/विजय बहुगुणा का मीडिया मैनजमेंट एक बार फिर असफल…

विजय बहुगुणा का मीडिया मैनजमेंट एक बार फिर असफल…

-देहरादून से चन्‍द्रशेखर जोशी||

अपनी सरकार के ८ माह पूर्ण होने के तीन दिन पहले विधानसभा सत्र के चलते १० दिसम्बर को हुए लाठी चार्ज की धमक दूर तक गयी. मानव अधिकार दिवस के दिन हुए लाठी चार्ज की खबर को मीडिया ने पूरी तन्मयता से कवरेज किया और मार्मिक शीर्षक लगाकर आम जन को भाव विहवल कर दिया. महिलाओं को पुरूष पुलिस द्वारा पिटाई की खबर से उत्तराखण्ड में आम जन उबल सा गया. फेसबुक पर आमजन ने बढ चढ कर अपनी भडास निकाली, जबकि हर व्यक्ति ने इस घटना पर दुख व्यक्त करते हुए विजय बहुगुणा सरकार को कोसा. विजय बहुगुणा के मुख्यमंत्री पद पर रहने के दौरान ऐसी खबरे पहली बार प्रकाशित हुई कि उचित मजदूरी देने के लिए धन नहीं है परन्तु मंत्रियों के सैर सपाटे पर धन खुलकर किया जा रहा है, लडकियां पेडों पर चढकर प्रदर्शन कर रही है तो पुलिस उन्हें बूटे व घोडे के तले रौंद रही है.vijay bahuguna

इसका साफ सा संदेश है कि मुख्यमंत्री का मीडिया मैनेजमेन्ट एक बार फिर असफल साबित हुआ. इससे पहले टिहरी लोकसभा उपचुनाव से दो दिन पहले हुआ था. जबकि सजवाण मामले को मीडिया ने लपका था और उसके बाद मुख्यमंत्री के मुम्बई में जज की तैनाती के दौरान इस्तीफा के मामले को प्रथम पृष्ठ पर उछाला था. इसका नकारात्मक प्रभाव आमजन पर पडा और कांग्रेस चुनाव हार गयी. इसी तरह विधानसभा सत्र के दौरान कई आंदोलन होते रहे हैं परन्तु यह पहला आंदोलन था जिस पर मुख्यमंत्री को पूरे राज्य से कटु आलोचना का शिकार होना पडा. इसका साफ मतलब है कि मुख्यमंत्री को अपना सम्पूर्ण घेरा बदलने की जरूरत है. खासतौर पर मुख्यमंत्री का मीडिया मैनेजमेन्ट लचर व निरीह होने से इसका नुकसान विजय बहुगुणा को स्वयं उठाना पड रहा है. मुख्यमंत्री बनने के उपरांत से ८ माह के दौरान ऐसे अनेक अवसर सामने आ रहे है जब कि मुख्यमंत्री को अपने मीडिया मैनेजमेन्ट के कारण शिकस्त खानी पड रही है. जबकि सत्तारूढ दल के कई विधायक व मंत्रियों की आापसी गुटबाजी व मात देने की रणनीति को विजय बहुगुणा स्वयं अपने बल पर मात देते आ रहे हैं परन्तु अपने खासमखास लोगों व अधिकारियों पर भरोसा कर वह मात खाते जा रहे हैं. यही कारण है कि उनके संबंधित हर छोटी व बडी घटना मीडिया की सुर्खियां बन जा रही है और इसमें पूरे राज्य की आचोचना का शिकार उन्हें होना पड रहा है. जबकि विजय बहुगुणा अपनी रणनीति से उस मामले को स्वयं निपटा भी देते हैं परन्तु तब तक देर हो चुकी होती है और मीडिया तब तक उसे मिर्च मसाले के साथ परोस चुकी होती है. इलैक्ट्रोनिक मीडिया को करोडों का विज्ञापन व बडे समाचार पत्रों को बेहिसाब विज्ञापन देने की रणनीति के बावजूद भी मुख्यमंत्री से संबंधित हर छोटी व बडी घटना नकारात्मक रूप में सुर्खियां बनती है, इसका साफ सा मतलब है कि मुख्यमंत्री को अपने मीडिया मैनेजमेन्ट में बदलाव की जरूरत है.

कुछ माह पूर्व मुख्यमंत्री के पिथौरागढ दौरे में पिथौरागढ के विधायकों की नाराजगी सुर्खियां बनी, इसके बाद गणेश गोदियाल से कहासुनी भी समाचार पत्रों में छायी, जबकि डा० हरक सिंह के ओएसडी से हुआ विवाद भी जनता ने चटकारे के साथ पढा, इसके बाद पूर्व विधायक सजवाण से हुआ विवाद भी सामने आया, वही कांग्रेस हाईकमान की नाराजगी की खबर भी सामने आती रही. पौंटी मामले में नौकरशाह को भेजे जाने की खबर हो या साकेत बहुगुणा द्वारा उत्तरकाशी में अधिकारियों की मीटिंग लेने की खबर, इसका साफ मतलब है कि मुख्यमंत्री के मीडिया मैनेजरों ने मीडिया के बहुसंख्यक वर्ग को नाराज करके रखा हुआ है, और हर छोटी व बडी घटना सुर्खियां बन रही है और बनती रहेगी अगर मीडिया मैनेजरों में बदलाव न किया गया तो यह मुसीबत ही साबित होगें विजय बहुगुणा के लिए.

वही शिक्षा मित्रों को लेकर मीडिया में यह भी खबर आई है कि सत्ताधारी दल के कई विधायक व मंत्री  गुटबाजी के चलते सरकार की किरकिरी करा रहे हैं. एक समाचार पत्र की रिपोर्ट के अनुसार तो कई ऐसे मामले सामने आए हैं जिसमें सीएम और सरकार को अपने ही दल के नेता कटघरे में खडा करते रहे हैं. शिक्षामित्रों पर हुए लाठीचार्ज के बाद से अब जो खुलासे हो रहे हैं उसे देखते हुए इस बात के स्पष्ट संकेत मिल रहे हैं कि शिक्षामित्रों के उग्र रूप के पीछे सत्ताधरी दल के ही एक विधायक का नाम प्रमुखता से सामने आ रहा है. इतना ही नहीं पिछले कई दिनों से इसी विधायक के आवास पर शिक्षामित्रों की मेहमाननवाजी की जा रही थी. प्रदेश में आन्दोलनकारियों के उग्र रूप को देखते हुए सरकार को नई गाईडलाईन तय करने की जरूरत हैं क्योंकि प्रदेश में समय-समय पर इस प्रकार से आन्दोलन होते रहते हैं. यह पहला मौका नहीं है जब प्रदेश में आन्दोलन हो रहा है लेकिन इस बार सत्ताधारी दल के भी कुछ विधायक सरकार के खिलाफ लॉबिंग में जुटे हुए हैं. इसकी पृष्ठभूमि तैयार कर ली गई थी. शिक्षामित्र विधायक हॉस्टल में एक कांग्रेसी विधायक के मेहमान बने थे

एक दैनिक ने समाचार प्रकाशित किया है कि चर्चा है कि कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता जो कि केन्द्र की राजनीति में भी काफी सक्रिय हैं उनके बहुत ही करीबी विधायक ने इस खेल को अंजाम दिया. माना जा रहा है कि इसके पीछे सीएम बहुगुणा से उक्त नेताओं की नाराजगी के बीच गुपचुप तरीके से सरकार की किरकिरी कराने की यह रणनीति बनाई गई थी. पिछले काफी समय से कांग्रेस के कई विधायकों की सरकार से नाराजगी जग जाहिर है. कुछ मंत्रियों ने एक दूसरे को नीचा दिखाने के लिए पहले सरकार की किरकिरी कराई और इसके बाद कई विधायकों ने सीएम बहुगुणा की कार्यप्रणाली पर सवाल निशान लगाने शुरू कर दिए थे. पिछले दिनों पार्टी के कुछ विधायकों ने सीएम से अपनी नाराजगी को जताते हुए उन पर अभद्रता तक के आरोप लगा डाले. इतना ही नहीं पार्टी के एक विधायक ने अपनी उपेक्षा का आरोप लगाकर त्यागपत्र देने तक की बात कही.

स्माचार पत्र ने प्रकाशित किया है कि शिक्षामित्र पर लाठीचार्ज मामले में सत्ता पक्ष के ही कुछ क्षत्रप् आन्दोलन का रूप उग्र चाहते थे जिससे वह मुख्यमंत्री को अपनी धमक दिखा सकें. जिससे शिक्षामित्रा स ंगठन के नेताओं का पूरा इंतजाम इनके द्वारा किया गया.

खैर कुल मिलाकर शिक्षामित्रों पर हुए लाठीचार्ज के बाद मुख्यमंत्री की चौतरफा आलोचना ने यह फिर से साबित कर दिया है कि मुख्यमंत्री को अपने घेरे को बदलने की नितांत आवश्यकता है.

 

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.