Loading...
You are here:  Home  >  राजनीति  >  Current Article

हिंसा के मूल में है सामाजिक असमानता….

By   /  February 21, 2013  /  1 Comment

    Print       Email
इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..

श्रमिक संगठनों की देशव्यापी हड़ताल से सरकार की नींद भले ही न टूटी हो किन्तु उनके उत्पात से अनेक नागरिकों की नींद जरूर उड़ गई होगी। अपने बंद को अभूतपूर्व बताने वाले श्रमिक संगठनों के सदस्यों, मजदूरों, श्रमिकों ने जिस तरह से उत्पाती हालात बनाये और अकारण नागरिकों को, उनकी गाड़ियों को, अन्य दूसरे वाहनों को अपनी हिंसा का शिकार बनाया, वह नितान्त निन्दनीय और चिन्ताजनक है। इस बन्द में मिले अप्रत्याशित समर्थन से उत्साहित मजदूरों ने सरकार के प्रति उपजी हताशा, क्रोध, असंतोष को हिंसात्मक तरीके से प्रस्तुत करके एक प्रकार से अपने संगठित स्वरूप के विकृत और वीभत्स होने का ही उदाहरण दिया है। India_Strike_05151वैसे यह एक प्रकार का सार्वभौमिक सत्य है कि जब भी संगठन सशक्त स्वरूप में दिखाई देने लगता है तो उसके हिंसक, विकृत, वीभत्स होने के आसार बहुत बढ़ जाते हैं। कुछ इसी तरह का प्रदर्शन श्रमिक संगठनों के बन्द के दौरान भी देखने को मिला।

श्रमिकों, मजदूरों द्वारा बन्द के दौरान की गई हिंसा की निन्दा होनी चाहिए, उनके इस कुकृत्य की भर्त्सना भी होनी चाहिए। समझना चाहिए कि हमारा संविधान हड़ताल, बन्द जैसे कदमों को किसी भी तरह से अधिकार के रूप में स्वीकृति नहीं देता है। ऐसे में श्रमिकों की हड़ताल, बन्द और उसके साथ-साथ चली हिंसा किसी भी रूप में क्षम्य नहीं है। इस अक्षम्य हरकत का एक दूसरा पहलू भी है जिसे किसी भी रूप में नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। श्रमिक संगठनों द्वारा सरकार को लगभग चार माह पूर्व ही इस हड़ताल के प्रति, बन्द के प्रति आगाह कर दिया गया था। इसके बाद भी सरकार की ओर से इस तरह के कोई कदम नहीं उठाये गये, जो इन श्रमिक संगठनों के बन्द को रोकने में प्रभावी भूमिका का निर्वहन करते। सरकारों द्वारा सदैव से वोट-बैंक को ध्यान में रखकर की जाने वाली कार्यवाहियों के चलते इस तरह के कदमों को रोकने के उपाय शीघ्रता से और सकारात्मक रूप में न करने का एक चलन सा बन गया है।

सरकार की आगामी नीति क्या होगी, श्रमिक संगठनों का अगला कदम क्या होगा ये विमर्श के विषय हो सकते हैं किन्तु इस बात पर भी विचार किया जाना चाहिए कि आखिर कोई भी बन्द हो, हड़ताल हो वह अन्ततः हिंसा का शिकार क्यों होने लगता है? कभी हड़ताल और बन्द का, आन्दोलन का आहवान करने वाले हिंसात्मक रुख अख्तियार करते हैं तो कभी शासन-प्रशासन की ओर से हड़ताल, बन्द अथवा आन्दोलन को निष्प्रभावी करने के लिए हिंसात्मक रवैया अपनाया जाता है। हिंसा इस तरह के कदमों का किसी भी रूप में समाधान नहीं है। यहां समाज के भीतर फैल रही विसंगति, असमानता को, असंतोष को समझने की आवश्यकता है। वर्तमान में समाज में जिस तरह से अमीर गरीब के बीच की खाई बढ़ी है; मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए आम आदमी का दर-दर भटकना होने लगा है; शासन-प्रशासन की ओर से जिस तरह से निरंकुश, निष्क्रियता का वातावरण बनाया जा रहा है; सत्ता, धन, बल की हनक का अप्रत्याशित रूप से बढ़ना रहा हो, सभी ने बहुत बुरी तरह से असंतोष का निर्माण किया है। इनके चलते एक वर्ग बुरी तरह से हताशा, निराशा के माहौल में डूब जाता है। इस हड़ताल में उपजी हिंसा इसी हताशा, निराशा का परिणाम है।

श्रमिक संगठनों की मांगों को सरकार माने अथवा न माने किन्तु उसे अपनी तमाम जनहितकारी योजनाओं के मध्य सामाजिक रूप से उत्पन्न हो रही वैषम्यता को, असंतोष को दूर करने के उपाय भी खोजने होंगे। यदि ऐसा नहीं हो पाता है तो समाज में बढ़ती दूरियां, असंतोष, हताशा, निराशा, विषमता के परिणामस्वरूप इस तरह की हिंसा रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा बन जायेगी।

Facebook Comments

इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..
    Print       Email

About the author

बुन्देलखण्ड के उरई-जालौन में जन्म। बुन्देलखण्ड क्षेत्र एवं बुन्देली भाषा-संस्कृति विकास, कन्या भ्रूण हत्या निवारण, सूचना का अधिकार अधिनियम, बाल अधिकार, पर्यावरण हेतु सतत व्यावहारिक क्रियाशीलता। साहित्यिक एवं मीडिया क्षेत्र में सक्रियता के चलते पत्र-पत्रिकाओं एवं अनेक वेबसाइट के लिए नियमित लेखन। एक दर्जन से अधिक पुस्तकों का प्रकाशन।
सम्प्रति साहित्यिक पत्रिका ‘स्पंदन’ और इंटरनैशनल रिसर्च जर्नल ‘मेनीफेस्टो’ का संपादन; सामाजिक संस्था ‘दीपशिखा’ तथा ‘पीएचड होल्डर्स एसोसिएशन’ का संचालन; निदेशक-सूचना अधिकार का राष्ट्रीय अभियान; महाविद्यालय में अध्यापन कार्य।
सम्पर्क – www.kumarendra.com
ई-मेल – [email protected]
फेसबुक – http://facebook.com/dr.kumarendra, http://facebook.com/rajakumarendra

1 Comment

  1. सरकार की आँखे हिंसा से ही खुलती है.

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

You might also like...

पाकिस्‍तान ने नहीं किया लेकिन भाजपा ने कर दिखाया..

Read More →
Page Reader Press Enter to Read Page Content Out Loud Press Enter to Pause or Restart Reading Page Content Out Loud Press Enter to Stop Reading Page Content Out Loud Screen Reader Support
%d bloggers like this: