/प्रधानमंत्री पद के लिए नरेन्द्र मोदी की घोषणा से पहले…

प्रधानमंत्री पद के लिए नरेन्द्र मोदी की घोषणा से पहले…

-गिरीश नागडा||

इस देश ने हाल के वर्षो में दो सम्भावनाओ को उदय के साथ ग्रहण लगते हुए देखा है पहले उदय के रूप में रामदेव बाबा, जो ड्रामेटिक अंदाज में उदित होकर राष्ट्र के सामने एक भरपूर सम्भावना के साथ आये थे परन्तु अपने ड्रामेटिक अंदाज में ही अतिरेक के शिकार होकर रह गये. दूसरे अन्नाहजारे एक ऐसे तूफानी ज्वार के रूप में देश के सामने आये लगभग पूरे देश के राष्ट्रवादियो में उन्होंने यह विश्वास पैदा कर दिया था कि यह तूफान देश की तमाम बुरे और बुराइयों को जड़ से ही उखाड़ फेकेगा परन्तु वे अपनी ही कच्ची समझ, कच्चे कान और कच्ची जुबान के शिकार हो गये. narendra_modi2अन्ना हजारे नामक इस तूफान ने राष्ट्रभक्तो के मन में ऐसा विश्वास एवं भ्रष्टाचारियो के मन में भय पैदा कर दिया था कि जो राष्ट्रवादी देश की परिस्थिति से पूरी तरह से निराश थे और यह सोचते थे कि सारी बाते बस झूठ है,गलत है और इस देश का कुछ भी नहीं हो सकता इस निराशा के चलते वे अपनी जगह से हिलने के लिए तैयार ही नही थे ऐसे ऐसे निराश और जडभरत भी इस विश्वास के साथ अन्ना के आन्दोलन से प्रभावित होकर सडको पर आ गये थे कि बस अब बाजी पलट ही गई है और शीघ्र ही सब कुछ ठीक होने ही वाला है, दूसरी और वे जो वर्षो से आज तक देश को लूटकर, नोच खसोट कर खा रहे थे जिनका अन्दर तक यह विश्वास था कि उनका कोई कुछ भी बिगाड़ नहीं सकता और वे हर चीज मैनेज कर सकते है पिछले साठ सालो से अच्छे से कर भी रहे थे उनके मन में भी आजादी के बाद पहली बार ऐसा भय पैदा हो गया था कि बस अब खेल खत्म होने का प्रारम्भ हो गया है परन्तु फिर यथा स्थिति कायम हो गई. इस प्रकार से दोनों सम्भावनाओ को ग्रहण लग गया.
अब तीसरी सम्भावना के रूप में नरेन्द्र मोदी का नाम देश के सामने आया है. नरेन्द्र मोदी के लिए दूसरी पिछली दोनों सम्भावनाओ की तुलनाओ में राह बेहद कठिन और धारदार है. अन्ना के सामने तो देश ने सिक्सलेन समतल पक्की राह ही बिछा दी थी परन्तु उन्हें चलना ही नहीं आया और उनका रथ सड़क छोड़कर खाई में उलट गया जबकि आज नरेंद्र मोदी के नाम की इस सम्भावना की राह दुधारी तलवार पर चलने से भी कठीन है इसमें हर कदम पर बाधाये और खतरे खड़े है जहाँ एक भी गलत कदम या शब्द इस सम्भावना को हमेशा के लिए खत्म कर सकता है परन्तु इसके बावजूद अगर यह सम्भावना तलवार की धार पर चलकर भी साकार, सफल हो जाती है तो यह देश के इतिहास में ऐसा चमत्कार होगा जो स्वर्णाक्षरो में लिखा जायेगा.
देश के सामने नरेंद्र मोदी के नाम की इस सम्भावना के सामने कौन कौन सी बाधाये और खतरे खड़े है आइये हम उसपर एक नजर डालते है –
अपनों का इर्ष्या डाह और अहंकार – पैदल गलियों की खाक छानने वाला संघ का एक सामान्य सा प्रचारक जो दूसरो के घरो की रोटियां तोड़ता था आज प्रधानमन्त्री पद का सबसे सशक्त दावेदार बन गया है और यह दावेदारी खुद वे नहीं दुसरे ही लोग कर रहे है जबकि हम संघ, पार्टी की वर्षो से फ्रंटलाइन सेवा कर बुढ़ा ही रहे है, हमारी जगह इसका नाम हम हजम कैसे करे?
यही बड़ी वजह है कि जो मांग संघ और पार्टी के अन्दर से उठनी चाहिए थी वह मांग बाहर से सशक्त रूप में उठकर पार्टी और संघ को को अन्दर से मजबूर कर रही है कि वे इस पर गम्भीरता से विचार करे. हल्की – हल्की सुगबुगाहट जो लम्बे समय से चल रही थी इसे अचानक ही इलाहाबाद कुम्भ के दौरान होने वाली महत्वपूर्ण धर्म संसद के बीच में कुछ संतो द्वारा अनायास उत्साह पूर्वक उठा देने और उसे भारी समर्थन मिलने से पार्टी और संघ पर इस पर विचार करने का बेहद दबाव बन गया है तद अनुसार अब इनके अन्दर बेहद कसमसाहटो के बीच चर्चाओ का अघोषित क्रम चालू भी हो गया है परन्तु अभी वे अधिकृत रूप से नहीं हो रही है. जाहिर है कि जिस दिन से अधिकृत चर्चाओ का दौर चालू होगा तब हो सकता है कि समय की तीव्र मांग और हवा का रुख देखकर कुछ विरोधी इर्ष्या डाही अपने अहंकार का शमन कर आत्म समर्पण भी कर दे परन्तु कुछ जो नही कर पाएंगे वे खुलकर सामने भी आ जायेंगे. इसके कुछ हानि लाभ भी होंगे इससे बच नहीं सकते नरेन्द्र मोदी के लिए यह अपनों का विरोध झेलना नई बात नही होगी परन्तु संघ और पार्टी के लिए बेहद संकट और उलझन का समय होगा.
मुस्लिम ध्रुवीकृत वोटो की लालसा रहित राजनीति – भारतीय राजनीति में कोई भी दल भाजपा सहित मुस्लिम ध्रुवीकृत वोटो की लालसा से मुक्त नहीं है कुछ दल तो पूरी तरह से इस पर ही निर्भर है. संघ, भाजपा में भी कई वरिष्ट लोग इसकी तथा कथित ताकत में विश्वास कर रहे है खुद संघ ने भी इस पर सहमति का संकेत इंदौर के अपने शिविर मे दे दिया है. सवाल यह नहीं है कि मुस्लिम ध्रुवीकृत वोटो की शक्ति में सच्चाई कितनी है और कल्पना कितनी है ?
सवाल नरेन्द मोदी की मान्यता का है जो दृढता के साथ यह मानते है कि यह मात्र मिथ के अलावा और कुछ नहीं है. वे इस लालसा से पूरी तरह से मुक्त है, उन्होंने गुजरात के चुनाव में अपनी मान्यता का ठोस प्रमाण भी दे दिया है,  जहाँ अनेक दबावों के बावजूद उन्होंने एक भी मुस्लिम उम्मीदवार को टिकिट नहीं दिया और अपनी मुस्लिम विरोधी छवि के घनघोर राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय प्रचार के बावजूद मुस्लिम बहुल भरूच विधानसभा सीट पर अपनी जीत दर्ज करवाकर सप्रमाण यह सिद्ध किया है मुस्लिम ध्रुवीकृत वोट केवल एक मिथ मात्र है और अगर यह सच है तो ध्रुवीकृत हिन्दू वोट भी एक ठोस सच्चाई बन सकते है. उम्मीद है कि अगर राष्ट्रीय राजनीति में उन्हें अवसर मिलता है तो वे अपनी इसी मान्यता पर कायम रहेंगे. उनके इस रुख पर पार्टी और संघ को आज ही विचार विमर्श करना बेहद जरूरी है.
नरेन्द्र मोदी का स्वभाव – नरेन्द्र मोदी के स्वभाव में अख्खड और तानाशाही का पुट है, वे कभी किसी के सामने झुकते नहीं है, उनके हाव भाव और भाषा से भी इस बात का परिचय मिलता है। कुछ लोग इसे उनका अहंकार मानते है कुछ अधिक लोग इसे उनकी ताकत भी मानते है. गुजरात के मुख्यमंत्रीत्व काल में और चुनावो में उन्होंने पार्टी और संघ के नेताओ की भी नहीं सुनी न परवाह की और लगभग अकेले अपने दम पर चलकर सफलता का लगातार चढ़ते क्रम में वरण किया.
राष्ट्रीय राजनीति में यह थोड़ा कठीन होगा. उन्हें अपने स्वभाव में कम से कम अपने राष्ट्रवादियो के साथ के व्यवहार और सम्पर्क में चाहे पूरी तरह से न सही पर कुछ नरमी के साथ समन्वय रखना ही होगा क्योकि राष्ट्रीय राजनीति में वे न तो सारे सूत्र स्वयं संभाल सकते है न ही सारे कार्य स्वयं कर सकते है. किसे कौन सी जिम्मेदारी देना है, कौन सा कार्य वे किस तरह से, किस प्राथमिकता के साथ चाहते है और उसके क्या कैसे परिणाम, कितने समय में चाहते है उन्हें अपनी कूटनीति, रणनीति के साथ चाहते है यह चाहे वे तय करे परन्तु कार्य का उचित वितरण तो करना ही होगा. इसमें उनके सामने जो सबसे बड़ी कठिनाई होगी कि अपने से आज तक वरिष्ठ रहे और माने गए एवं स्वयंभू वरिष्ठ साथियों के साथ अपने वर्तमान स्वभाव के साथ व्यवहार में अनेक व्यवहारिक कठिनाईयां आएँगी क्योकि पार्टी /संघ के वरिष्ठो का मान सम्मान और स्वाभिमान कायम रखते हुए उन सभी को संचालित करना, उनसे काम लेना, उन्हें मैनेज करना उनकी सबसे बड़ी चुनोती और उनकी कूटनीतिक कुशलता और सफलता की कठोर परीक्षा होगी. इनमे से कुछ को नजरंदाज करना या दोयम दर्जे पर खतरनाक हो सकता है इसमें भी सही सफलता तभी मानी जाएगी जब उन्हें उनके दायरे में भी रखा जा सकना सम्भव हो और वे अपमान भी महसूस न करे और वे स्वयं भी किसी तरह की मजबूरी और दबाव में भी न आये.
पार्टी और संघ का व्यवहार – पार्टी और संघ दोनों को यह तय करना है कि वे नरेन्द्र मोदी के साथ किस तरह से कितना समन्वय कर सकते है परन्तु कुछ बाते है जो नरेन्द्र मोदी के नाम की घोषणा से पूर्व तय होना बेहद जरूरी है.
1 – नरेन्द्र मोदी का नाम मज़बूरी नही होना चाहिए बल्कि उन पर पूरा विश्वास भी रखा जाना जरूरी है.अगर नरेन्द्र मोदी के नाम से कुछ लोग या दल अलग छिटकने की घोषणा कर देते है तो कतई घबराना नही चहिए क्योकि नरेन्द्र मोदी का नाम मज़बूरी का नाम नही होना चाहिए. जो दल या व्यक्ति अलग छिटक जाते है तो एक बोझ और मजबूरी कम हुई यह ही माना जाना चाहिए उसके साथ ही यह विश्वास भी रखा जाना चाहिए कि नरेन्द्र मोदी के नाम का जादू इस अभाव को आसानी से भर देने में सक्षम है इसमें कोई संदेह नही रखना चाहिए.
2 – पार्टी और संघ को इस बात पर आज ही विचार कर लेना चाहिए कि नरेन्द्र मोदी से अपने रुख और प्राथमिकता को बदलने का वे न्यूनतम आग्रह रखे क्योकि इन्ही के चलते नरेन्द्र मोदी आज नरेन्द्र मोदी है. नरेन्द्र मोदी को नरेन्द्र मोदी बनाकर रखने में अपने व्यक्तिगत अहंकार, पूर्वाग्रहों, और मान्यताओ से ऊपर उठकर सहयोगी, हमराही बनना है, बाधक नहीं. कुछ वरिष्ठ इससे खिन्न और स्वयं को उपेक्षित भी महसूस कर सकते है परन्तु यह बेहद जरूरी है और इसके लिए आज से ही स्पष्ट मन बना लेना बेहद जरूरी है.
3 – अगर यह माने कि नरेन्द्र मोदी प्रधानमन्त्री बन जाते है तो चाहे केबिनेट की बैठक हो,संसदीय समिति की बैठक हो, पार्टी की बैठक हो,या किसी भी फोरम की बैठक हो पार्टी के सभी वरिष्ठो को यह खास ध्यान रखना होगा कि वे किसी भी मुद्दे पर कभी भी अपना निर्णय न दे. वे केवल उचित समय देखकर विनम्रता पूर्वक अपनी राय रख दे और पूछने पर बताये कि किन तथ्यों कारणों से उन्होंने यह राय बनाई है परन्तु कभी भी धर्म के मुद्दे सहित किसी भी विषय पर अपनी लक्षमण रेखा खीचने का प्रयास गलती से भी न करे. कुल मिलाकर सभी को यह समझ लेना चाहिए कि इस सबमे नरेन्द्र मोदी से डरने या दबने का प्रश्न नही है.यहाँ हमारे तुम्हारे व्यक्तिगत अहंकार से ऊपर उठकर सोचने की महती आवश्यकता का प्रश्न है.नरेन्द्र मोदी ने लगभग अकेले अपने दम पर अपने तौर तरीको पर दृढ़ रहकर, चौतरफा हमलो और असहयोग के बीच आज तक विपरीत धारा में तैर कर लगातार अग्नि परीक्षा दी है और उसमे एक तरफा सफलता प्राप्त कर स्वयं को खरा सोना सिद्ध किया है अत:सभी साथियों का भी फर्ज बनता है कि उनपर कभी अनावश्यक दबाव न तो स्वयं बनाये न किसी और को बनाने दे.
कुल मिलकर प्रधानमंत्री के लिए नरेन्द्र मोदी के नाम की घोषणा करना तब ही सार्थक होगा जबकि पार्टी और संघ के सभी साथी एवं वरिष्ठ नेता एक ही नाव की सवारी करने को तैयार और सहमत हो और नरेन्द्र मोदी के नाम के जादू पर विश्वास रखे कि वे चुनावी नाव के साथ देश के विकास की नाव को कुशलता और सफलता पूर्वक पार लगा देंगे. दूसरी बात यह है कि दुविधा या दो नाव की सवारी न तो नरेन्द्र मोदी का स्वभाव है न नरेन्द्र मोदी के नाम के जादू को सूट ही करता है.
अगर पार्टी और संघ के वरिष्ठ इस विश्वास को निर्विवादित रूप से स्वीकार कर और करा नही पाते है तो बेहतर यह होगा कि नरेन्द्र मोदी के नाम की सारी चर्चा पर पूर्ण विराम लगा दे क्योकि उसका कोई अर्थ ही नही होगा.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.