/हेडली की सजा पर नाराजगी का खेल…

हेडली की सजा पर नाराजगी का खेल…

-आशीष वशिष्ठ||

मुंबई हमले को अंजाम देने वाले अमेरिका में जन्मे लश्कर ए तैयबा के आतंकी डेविड कोलमैन हेडली को अमेरिका की अदालत ने 35 वर्ष की सजा सुना दी. लेकिन अमेरिका में हेडली को दी गई सजा से भारत में नाराजगी का माहौल है. यह नाराजगी आम आदमी से अधिक सियासी और कूटनीतिक स्तर पर दिख रही है. headley-ff801fa4ec7d5ed0f2b17c9013d101ca9e5434ab-s6-c10भारत के विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद से लेकर विपक्षी दल भाजपा समेत तमाम संगठनों आौर महानुभावों ने एक स्वर में अमेरिका के इस कदम की निंदा की और कहा कि अगर हेडली पर भारत में मुकदमा चलता तो उसके और कठोर दंड मिलता. ऊपरी तौर पर यह बयानबाजी सुनने में अच्छी लगती है लेकिन अफसोस इस बात का है कि ये बातें उस देश मे कही जा रही हैं जहां आंतकवाद को सियासत के चश्मे से देखा जाता है, जहां सत्तारूढ़ दल के नेता आतंकियों को ओसामा जी और हाफिज सईद साहब कहकर इज्जत बख्शते हैं, जहां आंतकवाद का रंगों और धर्मों में बांटकर देखा जाता हो, जहां कई दुर्दांत आंतकी पिछले कई वर्षों से मुफ्त की रोटियां तोडक़र मुटा रहे हों, जहां आतंकियों को सजा देने में कानून के हाथ कांपते हों, जहां मंत्री वोट बैंक की घटिया राजनीति के लिए आतंक की तस्वीरें देखकर मगरमच्छी आंसू बहाता हो, जहां सियासत आतंकियों के गांव तक पहुंच कर सांत्वाना देती हो, जिस देश को एक आतंकी को फांसी के फंदे पर टांगने में 65 साल लग गए हों उस देश में जब ऐसी बातें की जाती हैं तो हैरानी होती है कि नेता किसी भी मुद्दे पर राजनीति से बाज आने वाले नहीं है.

लेकिन अहम् प्रश्न यह है कि हेडली को अमेरिका में मिली सजा से भारत  संतुष्टï क्यों नहीं है. जिस देश की सरकार, मंत्री और नेता अमेरिका के अदने से अधिकारी के सामने कालीन की तरह बिछ जाते हों, जिस देश का प्रधानमंत्री विश्व बैंक और अमेरिका का फंड रिकवरी मैनेजर के तौर पर जाना जाता हो उस सरकार का अपने आका की कार्रवाई के प्रति नाराजगी जताना कुछ शक और शंका पैदा करता है. विरोध और नाराजगी की आड़ में कहीं कुछ महत्वपूर्ण तथ्य और नाकामियां छुपाने का अमेरिकी खेल तो नहीं चल रहा है जिसमें अमेरिका की ताल में भारत सरकार ताल मिला रही है और विरोध का नाटक और नाराजगी जाहिर कर जनता की सहानुभूति बटोरने और यह संदेश देने का प्रयास किया जा रहा है कि आतंकवाद और आतंकियों को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा. वास्तविकता किसी से छिपी नहीं है. सजा, नाराजगी और बयानबाजी का सारा खेल अमेरिका के इशारे पर हो रहा है जिसे भारतीय कठपुतलियां अंजाम दे रही है. अमेरिका ने न सिर्फ लश्कर आतंकी हेडली पर नरमी दिखाई, बल्कि मुंबई हमले की साजिश में शमिल पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आइएसआइ को भी साफ बचा ले गया. 26/11 हमले में अमेरिकी अदालत से 35 वर्ष कैद की सजा पाए हेडली ने आतंकी हमलों में पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आइएसआइ और आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा की भूमिका के बारे में कई चौंकाने वाली जानकारियां दी थीं. हेडली से पूछताछ में पता चला था कि आइएसआइ का एक मेजर भारत में हमले की साजिश को अंजाम देने के लिए धन भी मुहैया कराता था. हेडली को निर्देश देने वालों की पहचान आइएसआइ के मेजर इकबाल और लश्कर के पूर्व मुखिया साजिद मीर के तौर पर हुई.

साजिद मीर ही मुंबई हमले की साजिश रचने वाला मुख्य आतंकी था. अमेरिकी और भारतीय अधिकारियों के मुताबिक इकबाल अब भी पाकिस्तानी सेना में अधिकारी है और मीर आइएसआइ के संरक्षण में पाकिस्तान में रह रहा है. वैसे अब तक इसका भी जवाब नहीं मिला है कि हेडली की पत्नियों द्वारा 2001-08 के बीच उसके आतंकी गतिविधियों में शामिल होने को लेकर दी गई छह चेतावनियों पर एफबीआइ ने सुस्ती क्यों बरती. कई भारतीय और पश्चिमी अधिकारियों का मानना है कि अगर एफबीआइ ने चेतावनियों पर जांच शुरू की होती तो मुंबई हमले को टाला जा सकता था.

एफबीआइ, अमेरिकी ड्रग इनफोर्समेंट एडमिनिस्ट्रेशन (डीईए) और अन्य एजेंसियां अब तक यह भी स्पष्ट नहीं कर पाई हैं कि हेडली ने उनके लिए कब तक काम किया? डीईए के मुताबिक 2002 की शुरुआत में जब हेडली ने लश्कर से प्रशिक्षण लेना शुरू किया तभी उसे हटा दिया गया था. अन्य अमेरिकी एजेंसियों के मुताबिक उसने 2005 तक डीईए एजेंट के तौर पर काम किया, जबकि भारतीय अधिकारियों का आरोप है कि हेडली ने उसके बाद भी बतौर अमेरिकी एजेंट काम जारी रखा. मुंबई हमले की साजिश में पाकिस्तानी सेना, खुफिया एजेंसी आइएसआइ और आतंकी संगठन जमात-उद-दावा (जेयूडी) की संलिप्तता के ये पुख्ता सुबूत हैं. हेडली का सजा देने के मामले में अमेरिका पाकिस्तानी खुफिया आईएसआई को पूरी तरह से बचा ले गया.

विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने  कहा कि हेडली को दी गई सजा से थोड़ी निराश है. हेडली को और गंभीर सजा दी जानी चाहिए थी, अगर हेडली पर भारत में मुकदमा चलता है तो उसे और अधिक सजा होती. पता नहीं सलमान खुर्शीद ऐसे बयान किसे बहलाने और खुश करने के लिए दे रहे हैं.  अगर वो जनता को बेवकूफ समझते हैं तो शायद गलती कर रहे हैं.  हेडली को सजा सुनाये जाने के दो-तीन दिन पूर्व ही उनकी पार्टी के वरिष्ठ नेता और देश के गृहमंत्री सुशील शिंदे ने आतंकवाद को लेकर जो बचकाना और घटिया बयान दिया है वो जगजाहिर है. जब देश का गृहमंत्री आतंकवाद को धर्म और संप्रदाय से जोडक़र देख रहा हो किसके हौसले बुलंद होंगे आतंकियों के या सीमा पर तैनात सैनिकों के आसानी से समझ में आता है.

घटिया बयानबाजी में नेता और मंत्री नहीं अधिकारी भी बराबर के हिस्सेदार हैं. गत वर्ष पाकिस्तान से गृहसचिव स्तर की वार्ता में एक पाकिस्तानी पत्रकार के सवाल पर गृह सचिव आर. के. सिंह ने कहा था कि अगर पाकिस्तान भारत को लश्कर-ए-तैयबा के संस्थापक और 26/11 के मास्टरमाइंड हाफिज सईद को सौंप दे तो भारत पाकिस्तान को एक करोड़ अमेरिकी डॉलर (करीब 55 करोड़ भारतीय रुपए) की राशि देगा. हाफिज सईद पर इतना ही इनाम अमेरिका ने रखा है.  अब गृहसचिव से यह पूछा जाए कि वो हाफिज सईद को भारत लाकर क्या उसका नागरिक अभिनंदन करना चाहते हैं या फिर देश में आतंकी ट्रेनिंग स्कूल चलवाना चाहते हैं या फिर वो किसी राजनीतिक दल का वोट बैंक बढ़ाने की चाहत रखते हैं. जो देश दो सैनिकों के सिर कलम करने के बाद अपनी बदमाशी को कबूल करने से सरेआम इंकार करता हो वो पैसे लेकर हाफिज सईद को उन्हें सौंप देगा ऐसी सोच मूर्खता की श्रेणी में ही तो आएगी. जिस देश का गृहमंत्री बचकाने बयान देता हो और गृह सचिव राजनीतिक दल के नेता की भांति व्यवहार करता हो वहां सरकार आतंक के खिलाफ लड़ेगी या उन्हें सख्त सजा देगी इस पर कौन यकीन करेगा ये समझ से परे है. गृहमंत्री के बयान की प्रशंसा पाकिस्तानी आतंकी हाफीज सईद ने करके जता दिया कि सरकार की मंशा क्या है और शिंदे साहब उसमें कामयाब भी रहे हैं. अब शिंदे के बयान का सहारा लेकर आंध्र प्रदेश के राजनीतिक दल एमआईएम के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने 1992 बाबरी मस्जिद के गिरने के बाद के सभी बम धमाकों की जांच की मांग की है. वोट बैंक सहेजने और बढ़ाने की फिराक में राजनीति नीचता, धूर्तता और घटियापन पर उतर आई है कि अब आंतकवाद जैसे गंभीर और देश की सुरक्षा से जुड़े मसले पर भी वो रोटियां सेंकने लगी है.

हेडली की सजा पर भारत से उठ रहे आलोचना के स्वरों के बीच अमेरिका ने अपनी सफाई पेश की है. अमेरिकी सरकार के साथ एक डील के चलते वह मौत की सजा पाने से बच गया. हेडली को सजा सुनाने वाले जज ने भी इस डील पर गंभीर आपत्ति जाहिर की. इस मामले में अमेरिका का काला और षडयंत्रकारी तो बेनकाब हुआ ही है वहीं भारतीय सरकार का बनावटी गुस्सा भी जगजाहिर हो गया है. अगर यूपीए सरकार इस मुगालते में है कि कसाब को फंासी पर लटकाकर उसने आतंक के खिलाफ कड़े तेवर अपना लिए हैं तो यह उसका भ्रम है, देश की जनता को बखूबी मालूम है कि संसद हमले से लेकर दूसरे कई आतंकी घटनाओं में लिप्त आतंकी सरकार की रहमदिली के चलते ही जेल में मजे काट रहे हैं. रूबिया सईद से लेकर कंधार विमान अपहरण कांड में तत्कालीन सरकार की कायरता किसी से छिपी नहीं है. हेडली को अमेरिका में सजा मिलने के बाद आ रही प्रतिक्रिया कोरी बयानबाजी और खालिस राजनीति के सिवाय कुछ और नहीं है. सरकार और राजनीतिक दलों को बचकानी बयानबाजी और ओछी राजनीति से हटकर आंतकवाद की समस्या के समाधान के लिए गंभीर प्रयास और कदम उठाने चाहिए इसी में सबकी भलाई है.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.