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विकास की बाँसुरी, हिन्दुत्व का मसाला

By   /  February 11, 2013  /  3 Comments

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-कमर वहीद नक़वी||

तो जनाब बिगुल तो बज चुका है! 2014 या मुलायम सिंह की मानें तो 2013 में कभी भी लोकसभा के लिए होनेवाले ‘वोटरलू’ के लिए (क्योंकि यह चुनाव राहुल गाँधी या नरेन्द्र मोदी में से किसी न किसी के लिए तो ज़रूर वाटरलू साबित होगा) सेनाएँ तैयार होने लगी हैं, हथियार निकलने लगे हैं, युद्ध-समीक्षकों का दम फूलने लगा है, और वोटर अपने स्क्रीनप्ले के पात्रों, दृश्यावलियों, नाटकीय उतार-चढ़ावों और क्लाइमेक्स की रचना में जुट गया है. वैसे तो लोग हर चुनाव को महासंग्राम या महाभारत की संज्ञा दे दिया करते हैं लेकिन सच बात यह है कि इस बार का चुनाव सचमुच आधुनिक भारत के इतिहास का पहला राजनीतिक महाभारत होगा, शायद बहुत कठिन, बहुत भीषण, बहुत घमासान और बहुत अकल्पनीय स्थितियों का जनक भी!Qamar Waheed Naqvi

दृश्य एक: गर्म हवा बहने लगी है. तीर्थराज प्रयाग से ‘धर्मयुद्ध’ का शंखनाद हो चुका है. आरएसएस, विश्व हिन्दू परिषद, देश भर से आये साधू-सन्त और बीजेपी की तरफ़ से एलान हो चुका है नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री और अयोध्या में राम मन्दिर बनाने का. ये दोनों संकल्प एक मंच से एक साथ उठते हैं. इसका गहरा अर्थ है.

दृश्य दो: उधर, दिल्ली में कॉलेज छात्रों के सामने नरेन्द्र मोदी बहुत आकर्षक पैकेजिंग में गुजरात के कॉस्मेटिक विकास की ऐसी ‘आइटम गर्ल’ नुमा सुपरहिट ब्रांडिंग पेश करते हैं कि लोग सब कुछ भूल कर मदहोश हो जाते हैं. मीडिया भी मदमस्त हो जाता है.

दृश्य तीन: और दूसरी तरफ़, एक अलसाये शनिवार को अचानक सुबह-सुबह ख़बर आती है कि अफ़ज़ल गुरू को फाँसी दे दी गयी! काँग्रेस के तरकश से भी जवाबी तीर निकला!

यह युद्ध का पहला नमूना है!

दरअसल, आरएसएस ने इस बार बड़ी चतुराई से इस महाभारत के लिए एक दुधारी तलवार चुनी है. एक धार विकास की, दूसरी धार हिन्दू राष्ट्र की! संघ को लगता है कि इस बार जीत का जादुई चिराग़ वाक़ई उसके हाथ लग गया है. और यह चिराग़ है ‘मोहिन्दुत्व’ का!

मोदीत्व+हिन्दुत्व=मोहिन्दुत्व! समझ में आया! पिछले कई सालों से यह कहा जाता रहा है कि बीजेपी गुजरात में चुनाव हिन्दुत्व की बदौलत नहीं, बल्कि मोदीत्व के चलते जीतती रही है. इस मोदीत्व में कई चीज़ें शामिल हैं. ‘विकास’ और ‘सुशासन’ का एक मोदी फ़ार्मूला तो है ही जो फ़िल्म के ट्रेलर की तरह हर जगह चलाया जा सकता है, लेकिन फ़िल्म में और भी बहुत कुछ है. मसलन धुन का पक्का एक क़द्दावर नेता, जो किसी को कुछ नहीं समझता चाहे वह राजधर्म की दुहाई देनेवाले अटलबिहारी वाजपेयी हों या बात-बात पर देश की अदालतों की फटकार हो, जो चुटकियों में दो-टूक फ़ैसले लेता है और आनन-फ़ानन में उन्हें लागू भी कर देता है, जो मुँहफट है और सबको खरी-खरी सुना देता है, जिसने ‘गुजरात गौरव’ को सातवें आसमान पर पहुँचा दिया, जो हमेशा हिन्दुओं और हिन्दुत्व की रक्षा करेगा, जो पाकिस्तान को धूल चटा देगा आदि-आदि. इन सारे तत्वों से मिल कर बनता है मोदीत्व, जिसमें इन तमाम चटनियों के साथ-साथ सतह के नीचे ‘मुसलमानों को मज़ा चखा देने’ का घी भी शामिल है, जिसके बिना यह अवलेह तैयार ही नहीं हो सकता था!

और जब इस बार गुजरात में भारी मतदान की आँधी के साथ मोदी ने तीसरी बार विधानसभा चुनाव जीत लिया, तो किसी को सन्देह नहीं रह गया कि बीजेपी के तुरुप के इक्के मोदी ही होंगे. सब जानते हैं कि बीजेपी में बहुत-से लोगों को मोदी बिलकुल भी रास नहीं आते और यह भी सही है कि मोदी के अचानक उभार से बीजेपी के कई दिग्गजों के करियर को शायद कभी न ख़त्म होनेवाला ग्रहण लग जाय, फिर भी मोदीत्व की सुनामी के सामने समर्पण कर देने से बेहतर कोई विकल्प किसी के पास नहीं था. लेकिन संघ और बीजेपी दोनों इस बात को समझते थे कि मोदी को प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार की तरह पेश करने के जितने फ़ायदे हैं, उतना ही नुक़सान भी! मोदी के नेतृत्व में चुनाव लड़ने से नीतिश कुमार जैसे साथी का एनडीए से हटना जहाँ लगभग तय माना जा रहा है, वहीं सरकार बनाने के लिए ममता बनर्जी समेत कुछ और पार्टियों को भी भविष्य में ला पाना शायद सम्भव न होगा. इसलिए ज़रूरी है कि बीजेपी अकेले इतनी सीटें जीत ले कि उसे सरकार बनाने के लिए या तो किसी की ज़रूरत न पड़े या फिर कम से कम साथियों से काम चलाया जा सके.

मौजूदा लोकसभा में बीजेपी कुल 116 सीटें जीत पायी थी, जो बहुमत के 272 के आँकड़े से 156 कम है. 44 सीटें बीजेपी के सहयोगियों ने जीती थीं. इसमें से अगर नीतिश कुमार के जेडीयू की 20 सीटें निकाल दें तो एनडीए की कुल सीटें 140 पर सिमट जाती हैं. अब सवाल यह है कि बाक़ी 132 सीटों की कमी बीजेपी कहाँ से पूरा करेगी? जयललिता के अलावा कोई नया बड़ा साथी फ़िलहाल मिलता नहीं दिखता. नवीन पटनायक एक समय बीजेपी के साथ थे, फिर अलग हो गये. अब आयेंगे या नहीं, कुछ कहा नहीं जा सकता. आंध्र में जगन रेड्डी को बीजेपी को पटाना होगा. वह आना चाहेंगे या नहीं, ये भी साफ़ नहीं है. कर्नाटक में येदियुरप्पा अगर रूठे रहे तो बीजेपी की सीटें वहाँ घटेंगी ही. इसलिए बीजेपी के लिए ज़रूरी है कि वह पूरे देश में अपना जनाधार बड़े पैमाने पर बढ़ाये और अपनी सीटों की संख्या में नाटकीय इज़ाफ़ा करे.

तो क्या ऐसा सिर्फ मोदीत्व से हो सकता है? ज़ाहिर है कि नहीं. इसलिए संघ ने नयी जुगत भिड़ायी. मोदीत्व की चटनी में हिन्दुत्व की मिर्च इसीलिए झोंकी जा रही है. ध्यान दें कि पिछले डेढ़ दशक से बीजेपी ने हिन्दुत्व के एजेंडे को डीप फ़्रीज़र में रखा हुआ था. क्योंकि एक तो वह सत्ता की राजनीति को ततैया की तरह काट रहा था और दूसरे बीजेपी के पास ऐसा कोई नेता बचा भी नहीं था कि वह ‘हिन्दुत्व की धर्मध्वजा’ को अपने कँधों पर ले कर चल सके. लेकिन अब, जबकि बीजेपी के पास मोदी के अलावा कोई विकल्प नहीं है और गुजरात दंगों का जिन्न फिर बोतल से बाहर आयेगा ही, ऐसे में मोदीत्व के साथ हिन्दुत्व को जोड़ कर ‘मोहिन्दुत्व’ की दुधारी तलवार से बेहतर जुआ संघ खेल भी नहीं सकता था.

रणनीति साफ़ है. मोदीत्व की बाँसुरी से युवाओं और विकास के परवानों को मोहा जाये और हिन्दुत्व की हुँकार से राम मन्दिर और हिन्दू राष्ट्र की बुझ चुकी बाती को फिर से दहकाया जाय. मोदी सिर्फ विकास-विकास की कबड्डी खेलेंगे, विहिप ऐंड कम्पनी हिन्दुत्व का मसाला बेचेगी, बस हो गया काम! उधर, काँग्रेस ने अफ़ज़ल गुरू का दाँव चल दिया. क्या ज़बरदस्त टाइमिंग है! आगे-आगे देखिए होता है क्या? वोटों के महामंथन से पहले क्या-क्या निकलता है, आसमान में घिर रही घटाओं और कड़कती बिजलियों से इसका कुछ-कुछ आभास तो होने लगा है.

(कमर वहीद नक़वी का यह आलेख अमर उजाला से साभार)

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

3 Comments

  1. kiran yadav says:

    naqwi sahb se poochhhana chahiyr ki hinduttaw ke naam par inaka dum kyon fool raha hai

  2. ASHOK SHARMA says:

    चुनाव तो होना ही है इसमें हैरानी की बात क्या है

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