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हिंदुस्तान के संपादक ने छला पत्रकार अरविंद उज्जवल को, बिग-बी को भी दिया झांसा

By   /  August 9, 2011  /  1 Comment

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अपनी फिल्म आरक्षण के प्रमोशन के सिलसिले में बिग बी यानि अमिताभ बच्चन जब बिहार की राजधानी पटना पहुंचे तो उन्हें पत्रकारों के विनोदपूर्ण सवालों से दो चार ही नहीं होना पड़ा, बल्कि कुछ निहायत ही धूर्त मीडिया कर्मियों (पत्रकार लिखने के काबिल नहीं हैं) ने उन्हें झूठ बोल कर इमोशनल कर के अपना उल्लू सीधा भी कर लिया। खास बात यह है कि उन्होंने इस मक्कारी के लिए अपने सहकर्मी  को ठग कर हथियाए गए अमिताभ के पिता से जुड़ी कुछ चीजों का इस्तेमाल किया था।

अरविंद उज्जवल

पटना के एक पत्रकार ने मेल भेज कर बताया है कि जब अमिताभ पटना आए थे तो पटना हिन्दुस्तान के कार्यकारी संपादक अकु श्रीवास्तव, सेल्स हेड नटराजन व स्पेशल प्रोजेक्ट के को-ऑर्डिनेटर व मूर्धन्य पत्रकारों में माने जाने वाले श्रीकांत ने कैसे उन्हें छला। एक तरफ जहां युवा और बच्चों समेत बडे लोग भी उनके दर्शन के लिए बेताब थ। ऐसे में तीनों ने अमिताभ के पटना दौरे को लेकर कुछ विशेष करने की सोंची। एक पीआर वाले से प्रकाश झा से विनती करवाई गई कि वह तीनों को अमिताभ से मिलाएं।

पटना हिंदुस्तान में छपी अमिताभ की तस्वीर

तीनो को यह पता था कि उनके अखबार के विधि संवाददाता अरविंद उज्जवल के पिता उमाशंकर वर्मा हरिवंश राय बच्चन के मित्र थे। बच्चन और वर्मा जी में अक्सर साहित्यिक मसलों पर पत्राचार होता था। जीवन के अंतिम पड़ाव में जब वर्मा जी की नजर कमजोर थी तब उनके बेटे अरविंद उज्जवल के नाम से बच्चन जी का पत्र आया। 16 मई1985 को लिखे इस पत्र में बच्चन जी ने अरविंद उज्जवल को संबोधित करते हुए लिखा था, ”मधुशाला की स्वर्ण जयंती पर एक नीचे लिखी एक नई रुबाई अपने पिता श्री को सुना देना।”

हरिवंश राय बच्चन और उमाशंकर वर्मा के बीच 1948 से पत्राचार का सिलसिला चला जो 1992 में उमाशंकर वर्मा की मौत के बाद खत्म हुआ। इस बीच उमाशंकर वर्मा ने बच्चन जी द्वारा उनके नाम से लिखी 165 चिठ्ठियों का संकलन ‘बच्चन के पत्र उमाशंकर वर्मा के नाम’ एक किताब के रुप में प्रकाशित कराई। इस किताब में उस पत्र को नहीं जोड़ा गया जो हरिवंश राय बच्चन ने मधुशाला की स्वर्ण जयंती पर उमाशंकर वर्मा के पुत्र के नाम भेजा था। फिर भी वर्मा जी के पुत्र और पटना हाइकोर्ट में सरकारी अधिवक्ता अरविंद उज्जवल ने उस पत्र को सहेज कर रखा था।

इधर इन तीनों ने अरविंद उज्जवल को गफलत में रख उनसे उनके पिता की लिखी एक किताब और हरिवंश राय बच्चन द्वारा खुद अरविंद को लिखे गए पत्र की छाया प्रति मांग ली। अरविंद सरल स्वभाव के हैं इसलिए वह इन तीनों महारथियों की मंशा नहीं समझ सके। खैर हिन्दुस्तान के इन तीनों महारथियों को अमिताभ बच्चन से मिलने के लिए 4 अगस्त को सुबह दस बजे का समय मिला। जब तीनों उनसे मिलने पहुंचे तो तीनों को गेट पर ही रोक दिया गया और कहा गया कि अमिताभ से उनकी मुलाकात 11:30 में होगी।

खैर अमिताभ से मिलने की चाहत में हिन्दुस्तान जैसे बड़े अखबार के छोटे संपादक और दोनों महारथी डेढ़ घंटे तक कड़ी धूप में दरवाजे पर टकटकी लगाए रहे। जब उनकी अमिताभ से मिलने की बारी आई तो समय को लपकने के खेल में पूर्व से ही माहिर श्रीकांत ने अमिताभ बच्चन को उमाशंकर जी की किताब और बच्चन जी का लिखा यह देते हुए दिया गया कि आपके पूज्य पिताजी का बिहार से काफी पुराना लगाव वह संबंध है।

अपने पिता को देवता सामान मानने वाले अमिताभ ने जब उस किताब और पत्र को देखा तो भावुक हो उठे। उन्होंने तीनों से उनसे यादगार स्वरुप वह किताब और अपने पास रखने की इजाजत मांगी। बस इसी पल का तीनों को इंतजार था। किताब और पत्र देने के बदले इन तीनों ने हिन्दुस्तान अखबार के 4 अगस्त के अंक को अमिताभ की तरफ बढ़ाते हुए उस पर आटोग्राफ लिया ही उनके साथ तस्वीर भी खिंचवाई।

किताब सहेजते समय जब अमिताभ बच्चन ने जब अरविंद उज्जवल से मिलने की इच्छा जाहिर की तो तीनों ने सफेद झूठ बोल दिया कि वे फिलहाल डायबिटीज से पीड़ित हैं और बीमार चल रहें है। इसपर अमिताभ ने अरविंद के शीघ्र स्वस्थ्य होने की भी कामना की। अरविंद उज्जवल को दूसरे दिन अपने साथ हुए छल और धोखे का पता तब चला जब उन्होंने हिन्दुस्तान में इस बारे में छपी खबर पढ़ी।

दूसरे दिन हिन्दुस्तान ने ‘हिन्दुस्तान’ के मुख्य पृष्ठ पर अमिताभ बच्चन की आटोग्राफ देते हुए तस्वीर प्रमुखता से प्रकाशित कर दो दिवंगत महान आत्माओं के व्यक्तिगत संबंधों का व्यवसायीकरण कर दिया। जब अमिताभ बच्चन को इस फरेब और उनके स्वर्गीय पिता की भावनाओं के व्यवसायीकरण का पता चलेगा तो न जाने उनपर क्या गुजरेगी। बहरहाल इस मामले ने अरविंद उज्जवल और अन्य पत्रकार साथियों को भी काफी चोट पहुंचाई है।

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

1 Comment

  1. Rajiv Ranjan Verma says:

    धन्य हैं हमारे अक्कू जी.. शायद आपके इस दोगले चरित्तर को पहले ही पहचान गए थे नितीश बाबा.. तभी तो आपको कुत्ता बना दिए थे.. उस समय तो आपसे हमदर्दी हुई थी, लेकिन आज लग रहा है की कम ही हुआ था.. आपको पत्रकार तो क्या लोमड़ी भी कहना उसकी बेइज्जती होगी..

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