/कई राजनेता और सत्ताधीश खुद यौन शोषण के आरोपी…

कई राजनेता और सत्ताधीश खुद यौन शोषण के आरोपी…

क्या उम्मीद करें उन कानून निर्माता सांसदों और विधायकों से, जो खुद यौन शोषण और बलात्कार जैसे अपराधों के आरोपी हैं और विभिन्न अदालतों में उन पर इन मामलों में केस चल रहे हैं.rapist leader

अब जबकि दिल्ली गैंगरेप के बाद देश में बलात्कार जैसे अपराध के लिए ठोस कानून की मांग हो रही है. इसके लिए देश में बड़े पैमाने पर आंदोलन भी किये जा रहे है. ऐसे माहौल में जबकि बलात्कारियों के लिए फांसी की सजा पर विचार हो रहा है, ऐसे में हम इन कानून निर्माताओं पर कैसे विश्वास कर सकते हैं कि कानून में ऐसे अपराधियों को बचाने के लिए कोई गली नहीं छोड़ी जाएगी. सुप्रीम कोर्ट ने भी इन घृणित अपराधों में संलिप्त सांसदों और विधायकों को निलम्बित करने में खुदको असहाय महसूस कर रहा है.

शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि वह रेप के मामले में चार्जशीटेड विधायक व सांसदों को निलंबित करने का निर्देश नहीं दे सकता है. यह मामला विधायिका का है. रेपिस्टों के नाम, फोटो और पता वेबसाइट पर सार्वजनिक करने की तैयारी बीच यह बात सामने आई है कि देशभर में 42 ऐसे विधायक हैं जिन पर महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामले दर्ज हैं. छह ऐसे हैं जिन पर सीधा रेप का आरोप है. कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी ऐसे नेताओं को टिकट देती है जिन पर रेप के आरोप लगे हुए हैं.

जिन छह विधायकों पर रेप के आरोप हैं उनमें से तीन उत्तर प्रदेश हैं. ये विधायक सपा से हैं और इनके नाम श्रीभगवान शर्मा, अनूप संदा और मनोज कुमार पारस हैं. वहीं बाकी के तीन का नाम मो. अलीम खान (उप्र, भाजपा), जेठाभाई जी अहिर (गुजरात, भाजपा), कंडीकुंता वेकांता प्रसाद (तेलगू देशम पार्टी, आंध्र प्रदेश) है. दूसरी ओर, 36 विधायकों का नाम महिलाओं के शोषण के मामले में सामने आए आए हैं उनमें से छह कांग्रेस, पांच भाजपा और तीन सपा के हैं. महिलाओं का शोषण करने वाले सबसे ज्यादा विधायक उत्तर प्रदेश से हैं. इनकी संख्या सर्वाधिक आठ हैं. इसके बाद उड़ीसा और पश्चिम बंगाल का नाम आता है, जहां के सात-सात विधायक हैं. वहीं रेप के आरोपी 27 उम्मीदवारों ने पिछले साल में अलग-अलग जगह से चुनाव लड़ चुके हैं.

 

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.