/अगर जंग लाजिमी है तो जंग ही सही…

अगर जंग लाजिमी है तो जंग ही सही…

-प्रणय विक्रम सिंह||

ताकत पर तमीज की लगाम जरूरी है मगर इतनी भी नहीं की वह बुजदिली बन जाये, शायद कश्मीर में शहीद हुए भारत मां के दोनों रणबांकुरों की चिताओं से उठता धुआं हिन्दुस्तान की मुर्दा सियासत को यही सन्देश दे रहा है. कश्मीर में शहीद हुए राजपुताना राइफल्स के दो जांबाज रणबांकुरों के क्षत-विक्षत शव को देखकर परिजनों समेत समूचे हिंद की अवाम का अंतर्नाद हिंदुस्तानी आबो हवा में गूंज उठा कि इंतकाम के बगैर आराम नहीं, मुझे अपने बेटे की शहादत पर गर्व है. मुझे दुश्मन का सिर चाहिए. पर इस गूंज का दर्द हर हिंदुस्तानी के दिलों में नश्तर की तरह चुभ रहा है.indo-Pak-war

उनकी चिताओं से उठता धुंआ चीख-चीख कर सियासत को संधि वार्ताओं के दौर से बाहर आने का सन्देश दे रहे हैं. मां भारती आहत है. उनकी करोड़ों संताने अवाक है. हेमराज और सुधाकर की बेरहमी से हत्या की खबर मिलते ही 13 राजपूताना राइफल्स की पूरी टुकड़ी ने खाना-पीना छोड़ दिया है. जवान अपने साथियों के साथ बरती गई दरिंदगी का बदला चाहते हैं. सही भी है अब यह खूनी खेल खत्म होना चाहिए.

किसी शायर ने कहा भी है कि ‘अमन चाहता हूं मगर जुल्म के खिलाफ अगर जंग लाजिमी है तो जंग ही सही.’अब स्थितियां काल के कपाल पर दुष्ट के विनाश का मृत्यु गीत की प्रस्तावना लिखने लगी हैं. हाड़ कंपकपा देने वाली सर्दी में भी रगों में दौड़ता हुआ लहू लावा बनने लगा है. बने भी क्यों न, जब घटना ही इतनी लोमहर्षक और अमानवीय है. अब तो इस बात में कुछ संदेह ही नहीं रह गया कि हमारा मुकाबला एक आतंकी संगठन से है, जो सेना का वेश धरे है. सेना के उसूल होते हैं. एक जवान का दूसरे जवान के प्रति व्यवहार की मर्यादा भी निश्चित होती है.

मंगलवार की घटना को अंजाम दे कर पाकिस्तान ने तालिबानियों, जेहादियों और सभ्य सेना के बीच की लकीर को भी धुंधला कर दिया है. पाकिस्तानी सेना जेहादियों के साथ कंधे से कंधा मिलाने में सभ्यता के सबक भी भूल गई है. पाक सेना ने बर्बर अपराधियों जैसी हरकत की है. सैनिक संघर्ष को लेकर जिनेवा समझौते जैसी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के खिलाफ हुई यह घटना कश्मीर मुद्दे को एक बार फिर मंच पर लाने की कोशिश है. ऐसी क्रूरता माफी के काबिल नहीं. अब इसे उकसावे की कार्रवाई कहिए या कश्मीर मुद्दे को उछालने की सोची-समझी रणनीति?

ताजा घटनाओं ने दोनों देशों के बीच रिश्तों को सुधारने और कारोबारी संबंधों के पुल बनाने की कोशिशों को भी करारा झटका दिया है. बीते एक महीने में पाकिस्तान ने जहां भारत के साथ कारोबारी संबंध सुधारने के लिए मोस्ट फेवर्ड नेशन का दर्जा देने के अपने वादे से कदम पीछे खींचे. वहीं दोस्ती की क्रिकेट श्रृंखला के साथ-साथ सीमा को सुलगाने की इस नापाक हरकत ने दोस्ती के नारों और रियायती वीजा व्यवस्था जैसी कोशिशों पर भी पानी फेर दिया है. लेकिन देश के उन जवानों से कोई भी खेल आगे नहीं हो सकता है क्योंकि खेल से जिस खेल भावना और सद्भावना की लम्बी-लम्बी बातें टीवी के सामने की जाती हैं उसके खत्म होने के 48 घंटे के भीतर ही सैनिकों के साथ इस तरह के बर्ताव को किस तरह से बर्दाश्त किया जा सकता है? इस परिस्थिति के बाद भारत को एक बार फिर से अपनी स्थिति पर पुनर्विचार करने की जरूरत है क्योंकि आखिर कब तक भारत, पाक की इस तरह की हरकतों को बर्दाश्त करता रहेगा? एक सबसे अहम बात जो करनी चाहिए कि पाक के साथ किसी भी तरह के किसी भी खेल को दुनिया के किसी भी मंच पर खेलने से मना कर दिया जाना चाहिए.

जब हम दशकों तक दक्षिण अफ्रीका और इस्राइल के खिलाफ इसलिए खेलने से मना करते रहे कि वे अपने यहां पर रंगभेद खत्म करने और बराबरी का दर्जा देने में आगे नहीं आ रहे हैं तो पाक से हमारा क्या अटक रहा है, जिस कारण से हम उसके साथ हर तरह के खेल हर जगह पर खेलें ही? अब देश में बहस छिड़ चुकी है कि हम इस बर्बरता का जवाब कैसे दें. कभी हमें बांग्लादेश मार जाता है तो कभी पाकिस्तान हमारी मैत्रीपूर्ण कोशिशों को हमारी बुजदिली आंकता है. चीन का खौफ तो भारतीय हुक्मरानों पर हमेशा ही रहता है. खैर चार-चार युद्धों के कारण बन चुके पाकिस्तान से दोस्ती की उम्मीदें रखना बेमानी है. जब उसकी हरकतें एक जिम्मेदाराना मुल्क की बजाय लुटेरों और डाकुओं जैसी होने लगी हैं तो हमें भी ‘सठे साठ्यम समाचरेत’ का अनुगमन करते हुए उसके साथ सख्त व्यवहार करना चाहिए. हमें समझना चाहिए कि पाकिस्तानी हुक्मरान कभी भी पाक सेना या अपनी नीतियों को गलत नहीं कहते हैं.

कश्मीर समस्या तो उनके वजूद की बुनियाद है, लिहाजा पाक की दोनों तंजीमें कश्मीर मसले को हर हाल में जिंदा रखना चाहती है और भारत सरकार इस ऐतिहासिक सत्य को जानकर भी अंजान बन रही है. जब कश्मीर ही विवाद का मूल है तो अब किसी भी प्रकार का संवाद कश्मीर समस्या के समाधान के बाद ही होना चाहिए. शायद यही शहीद सैनिकों को सच्ची श्रद्धांजलि होगी. यदि ऐसा नहीं किया गया तो भारत की बुजदिल सियासत यूं ही अपने बेगुनाह शहीदों की बदहाल लाशों पर स्यापा करती रहेगी? राजनीति ऐसे भावुक और गंभीर मसलों पर मौन है, ऊपर से कुछ बुद्धिजीवी अक्सर यह भी प्रवचन देते रहते हैं कि सेना पर हो रहे खर्च का एक हिस्सा अगर शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च किया जाए तो इस देश का उद्धार हो जाए. यह अच्छा है कि इस दूसरे विचार वाले वर्ग की सोच और संख्या दोनों ही बहुत दयनीय है.

दरअसल, ये जो बुद्धिजीवी टाइप के लोग हैं, वे सेना को भी महिला कल्याण और यातायात की तरह सरकार का एक और महकमा भर मानकर चलते हैं. उन्हें न तो लद्दाख की पहाडियों में हाड़ कंपा देने वाली ठंड में भी हमारी रक्षा करते जवानों का जज्बा दिखता है और न ही अपने परिवार की फिक्र छोडकर देश के लिए शहीद होते जवानों की जिंदगी. पाकिस्तान शांति प्रयासों के प्रति कितना गंभीर है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पिछले साल पाक सेना ने 73 बार सीमा रेखा का उल्लंघन किया. हालिया घटना भी पाक सेना के घुसपैठ करने के कारण पैदा हुई है. यही नहीं, मारे गये सैनिकों के शवों के साथ बर्बर व्यवहार की घटना भी पहली बार नहीं हुई है. कारगिल लड़ाई में भी पाक सेना ने कैप्टन सौरव कालिया के साथ ऐसा ही सलूक किया था. सौरभ कालिया के पिता अब भी इंसाफ के लिए लड़ रहे हैं. हमारे पास परमाणु बम है फिर भी हम पाक को बराबर का मान देते हैं. अनेक रक्षा सौदे अटके रहने के बावजूद हम पड़ोसी से पांच गुना ताकतवर हैं. अर्थव्यवस्था दस गुना मजबूत है, अगर इच्छाशक्ति हो तो साल दो साल में हम सामरिक स्तर पर भी दस गुना हो जाएंगे. अमन के इस तमाशे को खत्म करने के लिए युद्ध से भी ज्यादा साहस और संकल्प चाहिए. मुंबई में हो या मेंढर में. ये सिलसिला खत्म तभी होगा जब हम पड़ोसी के घर से लगी दीवार को और ऊंची और अभेद्य करेंगे.

निरूसंदेह यह कतई उचित नहीं होगा कि भारत कुछ ऐसा करे जिससे सीमा पर किसी तरह के संघर्ष की नौबत आए अथवा दोनों देशों में वैमनस्यता बढ़े, लेकिन इस तरह की घटना भी काबिल-ए-बर्दाश्त नहीं है. यदि संघर्ष विकल्प नहीं है तो पाकिस्तान की शर्तों पर चलते रहने का भी कोई मतलब नहीं. यह तो एक तरह का आत्मसमर्पण जैसा है. दुर्भाग्य से स्थिति ऐसी ही बन गई है और इसके लिए भारतीय कूटनीति ही जिम्मेदार है. भारतीय कूटनीति पाकिस्तान के समक्ष जिस तरह बार-बार असहाय साबित हो रही है उससे तो यही लगता है कि हमारे नीति नियंताओं ने खुद को एक सीमित सोच के दायरे में बांध लिया है. इस दायरे को तोडने की जरूरत है.

आचार्य चाणक्य ने कहा भी है, ‘सिंहाननैव, गजाननैव,व्याघ्राननैव च नैव च, अजा पुत्रं बलिम ददाति देवो दुर्बलरू घातकरू’ अर्थात शेर,हाथी और बाघ के बच्चों की बलि कभी नहीं दी जाती है, मतलब देवता भी दुर्बल के लिए घातक होते हैं. हमें यह समझना होगा की कभी-कभी शक्ति का प्रदर्शन अनेक युद्धों को टाल देता है. युद्ध के काले बादल सिर्फ उमड़-घुमड़ के बिना बरसे ही चले जाते हैं. अपनी दुष्टता के चलते भारत पर चार-चार युद्ध थोपने वाला पाकिस्तान ऐसी ही कार्यवाही की प्रतीक्षा में है, वह सर्प की भांति है जिसका फन कुचले बिना उसके विषदंत से रक्षा नहीं की जा सकती है. इसके लिए भारतीय हुकूमत को अपनी इच्छाशक्ति प्रदर्शित करनी होगी वरना यूं ही शहीदों की लाशों पर दुश्मन अट्टाहस करता रहेगा और हम शांति के कबूतर उड़ाते रहेंगे.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.