कार विरोधी होने का नाटक तो कर सकते हैं, अपने भीतर के बलात्कारी महा-पुरुष को कैसे मारेंगे, जो महिलाओं का सबसे बड़ा शत्रु है?

(लेखक आजतक के पूर्व संपादक हैं)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.