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इतनी आसान नहीं है राह रिफाइनरी की…

By   /  March 3, 2013  /  2 Comments

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राजस्थान के बाड़मेर जिले से तेल दोहन तो शुरू हो गया मगर इसका फायदा राजस्थान के वासियों को तब तक नहीं मिल सकता जब तक राजस्थान के पास अपनी रिफाइनरी न हो मगर राजस्थान को रिफाइनरी मिलने की बात अब तक हवाई किले ही साबित हुई है. तकनीकी तौर पर तो हालत ये हैं कि आने वाले दस सालों तक तो राजस्थान को रिफाइनरी मिलना एक दूर की कौड़ी है क्योंकि रिफाइनरी की जरूरतें पूरी करने के लिए जितना पानी चाहिए, प्यासा बाड़मेर रिफाइनरी की इस महती आवश्यकता को पूरा करने में सक्षम ही नहीं है.badmer1

दरअसल राजस्थान अपनी पहली रिफाइनरी का सपना अगस्त-2009 से देख रहा है जब प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने मंगला आयल फील्ड का उद्घाटन किया. आज केयर्न इंडिया मंगला व भाग्यम आयल फील्ड से 1,75,000 बैरल प्रति दिन तॆल दोहन कर प्रदेश के बाहर भेज रहा है (मजबूरन). यह भारत के कुल तेल उत्पादन का 20% से अधिक है. केयर्न इंडिया एक नए आयल फील्ड ऐश्वर्या को भी इसी माह शुरू करने जा रहा है. इस नए आयल फील्ड के शुरू होने के बाद केयर्न इंडिया 225,000 बैरल प्रति दिन तेल दोहन करने की तैयारी में है. केयर्न इंडिया प्रदेश से 300,000 से 500,000 बैरल तेल प्रति दिन दोहन चाहता है जो कि वह अगले कुछ वर्षों में हासिल कर लेगा. केयर्न ने पिछले चार वर्षों से बंद पड़े तेल खोजने के कार्य को फिर शुरू फिर शुरू कर दिया है. यह खोज कार्य पिछले हफ्ते ही शुरू हुआ है और केयर्न अपनी महत्वाकांक्षाओं के मुताबिक इसको काफी बड़े स्तर पर कर रहा है.

रिफाइनरी की चर्चा न केवल राजनीतिक गलियारों में ही सिमट कर रह गयी है बल्कि राजनैतिक गोटियाँ सकने का औजार भी बन चुकी है. हमारी सरकार इसके लिए कितनी तैयार है यह तो आप लोग इस मुद्दे की प्रगति से लगा सकते हैं. राजस्थान सरकार ने कभी यह सोचा भी नहीं कि रिफाइनरी के लिए क्या क्या जरूरतें है. अशोक गहलोत सरकार ने हालाँकि इंजिनियर इंडिया लिमिटेड से आग्रह कर एक DFR (Detailed Feasibility Report) तैयार करवाई थी. यह रिपोर्ट साफ़ कहती है कि रिफाइनरी के लिए जितने पानी की आवश्यकता होगी वह प्यासा बाड़मेर जिला पूरी नहीं कर पायेगा. आप सोचते होंगे कि क्या पानी इतनी बड़ी समस्या है? जी हाँ ! बाड़मेर के भूगर्भ में इतना पानी है ही नहीं कि वो किसी रिफाइनरी की प्यास बुझा सके. इसके लिए सरकार को पहले रिफाइनरी स्थल तक पानी का इंतज़ाम करना होगा. मगर सरकार ने आज तक इस मुद्दे पर सोचा ही नहीं और ना ही बजट में इसके लिए कोई प्रावधान किये जाने की उम्मीद है. जबकि यह इंतज़ाम इंदिरा गाँधी नहर की एक शाखा रिफाइनरी स्थल तक ला कर बड़ी आसानी से किया जा सकता है या फिर किसी बड़े जल स्रोत से एक बड़ी पाइपलाइन रिफाइनरी स्थल तक डाली जाए.

विशेषज्ञों के अनुसार ये सपना अभी सपना ही रहेगा और इसको साकार होने में कम से कम एक आम चुनाव का वक्त तो लगेगा ही! मीडिया दरबार को अत्यंत खुशी होगी यदि रिफाइनरी इसी दशक में उत्पादन शुरू कर दे.

 

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

2 Comments

  1. गहलोत साहब को अपनी चुनाव मुहीम चलाने तथा वोट बैंक के लिए तो एक हथियार मिल ही गया है.जनता को इस सच्चाई का ज्ञान थोड़े न है.

  2. mahendra gupta says:

    गहलोत साहब को अपनी चुनाव मुहीम चलाने तथा वोट बैंक के लिए तो एक हथियार मिल ही गया है.जनता को इस सच्चाई का ज्ञान थोड़े न है.

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