/शास्त्री जी! कब आओगे..?

शास्त्री जी! कब आओगे..?

‘‘जीत गया अयूब, शास्त्री की अर्थी को कंधे पर ढोकर।
मारा गया शिवाजी, अफजल की चोटों से घायल होकर।
वह सब क्षेत्र ले लिया केवल जोर शोर से मेज बजाकर।
पाकिस्तानी सेनायें थी नहीं ले सकी शस्त्र सजाकर।
स्वाहा करे उपासक का घर हमें न ऐसा हवन चाहिए।
तासकंद में प्राण खींच ले, हमें न ऐसी संधि चाहिए।।’’

देवेश शास्त्री||

उक्त पंक्तियां 11 जनवरी 1966 को तासकंद में शास्त्रीजी की रहस्यमय परिस्थिति में मौत की खबर के साथ ओज के सशक्त हस्ताक्षर पं. शिवशरण अवस्थी ‘पंगुजी’ के मुख से फूंटी थी. ‘‘उमग-उमग रहिजाय रे मनवा, पंगु बदन की लाचारी.’’ के बावजूद समसामयिक बिन्दुओ पर काव्यात्मक अभिव्यक्ति देने वाले पंगुजी ने खंडकाव्य सिपाही, ठगिनी-चीन और कश्मीर-घाटी जैसी पुस्तकें लिखी. उपासक का घर जलाने वाले हवन के रूप में तासकंद संधि को नकारना भारतीय जनों की सद्भावना की अभिव्यक्ति थी.lal_bahadur_shastri
1965 में जब अचानक पाकिस्तान ने भारत पर सायं 7.30 बजे हवाई हमला कर दिया. परम्परानुसार राष्ट्रपति ने आपात बैठक बुला ली जिसमें तीनों रक्षा अंगों के प्रमुख व मन्त्रिमण्डल के सदस्य शामिल थे. संयोग से प्रधानमन्त्री शास्त्रीजी उस बैठक में कुछ देर से पहुँचे. उनके आते ही विचार-विमर्श प्रारम्भ हुआ. तीनों प्रमुखों ने उनसे सारी वस्तुस्थिति समझाते हुए पूछा- सर! क्या हुक्म है? शास्त्रीजी ने एक वाक्य में तत्काल उत्तर दिया- आप देश की रक्षा कीजिये और मुझे बताइये कि हमें क्या करना है? शास्त्रीजी ने इस युद्ध में नेहरू के मुकाबले राष्ट्र को उत्तम नेतृत्व प्रदान किया और जय जवान-जय किसान का नारा दिया. इससे भारत की जनता का मनोबल बढ़ा और सारा देश एकजुट हो गया. इसकी कल्पना पाकिस्तान ने कभी सपने में भी नहीं की थी.
भारत पाक युद्ध के दौरान ६6 सितम्बर को भारत की 15वी पैदल सैन्य इकाई ने द्वितीय विश्व युद्ध के अनुभवी मेजर जनरल प्रसाद के नेत्तृत्व में इच्छोगिल नहर के पश्चिमी किनारे पर पाकिस्तान के बहुत बड़े हमले का डटकर मुकाबला किया. इच्छोगिल नहर भारत और पाकिस्तान की वास्तविक सीमा थी. इस हमले में खुद मेजर जनरल प्रसाद के काफिले पर भी भीषण हमला हुआ और उन्हें अपना वाहन छोड़कर पीछे हटना पड़ा. भारतीय थलसेना ने दूनी शक्ति से प्रत्याक्रमण करके बरकी गाँव के समीप नहर को पार करने मे सफलता अर्जित की. इससे भारतीय सेना लाहौर के हवाई अड्डे पर हमला करने की सीमा के भीतर पहुँच गयी. इस अप्रत्याशित आक्रमण से घबराकर अमेरिका ने अपने नागरिकों को लाहौर से निकालने के लिये कुछ समय के लिये युद्धविराम की अपील की.
आखिरकार रूस और अमरिका की मिलीभगत से शास्त्रीजी पर जोर डाला गया. उन्हें एक सोची समझी साजिश के तहत रूस बुलवाया गया जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया. हमेशा उनके साथ जाने वाली उनकी पत्नी ललिता शास्त्री को बहला फुसलाकर इस बात के लिये मनाया गया कि वे शास्त्रीजी के साथ रूस की राजधानी ताशकन्द न जायें और वे भी मान गयीं. अपनी इस भूल का श्रीमती शास्त्री को मृत्युपर्यन्त पछतावा रहा. जब समझौता वार्ता चली तो शास्त्रीजी की एक ही जिद थी कि उन्हें बाकी सब शर्तें मंजूर हैं परन्तु जीती हुई जमीन पाकिस्तान को लौटाना हरगिज मंजूर नहीं. काफी जद्दोजहेद के बाद शास्त्रीजी पर अन्तर्राष्ट्रीय दबाव बनाकर ताशकन्द समझौते के दस्तावेज पर हस्ताक्षर करा लिये गये. उन्होंने यह कहते हुए हस्ताक्षर किये थे कि वे हस्ताक्षर जरूर कर रहे हैं पर यह जमीन कोई दूसरा प्रधानमन्त्री ही लौटायेगा, वे नहीं. पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान के साथ युद्धविराम के समझौते पर हस्ताक्षर करने के कुछ घण्टे बाद 11 जनवरी, 1966 की रात में ही उनकी मृत्यु हो गयी.
आज शास्त्रीजी की पुण्यतिथि पर 1965-66 का पूरा वाक्या स्मृतिपटल पर इसलिए बार-बार आ रहा रहा है क्योंकि 1965-66 का घटनाक्रम 2013 के पहले पखवाड़े में दोहरा रहा है, जब सरहद पर अयूब-बंशज भरतवंशी सैनिक का सिर काटकर ले जाते हैं, हेमराज का सिरहीन धड़ ‘‘योगेश्वर कृष्ण की ब्रजभूमि’’ में पंचतत्व में विलीन हो गया. नापाक इरादों वाली पड़ोसी सेना दहशतगर्दी से बाज नहीं आ रही, लगातार गोलीबारी कर रही है और हमारे सैनिक विवश हैं, करारा जबाव देने का आदेश देने वाले शास्त्रीजी की आत्मा पिछले 47 वर्षो से आहत हो रही है, सैन्य आक्रोश अनुशासनात्मक बेड़ियों में कुंठित हो रहा है. सियासी जमात वोट-बैंक की चिंता में उत्तेजित युवा ऊर्जा को निस्तेज बनाने में लगा है, शास्त्री की 47 वीं पुण्यतिथि पर दो भारतीय सैनिकों का बलिदान, सत्तासीनों को कुछ तो करने के लिए प्रेरित करे, ताकि निर्णायक दौर इतिहास को नया अध्याय दे सके.

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