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युवा-ऊर्जा का पराभव!

By   /  January 11, 2013  /  2 Comments

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-देवेश शास्त्री||

विश्व के अधिकांश देशों में कोई न कोई दिन युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है। भारत में स्वामी विवेकानन्द की जयन्ती अर्थात् 12 जनवरी को प्रतिवर्ष राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र संघ के निर्णयानुसार सन् 1985 ई. को अन्तरराष्ट्रीय युवा वर्ष घोषित किया गया। इसके महत्त्व का विचार करते हुए भारत सरकार ने घोषणा की कि सन 1985 से 12 जनवरी यानी स्वामी विवेकानन्द जयन्ती का दिन राष्ट्रीय युवा दिन के रूप में देशभर में सर्वत्र मनाया जाए और मनाया जाने लगा यानी युवा दिवस के रूप स्वामी विवेकानंद का चिन्तन अपना प्रभाव छोड़ने की बजाय रस्म अदायगी की भेंट चढ़ गया। यही कारण है कि परमाणु-बम से भी अधिक ऊर्जित यूथ-पावर आज भीषण शीत में हेमराज और सुधाकर सिंह के रूप में नापाक बर्बरता की भेंट चढ़ गया। यूथ-पावर व्यभिचारी दुप्रवृत्ति में फंसकर निर्भीकता पूर्वक दुष्कर्म में संलग्न हो गया, अनगिनत दामिनियों की यूथ-पावर व्यभिचारी यूथपावर के शॉट-सर्किट से ध्वस्त होने लगी। यूथ-पावर यानी युवा ऊर्जा कदाचारी सियासी जमात की स्वार्थसिद्धि के लिए भोग्य-ऊर्जा बनकर कारगर साबित होने लगी।swamy vevkanand
1893 में स्वामी विवेकानंद ने शिकागो के विश्व धर्म सम्मेलन में कहा था-‘‘मैं एक ऐसे धर्म का अनुयायी होने में गर्व का अनुभव करता हूँ, जिसने संसार को सहिष्णुता तथा सार्वभौम स्वीकृति, दोनों की ही शिक्षा दी हैं। हम लोग सब धर्मों के प्रति केवल सहिष्णुता में ही विश्वास नहीं करते, वरन् समस्त धर्मों को सच्चा मानकर स्वीकार करते हैं। मुझे ऐसे देश का व्यक्ति होने का अभिमान हैं, जिसने इस पृथ्वी के समस्त धर्मों और देशों के उत्पीड़ितों और शरणार्थियों को आश्रय दिया हैं। जैसे विभिन्न नदियाँ भिन्न भिन्न स्रोतों से निकलकर समुद्र में मिल जाती हैं, उसी प्रकार हे प्रभो! भिन्न भिन्न रुचि के अनुसार विभिन्न टेढ़े-मेढ़े अथवा सीधे रास्ते से जानेवाले लोग अन्त में तुझमें ही आकर मिल जाते हैं। जो कोई मेरी ओर आता हैं – चाहे किसी प्रकार से हो – मैं उसको प्राप्त होता हूँ। लोग भिन्न मार्ग द्वारा प्रयत्न करते हुए अन्त में मेरी ही ओर आते हैं।’’ वास्तविक धर्म शक्ति, युवाशक्ति यही है।
स्वामी विवेकानंद मानते हैं कि धर्म का रहस्य आचरण से जााना जा सकता है। व्यर्थ के मतवादों से नहीं। सच्चा बनने के लिए सत् को धारण करना होगा। सत्यमेव जयते नानृतं, सत्य की ही विजय होती है मिथ्या लानी असत्य की नहीं। सत्यं ब्रह्म जगन्मिथ्या अर्थात् सत् है तो सिर्फ परमात्मा जो आत्मरूप से विद्यमान है। आज जरूरत है स्वामी विवेकानंद के सद्विचारों को धारण करने की।
स्वामी विवेकानंद ने 120 साल पहले 1893 में अतीत के झरोखे से आज के हालात को समझा था, शिकागों में उन्होंने कहा था- ‘‘साम्प्रदायिकता, हठधर्मिता और उनकी बीभत्स वंशधर धर्मान्धता इस सुन्दर पृथ्वी पर बहुत समय तक राज्य कर चुकी हैं। वे पृथ्वी को हिंसा से भरती रही हैं, उसको बारम्बार मानवता के रक्त से नहलाती रही हैं, सभ्यताओं को विध्वस्त करती और पूरे पूरे देशों को निराशा के गर्त में डालती रही हैं। यदि ये बीभत्स दानवी न होती, तो मानव समाज आज की अवस्था से कहीं अधिक उन्नत हो गया होता, पर अब उनका समय आ गया हैं, और मैं आन्तरिक रूप से आशा करता हूँ कि आज सुबह इस सभा के सम्मान में जो घण्टाध्वनि हुई हैं, वह समस्त धर्मान्धता का, तलवार या लेखनी के द्वारा होने वाले सभी उत्पीड़नों का, तथा एक ही लक्ष्य की ओर अग्रसर होने वाले मानवों की पारस्पारिक कटुता का मृत्यु निनाद सिद्ध हो।’’ क्या हम वह कर पाये जो स्वामी जी चाहते थे? नहीं, बदले में उसी वीभत्स अतीत की पुनरावृत्ति करते हुए हम समय, भाग्य और ईश्वर पर ही मिथ्या दोष लगाते हुए युवा-दिवस मनाकर विवेकानन्द के नाम पुष्पांजलि कर स्वयं को महिमामंडित कर लेते हैं।
सवाल उठता है क्या करे युवा वर्ग? इसका जवाब भी स्वामी विवेकानंद ही देते हैं- ‘‘सारी शक्ति तो तुम्हीं में है, अपने ऐश्वर्यमय स्वरूप को विकसित करो। तीनों लोक तुम्हारे पैरों के नीचे हैं। प्रबल शक्ति आत्मा की है। डर किस बात का है? मृत्यु से प्रेम करो, सिंह सी शूरता और फूल सी कोमलता के साथ आगे बढ़ो। यदि 2-4 लोग भी आत्मदृष्टा, पवित्र व नैतिक चरित्र वाले सत्यनिष्ठ मिल जायें तो तूफान मचा दें।’’
हम स्वामी विवेकानंद की 150 वीं जयन्ती मनाने जा रहे हैं, इतने लम्बे अंतराल में तूफान मचाने वाली युवा ऊर्जा दिग्भ्रमित होकर सियासी मदारी के हाथ का खिलौना बनकर ठगी जाती रही। जिन पर कुछ विश्वास भी किया जा सकता था वे कालनेमि सिद्ध होते जा रहे रहे है, दानवीयता में उलझी युवा ऊर्जा का मानवता पर बज्राघात तब तक जारी रहेगा, जब तक स्वामी विवेकानंद के सदुपदेशों को आत्मसात करने की प्रबल इच्छाशक्ति नहीं होगी।

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2 Comments

  1. Yudhvir Singh Lamba Bharatiya says:

    Yudhvir Singh Lamba Bharatiya

    स्वामी विवेकानंद
    स्वामी विवेकानंद जी आधुनिक भारत के एक महान चिंतक, दार्शनिक, युवा संन्यासी, युवाओं के प्रेरणास्त्रोत और एक आदर्श व्यक्तित्व के धनी थे । स्वामी विवेकानन्द का जन्म 12 जनवरी सन् 1863को कलकत्ता में एक कायस्थ परिवार में हुआ था। उनके बचपन का नाम नरेन्द्रनाथ दत्त था। पिता विश्वनाथ दत्त कलकत्ता हाईकोर्ट के एक प्रसिद्ध वकील थे। स्वामी विवेकानंद संत रामकृष्ण के शिष्य थे और स्वामी विवेकानंद ने 1 मई 1897 में कलकत्ता में रामकृष्ण मिशन और 9 दिसंबर 1898 को कलकत्ता के निकट गंगा नदी के किनारे बेलूर में रामकृष्ण मठ की स्थापना की।

    विश्वभर में जब भारत को निम्न दृष्टि से देखा जाता था, ऐसे में स्वामी विवेकानंद ने 11 सितंबर, 1883 को शिकागो के विश्व धर्म सम्मेलन में हिंदू धर्म पर प्रभावी भाषण देकर दुनियाभर में भारतीय आध्यात्म का डंका बजाया। उन्हें (स्वामी विवेकानंद )प्रमुख रूप से उनके प्रेरणात्मक भाषण की शुरुआत “मेरे अमरीकी भाइयो एवं बहनों” के साथ करने के लिये जाना जाता है। उनके (स्वामी विवेकानंद )संबोधन के इस प्रथम वाक्य ने सबका दिल जीत लिया था। विश्व धर्म सम्मेलन में उपस्थित 7000 प्रतिनिधियों ने तालियों के साथ उनका (स्वामी विवेकानंद )स्वागत किया।

    भारत में स्वामी विवेकानन्द के जन्म दिवस को राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है।
    विश्व के अधिकांश देशों में कोई न कोई दिन युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र संघ के निर्णयानुसार सन् 1985 ई. को अन्तरराष्ट्रीय युवा वर्ष घोषित किया गया। भारतीय केंद्र सरकार ने वर्ष 1984 में मनाने का फैसला किया था ।राष्ट्रीय युवा दिवस स्वामी विवेकानंद के जन्मदिवस (12 जनवरी) पर वर्ष 1985 से मनाया जाता है । भारत में स्वामी विवेकानन्द की जयन्ती, अर्थात 12 जनवरी को प्रतिवर्ष राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है।

    स्वामी विवेकानंद जी ने हमेशा युवाओं पर अपना ध्यान केंद्रित किया और युवाओं को आगे आने के लिए आह्वान किया । स्वामी विवेकानंद ने अपनी ओजस्वी वाणी से हमेशा भारतीय युवाओं को उत्साहित किया है । स्वामी विवेकानंद के विचार सही मार्ग पर चलते रहने कीप्रेरणा देते हैं।

    युवाओं के प्रेरणास्त्रोत, समाज सुधारक स्वामी विवेकानंद ने युवाओं का आह्वान करते हुए कठोपनिषद का एक मंत्र कहा था:-
    “उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत ।”-उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक अपने लक्ष्य तक ना पहुँच जाओ।

    भारतीय युवा और देशवासी स्वामी विवेकानंद के जीवन और उनके विचारों से प्रेरणा लें।
    युद्धवीर सिंह लांबा “भारतीय” (Yudhvir Singh Lamba Bhartiya)
    प्रशासनिक अधिकारी, हरियाणा इंस्टिटयूट ऑफ टेक्नॉलॉजी,
    दिल्ली रोहतक रोड (एनएच -10) बहादुरगढ़, जिला. झज्जर, हरियाणा राज्य, भारत

  2. Shri Roy says:

    प्रभावकारी, आँख और दिमाग खोलने सम्बन्धी सामग्रियां. धन्यवाद.

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