/भावनाओं की भीड़ और षडयंत्रकारी सत्ता…

भावनाओं की भीड़ और षडयंत्रकारी सत्ता…

-आशीष वशिष्ठ||
पिछले दो वर्ष में ऐसे कई अवसर आए जब देश की जनता ने इस बात का एहसास कराया कि देश में घटने वाली छोटी-बड़ी घटनाएं उन्हें झकझोरती हैं और वो समाज व देश के प्रति अपने कर्तव्य व उत्तरदायित्व को समझते हैं और अपने अधिकारों का भी इल्म है. जन लोकपाल बिल के लिए अन्ना के आहवान पर एकत्र हुई भीड़ और दामिनी बलात्कार कांड में स्वत: स्फूर्त जुटी लाखों की भीड़ ने सत्ता को हिला दिया और तंत्र को लोक की ताकत का दर्शन करवाया. Police chase and use water canons on demonstraters during a protest in front of India Gate in New Delhiवास्तव में भीड़ की शक्ति को नकारा नहीं जा सकता है दुनिया में बड़े-बड़े बदलाव इसके उदाहरण हैं. लेकिन भीड़ का अपना चरित्र होता है. हमारे देश की भीड़ का चरित्र इमोशनल यानी भावनाओं से भरा है. तभी तो भावनाओं में बहकर लाखों लोग बिना किसी नेतृत्व के सत्ता को घुटने टेकने पर विवश कर देते हैं और दो-चार दिनों की गुस्सा, गर्मी के बाद परिदृश्य से पूरी तरह गायब हो जाते हैं. भीड़ का इमोशनल चरित्र कुछ समय के लिए ज्वार तो पैदा कर सकता है लेकिन सार्थक और स्थायी नतीजे नहीं ला पाता. भीड़ का इमोशनल चरित्र स्वयं उसके लिए भी घातक है क्योंकि उसके समक्ष षडयंत्रकारी सत्ता खड़ी होती है जो स्वार्थसिद्धी के लिए साम-दाम-दण्ड-भेद का प्रयोग करने से चूकती नहीं है.
जन लोकपाल बिल के लिए अन्ना ने आजादी के बाद से देश का सबसे बड़ा जनआंदोलन खड़ा किया. शुरूआत में सरकार ने पैंतरेबाजी से आंदोलन को तोडऩे और मोडऩे के प्रयास किये लेकिन जब इसमें सफल नहीं हो पायी तो उसने बातचीत का दौर चलाकर सुलह के लिए हाथ आगे बढ़ाया. सरकार ने एक कदम आगे तो दो कदम पीछे खींचने वाली रणनीति अपनायी और साथ ही साथ टीम अन्ना में फूट डालने से लेकर कीचड़ उछालने तक के सारे हथकंडे अपनाये. कालाधन की मुहिम चला रहे योगगुरु रामदेव के आंदोलन को भी सरकार ने कुचलने की कुत्सित तब तक जारी रखी जब तक वो अपने मंसूबों में कामयाब नहीं हो गयी. रामलीला मैदान में लाठीचार्ज से लेकर रामदेव के सहयोगी बालकृष्ण को फर्जी पासपोर्ट के मामले में फंसाने और रामदेव की ट्रस्ट को कई मामलों में उलझाकर सरकार ने उनका मुंह बंद करवाया. अन्ना और रामदेव की आंदोलनों की असली ताकत देश की जनता ही थी. ये सच्चाई है कि देश की जनता व्यवस्था के चरित्र, आचरण और आम जीवन में बढ़ते भ्रष्टाचार से पूरी तरह ऊबी हुई है, ऐसे में अन्ना और रामदेव में उन्हें आशा की एक किरण दिखाई दी और वो भावनाओं में बहकर उनके पीछे चल दी. षडयंत्रकारी सत्ता को बखूबी मालूम था कि अन्ना और रामदेव तभी तक शेर की भांति दहाड़ रहे हैं जब तक उनके पीछे आम आदमी की ताकत है. सरकार ने सोची समझी साजिश के तहत कभी हां और कभी ना की नीति अपनायी और यह दर्शाने का प्रयास किया कि टीम अन्ना और रामदेव भी भ्रष्टाचार में लिप्त हैं. सरकार ने कीचड़ उछालने का कोई मौका नहीं छोड़ा और असल मुद्दे को लटकाए रखा. जिसका परिणाम यह हुआ कि भावनाओं के वेग पर जो जनता अन्ना और रामदेव के पीछे-पीछे चल रही थी, उत्साह से नारे बुलंद कर रही थी के जोश में धीरे-धीरे कमी आती गयी और वो उसने इन आंदोलनों से दूरी बना ली यानी चालाक सत्ता अपने मंसूबों में कामयाब हो गयी.
असलियत यह भी है कि रामदेव, अन्ना हजारे, अरङ्क्षवद केजरीवाल की बातें देश के आम आदमी को आकर्षित करते हैं और उसके ब्लड प्रैशर को भी बढ़ाती हैं लेकिन भावनाओं की तरंगों पर चढक़र जो भीड़ दिल्ली के जंतर-मंतर, कनाट प्लेस, रायसीना हिल्स और रामलीला मैदान में जोशीले नारे लगाती है; जो भीड़ इण्डिया गेट में कैंडल जलाती है वो चार दिनों के बाद एकदम ठण्डी होकर बैठ जाती है और जो सत्ता और उसकी मशीनरी जनता के क्रोध और उतेजना के समक्ष भीगी बिल्ली बनी बैठी थी दो-चार दिनों की चुप्पी के बाद अपने ढर्रे पर लौट आती है. असल में सत्ता को बखूबी इस बात का इल्म है कि अब कोई मुडक़र पूछने नहीं आएगा कि उन तमाम वादों का क्या हुआ जो उन्होंने भीड़ और देश की जनता के सामने किये थे, उस पर क्या कार्रवाई हुई? जनता की भावनाएं पानी में उठी झाग की तरह शांत हो जाती हैं और इसी का लाभ सत्ता उठाती है सरकार का जनता के समक्ष झुकना और उसकी हां में हां मिलाना क्राइसस मैनजमेंट का हिस्सा होता है, असल में न तो सत्ता झुकती है और न ही जनता की बात सुनती है, वो वही करती है जो उसने सोचा होता है और जो उसके लिए फायदेमंद होता है.
देश की जनता के इमोशनल चरित्र की दर्शन केवल आंदोलनों और प्रदर्शनों तक ही सीमित नहीं है, जीवन के हर क्षेत्र में इसके दर्शन होते हैं. क्रिकेट मैच जीतने पर जो खिलाड़ी हीरो बन जाते हैं वहीं एक मैच हार जाने के बाद खलनायक भी बन जाते हैं. किसी उत्पाद के दाम दस रुपये बढ़ाने के बाद सरकार दो रुपये कम करती है तो सबकी उसकी वाह-वाही में जुट जाते हैं और आठ रुपये की बढ़ोतरी का भूल जाते हैं. रसोई गैस की राशनिंग पर खूब हो-हल्ला मचता है सरकार सब्सिडी के सिलेण्डर की संख्या निर्धारित कर देती है. सरकार के निर्णय पर नाराजगी की बजाय हमें इस बात पर अधिक संतुष्टि मिलती है कि सरकार ने सब्सिडी वाले सिलेण्डरों की संख्या बढ़ा दी है. हमारे इसी इमोशनल चरित्र का भरपूर लाभ तथाकथित राजनीतिक दल, सामाजिक कार्यकर्ता और आंदोलनकारी उठाते हैं और हमारे कंधों पर बन्दूक रखकर अपने निशाने साधते हैं. हमाम में सभी नंगे हैं, कोई किसी से कम नहीं है और इन सब के बीच हर बार इमोशनल जनता ठगी जाती है.
अहम् प्रश्र यह है कि षडयंत्रकारी सत्ता से कैसे निबटा जाए? कैसे जनता के व्यवहार और चरित्र को बदला जाए? किस तरह जनता को शिक्षित व प्रशिक्षित किया जाए कि वो अपनी मांगों, समस्याओं और दु:ख-दर्दे को क्रोधवश या भावनाओं के वेग में आकर सडक़ों पर उतरने की बजाय एक ठोस रणनीति के तहत उनके ठोस व स्थायी समाधान के लिए संघर्ष करे. अशिक्षा, गरीबी, भूखमरी, जात-पात, भेदभाव, भाषा-बोली के झगड़े और तुच्छ स्वार्थ वो तमाम कारण है जो देश के आम आदमी को बांटते हैं. ऐसा नहीं है कि देश में आंदोलन और संघर्ष नहीं होते लेकिन वो क्षेत्रवाद, दलगत राजनीति और किसी स्वार्थी बैनर के तले स्थानीय स्तर पर ही दम तोड़ देते हैं. किसान, आदिवासी, गरीब, वंचित, शोषित, पीडि़तों की लंबी कतार देश में है लेकिन उनकी समस्याएं राष्ट्रीय पटल पर स्थान नहीं पाती हैं. जरूरत इस बात की भी है कि जनता अपने तुच्छ स्वार्थों और भावनाओं से ऊपर उठकर भले-बुरे के बारे में सोचे और समझे. भावनाओं में बहकर एकदम निर्णायक स्थिति में पहुंचने या मरने-मारने पर उतारू होने की बजाय शांतिचित से समस्या के दूरगामी प्रभाव एवं समाधान तलाशे और अपनी तार्किक बुद्धि का प्रयोग करे. क्योंकि दो-चार दिन के हो-हल्ले वाला चरित्र किसी भी समस्या का स्थायी समाधान या बदलाव नहीं ला पाता है. जब सामने वाले को यह पता हो कि दो दिन के धरने-प्रदर्शन, हो-हल्ले, यात्रा, कैंडल मार्च के बाद सब शांत होकर बैठ जाएंगे तो भला कोई क्यूं डरने लगा और आपकी बात मानने लगा. वास्तव में किसी भी संगठन, दल या देश की असली ताकत जनता होती है. देश की जनता विशेषकर युवा जाग तो गये हैं. लेकिन उसके व्यवहार और चरित्र में इमोशनल पक्ष अधिक प्रभावी है जिसे बदलने की जरूरत है.

Facebook Comments

संबंधित खबरें:

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.