/बिहार में जारी है सरकारी विज्ञापन की लूट का खेल…

बिहार में जारी है सरकारी विज्ञापन की लूट का खेल…

 -नालंदा से संजय कुमार|| 

बिहारशरीफ. बिहार में जद(यु)-भाजपा गठबंधन के साथ एक और गठबंधन है – सरकार व दैनिक समाचार  पत्रों का. जिस प्रकार सरकार के मुखिया गठबंधन के नेताओ के गलत कामों को नजरअंदाज करते है,  ठीक उसी  प्रकार दैनिक समाचार पत्र के कारनामों को सरकार के मुखिया नजरअंदाज कर रहे है.

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उपयोगिता समाप्त होने  के बाद सरकारी विज्ञापन छापे जा रहे है तथा सरकार राशि का  भुगतान भी कर रही है, जो दर्शाता है कि दोनों के बीच  अन्दर -अन्दर गुप्त  समझौता है. सरकारी सजावटी विज्ञापनों का उद्देश्य होता है लोक कल्याणकारी कार्यक्रमों का प्रचार-प्रसार करना और किसी तारीख विशेष को होने वाले किसी लोक कल्याणकारी शिविर कि सुचना आमजन तक पहुँचाना. मगर बिहार में हो रहा है ठीक इसके उलट और सजावटी विज्ञापनों के के ज़रिये सिर्फ अख़बार को फायदा पहुचाना ही मकसद बन कर रह गया लगता है ताकि ये अखबार सरकार में बैठे राजनेताओं और अधिकारियों द्वारा किये जा रहे अवैध और गलत कामों की तरफ ध्यान न दें.

बिहार सरकार जनता की गाढ़ी कमाई से कर वसूल कर एकत्र किये गए ख़जाने का  किस प्रकार दुरूपयोग कर रही है , इसकी बानगी पटना से प्रकाशित दैनिक प्रभात खबर के 24 जनवरी के अंक को देखने से पता चल  जाती है.

bihar prabhat khabar1दैनिक प्रभात खबर, पटना के मगध संस्करण के 24 जनबरी 2013 के पेज सं-15 पर आधा  पेज का रंगीन विज्ञापन, ‘बिटिया बचाओ अभियान’ शीषक से प्रकाशित हुआ  है. बिहार सरकार के सूचना और सम्पर्क विभाग द्वारा जारी विज्ञापन सं-पी.आर .नं-१३७७१ स.(नि.नि.)१२-१३में कहा गया है कि कन्या भ्रूण हत्या निर्मूल करने के लिए ‘बिटिया बचाऒ अभियान” शिशु मुत्यु  दर कम करने हेतु “राष्ट्रीय सम्मेलन” आयोजित किया जा रहा है. दिंनाक 23 जनवरी 2013, समय -पूर्वाह्न 10.30 बजे, स्थान -एस.के. मेमोरियल हाल ,गांधी  मैदान, पटना.  विज्ञापन में कहा गया है कि आप सादर आमंत्रित हैं इसमें माननीय जनप्रतिनिधि एवं  चिकित्सकगण विशेष रूप से सहयोगी बने.
वही दूसरी ऒर  दैनिक प्रभात खबर, पटना के मगध संस्करण के 24 जनवरी 2013 के पेज सं- 2 पर 23 जनवरी के bihar sushil modiउद्घाटन का समाचार छपा है, जिसका शीर्षक  है – सूबे में बनेगी समेकित  स्वास्थ्य नीति : मॊदी, २०१७ तक राज्य में  शिशु मुत्यु  दर प्रति हजार पर 44 से घटा कर 30 करने का लक्ष्य.
आखिर क्यो  कार्यक्रम समाप्ति के एक दिन बाद विज्ञापन छापा जा रहा है? बिहार सरकार की मंशा विज्ञापन के जरिये कार्यक्रम का प्रचार -प्रसार करना है या सिर्फ अख़बार को फायदा पहुचाना?  ऐसे विज्ञापन का भुगतान राज्य सरकार क्यों कर देती है. पूर्व  में भी ऐसा कारनामा पटना के कई दैनिक अखबार कर चुके है. सरकार की चुप्पी यह दिखाती  है कि  बिहार में जद(यु)-भाजपा गठबंधन के साथ ही दैनिक समाचार पत्रों के बीच  भी गठबंधन है और सुशासन सरकार ने गठबंधन धर्म को निभाते हुए चुप्पी साध रखी है.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.