/महिलाओं के प्रति इस रवैये को तो बदलना ही होगा…

महिलाओं के प्रति इस रवैये को तो बदलना ही होगा…

-राघवेंद्र प्रसाद मिश्र||

प्रभावशाली व्यक्ति अपने दबाव-प्रभाव के चलते अक्सर बड़े से बड़े अपराधों से बच निकलते है. कानून का पालन करना अगर आम आदमी की जिम्मेदारी है तो उससे कहीं ज्यादा कानूनविद व इसके रखवालों की होती है. जरूरत है ऐसे लोगों पर नकेल कसने की जो कानून का पालन करने की जगह उससे खेलना अपनी शान समझ रहे हैं.PROTEST

16 दिसंबर को दिल्ली में हुई सामूहिक दुष्कर्म की घटना को लेकर मचे बवाल पर पीडि़त परिवार को न्याय दिलाने की पहल के तहत त्वरित न्याय कोर्ट का गठन कर दिया गया. सभी आरोपी भी गिरफ्तार कर लिये गये. पुलिस ने 3 जनवरी को आरोप पत्र भी दायर कर दिया, जिसमें पांच आरोपियों पर हत्या, बलात्कार, हत्या का प्रयास, अपहरण, अप्रकृतिक अपराध, डकैती, लूट के लिए मारपीट व साक्ष्य नष्ट करने जैसे आरोप लगाए गए हैं. छठे आरोपी को नाबालिग करार दिया गया है, जिस पर नाबालिग न्याय बोर्ड विचार करेगा. इस कार्रवाई से लोगों में यह उम्मीद तो जगी है कि पीडि़त परिवार को जल्द न्याय मिल सकेगा. ऐसा होना भी चाहिए क्योंकि सभी आरोपी मध्यम परिवार से हैं और शायद यही वजह है कि इनके बचाव में जहां कोई नहीं आया वहीं परिवार वालों ने भी उनकी दरिंदगी को शर्मनाक मानते हुए फांसी की सजा दिये जाने के पक्ष में आ गए.

इसे नैतिकता के आधार पर सही फैसला मानना होगा. इस घटना ने जहां पूरे देश को झकझोर कर रख दिया वहीं कई ऐसी घटनाओं की तरफ इशारा भी किया है जिसे अक्सर नजरंदाज कर दिया जाता है. आज पूरे देश में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर बहस छिड़ गई है. राजनीतिज्ञ और विद्वान महिला सुरक्षा पर अपने-अपने तर्क दे रहे हैं, जिसमें कई ऐसे विवादित बयान भी आये हैं जिसकी उम्मीद भी नहीं की जा सकती थी. ऐसे में सवाल यह उठता है कि महिलाएं वास्तव में क्या सुरक्षित हैं? आज जब वे पुरुषों से कंधा से कंधा मिलाकर शिक्षा से लेकर भारतीय सीमा पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुकी हैं. ऐसे में अगर उनकी सुरक्षा की आवाज उठ रही है तो इस बेहद ही चिंताजनक माना जा सकता है. लेकिन जिस तरह से उन पर हो रहे अत्याचारों की तस्वीर आये दिन प्रस्तुत हो रही है, उसे स्वीकारना ही होगा कि वह हर तरफ असुरक्षित ही हैं. सरकारी व गैर-सरकारी संस्थाओं में कार्यरत महिलाकर्मियों का शरीरिक शोषण किया जाना आम बात हो चुकी है.

ऐसे मामले तब प्रकाश में आते हैं जब कोई बड़ी अनहोनी हो जाती है. ऐसी ही घटना मई 2011 में मुंबई की कोल्हापुर पुलिस ट्रेनिंग एकेडमी में सामने आयी. यहां महिला कांस्टेबल की प्रशिक्षण ले रहीं 71 प्रशिक्षणार्थियों का जब स्वास्थ्य परीक्षण हुआ तो 11 महिलाएं गर्भवती पायी गईं. इस मामले में प्रशिक्षण दे रहे युवराज कांबले पर कानूनी कार्रवाई भी हुई. केवल ऐसे लोगों पर कार्रवाई हो जाने से यह मान लेना कि स्थिति सुधर जाएगी उचित न होगा क्योंकि स्थिति बदलने के लिए ऐसी घटनाएं दोबारा न होने पाये इसके लिए सार्थक कदम उठये जाने की जरूरत है.

16 दिसंबर की रात जो हुआ उसमें आरोपियों पर हैवानियत सवार थी, पर हैवान बने रोजाना जघन्य अपराध कर रहे हैं जब तक ऐसे लोगों पर नकेल नहीं कसी जाएगी तब तक कुछ बदलने वाला नहीं है. दिल्ली घटना के बाद पीडि़ता को न्याय दिलाने के लिए पूरे देश में जहां आंदोलन हो रहा था वहीं खुद दिल्ली सहित अन्य राज्यों से दुराचार की खबरें आ रही थी. इससे यही साबित हो रहा है अपराधियों को कानून का जरा सा भी भय नहीं है. अपराधियों का यह सोचना भी उनके लिहाज से ठीक है क्योंकि जिस तरह से रुचिका गिरिहोत्रा कांड में फंसे इंस्पेक्टर जनरल ऑफ पुलिस शंभू प्रताप सिंह ने अपने दबाव प्रभाव का प्रदर्शन कर कानून से खिलवाड़ किया उसका जनता पर असर पडऩा स्वाभाविक है. जब कानून के रखवालों व जानकारों को इसे तोडऩे में कोई परहेज नहीं है तो आम जनता से क्या उम्मीद की जा सकती है? दिल्ली की घटना को लेकर जिस तरह से जनता ने बिना किसी राजनीतिक नेतृत्व का सहारा लिए जंतर मंतर के मैदान में कडक़ड़ाती ठंड में पानी व लाठियों की बौछार का सामना किया, उससे यह साबित होता कि वह और अत्याचार सहने की मूड में नहीं है.

अभी हाल में असम के चिरांग जिले में महिलाओं ने कानून को हाथ में लेते हुए बलात्कार के आरोपी कांग्रेसी नेता विक्रम सिंह ब्रह्मा को नंगा कर पीटा यह अच्छा संकेत नहीं है. उच्च पदस्थ अधिकारियों व जनप्रतिनिधियों को इस घटना से सबक लेना होगा, क्योंकि अगर जनता इसी तरह कानून को हाथ में लेने लगेगी तो जो स्थिति बनेगी उसे रोक पाना मुश्किल हो जाएगा. सच तो यह है कि आज जो दूषित माहौल बना हुआ उसके पीछे कहीं न कहीं से खुद जनता ही जिम्मेदार है. सांसदों व विधायकों का चुना जाना जनता पर निर्भर करता है. भारत में 4835 सांसदों व विधायकों में से 1448 के खिलाफ आपराधिक मामले चल रहे हैं. जागरूक देश में अगर अपराधियों का बोलबाला है तो इसे विडंबना न कहा जाए तो क्या कह सकते हैं.

दिल्ली की घटना देश में रेप व हत्या का पहला मामला नहीं है जिस पर इस तरह त्वरित कार्रवाई की जा रही है. ऐसी कई जघन्य अपराधिक घटनाएं हुईं हैं जिन्हें आरोपियों के दबाव-प्रभाव के चलते दबा दिया जाता है. आज जरूरत है ऐसी तस्वीर को बदलने की. यह घटना अगर प्रभावशाली व्यक्ति से जुड़ी हुई होती तो शायद इस तरह से न्याय के लिए सभी आगे न आ जाते, खासतौर पर परिवार वाले भी. यह घटना उन लोगों के लिए भी सबक है जो बिना मामले को समझे अपराधियों के बचाव में उतर आते है, और अपने करीबियों व परिचितों बचाने का हर संभव प्रयास करते हैं.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.