/बाल-बाल बचे हजारों लोग आज सुबह दिल्ली मेट्रो में नहीं तो दम घुटने से कुछ भी हो सकता था..

बाल-बाल बचे हजारों लोग आज सुबह दिल्ली मेट्रो में नहीं तो दम घुटने से कुछ भी हो सकता था..

-शिवनाथ झा||

आज पूर्वी दिल्ली के लक्ष्मी नगर मेट्रो स्टेशन पर अफरा-तफ़री उस समय मच गयी जब मेट्रो में सवार होने वाले यात्री, महिला-पुरुष दोनों, महज एक मूक दर्शक बनकर मेट्रो के अन्दर बंद लोगों का नजारा देख रहे थे और डब्बे के अन्दर बंद हजारों यात्रियों, विशेषकर बच्चे और बुजुर्गों का दम घूंट रहा था. स्थिति उस समय और बिगड़ गयी जब डब्बे के अन्दर बंद यात्रियों की जान बचाने के लिए अन्दर के लोगों ने ही जबरदस्ती ट्रेन के डब्बे को खोला.Delhi_metro_rush_295

प्रत्यक्ष दर्शियों के अनुसार जो कि उस मेट्रो में सफ़र कर रहे थे का कहना है कि वैशाली स्टेशन से खुलने के बाद अगले दो स्टेशनों – कौशाम्बी और आनंद विहार – में ही ट्रेन के सभी डब्बे भर गए थे. पूर्वी दिल्ली के प्रीत विहार और निर्माण विहार स्टेशनों पर यात्रियों ने जबरदस्ती ट्रेन के अन्दर प्रवेश किया. यात्रियों का अपार भीड़ ट्रेन के अन्दर दम धुंटने जैसी स्थिति बना दि. जब ट्रेन लक्ष्मी नगर स्टेशन पहुंची तब ट्रेन के डब्बे बंद नहीं  हो रहे थे. तथापि, करीब पांच मिनट तक ट्रेन रुकी रही.

इस बीच ट्रेन के अन्दर वातानुकूलित मशीनों ने भी कार्य करना बंद कर दिया था और ट्रेन के सभी दरवाजे बंद पड़े थे. डब्बे में बंद यात्रियों की स्थिति ख़राब होने लगी और बहुतों का दम घुटने लगा. डब्बे के अन्दर के यात्रियों की आवाज सामान्य तौर पर बहार नहीं आ रही थी परन्तु इशारों या अन्दर की बिगडती स्थितियों को बाहर स्टेशन पर खड़े यात्री या तो समझ नहीं पा रहे थे या फिर आतंरिक स्थिति से अनभिज्ञ थे. आश्चर्य यह है कि दिल्ली में कार्यालयों या मेट्रो से चलने वाले लोगों के लिए कई बार मौक-ड्रील का आयोजन किया गया है ताकि लोग तुरंत स्थिति को समझें और उचित दिशा में पहल करें

 

आलोक कुमार ने कहा की ट्रेन के अन्दर निर्मित माइक जो प्रत्येक डब्बों से ट्रेन के ड्राइवर को सुचना प्रेषित करता है, वह भी तकनीकी खराबी के कारण अवरुद्ध हो गया था. इस बीच यात्रियों ने बल पूर्वक दरवाजे को खोला.

“जिस समय यह घटना हुयी थी उस समय हजारों लोग स्टेशन पर खड़े थे लेकिन सभी मूक दर्शक ही थे. दिल्ली के लोगों का इस तरह स्थितियों से न निपटने की क्षमता और सोच किसी भी हालत में शुभ संकेत नहीं है. यह मुख्यतः ‘अमानवीय सोच है उनका”, एक अन्य प्रत्यक्ष दर्शी संतोष राठोर का राठौर का मानना है. राठौर एक वृद्ध पुरुष के अलावे एक गोद-की बच्ची को डब्बे से बाहर निकालने में सफल हुए थे.

 

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.