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भैरोंसिंह शेखावत को ठेंगा, उनकी पत्नी को सलाम

By   /  March 4, 2013  /  5 Comments

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कहते हैं राजनीति में सब कुछ जायज है। साम, दाम, दंड, भेद सब कुछ। वाकई सही है। स्वार्थ की खातिर आदमी उन्हीं कंधों को ठोकर मार देता है, जिनके सहारे वह ऊपर चढ़ा है और हर उस को भी अपना माई-बाप बना लेता है, जिससे स्वार्थ पूरा हो रहा हो। कुछ ऐसा ही वाकया पेश किया प्रदेश भाजपा अध्यक्ष श्रीमती वसुंधरा राजे ने। उन्होंने उन्हीं स्वर्गीय भैरोंसिंह शेखावत जी की धर्मपत्नी श्रीमती सूरज कंवर के घर जा कर उनका आशीर्वाद लिया, जिनको जीते-जी राजनीति की बर्फ में लगाने का काम उन्होंने किया था।Bhairon Singh Shekhawat
कहने की जरूरत नहीं है ये वही वसुंधरा हैं, जिनकी वजह से राजस्थान के सिंह कहलाने वाले स्वर्गीय शेखावत जी अपने प्रदेश में ही बेगाने से हो गए थे। दरअसल स्वर्गीय श्री शेखावत के उपराष्ट्रपति पद का कार्यकाल समाप्त करने के बाद राजस्थान लौटते ही दोनों के बीच छत्तीस का आंकड़ा हो गया था। असल वे तब नहीं चाहतीं थीं कि शेखावत फिर से राजस्थान में पकड़ बनाएं। यूं तो शेखावत के पुत्र नहीं था, इस कारण खतरा नहीं था कि उनका कोई उत्तराधिकारी प्रतिस्पर्द्धा में आ जाएगा, मगर उनके जवांई नरपत सिंह राजवी उभर रहे थे। वसुंधरा इस खतरे को भांप गई थीं। इसी कारण शेखावत राजवी को भी उन्होंने पीछे धकेलने की उन्होंने भरसक कोशिश की। इस प्रसंग में यह बताना अत्यंत प्रासंगिक है कि शेखावत ने वसुंधरा राजे के कार्यकाल में ही भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम की शुरुआत की थी। यही वसुंधरा को नागवार गुजरी। सब जानते हैं कि शेखावत की इसी मुहिम का उदाहरण दे कर कांग्रेस ने वसुंधरा के कार्यकाल पर सवाल उठाने शुरू कर दिए थे।
vasundhara-raje-03वसुंधरा अपने कार्यकाल में इतनी आक्रामक थीं कि भाजपाई शेखावत की परछाई से भी परहेज करने लगे थे। कई दिन तक तो वे सार्वजनिक जीवन में दिखाई ही नहीं दिए। इसी संदर्भ में अजमेर की बात करें तो लोग भलीभांति जानते हैं कि जब वे दिल्ली से लौट कर दो बार अजमेर आए तो उनकी अगुवानी करने को चंद दिलेर भाजपा नेता ही साहस जुटा पाए थे। शेखावत जी की भतीजी संतोष कंवर शेखावत, युवा भाजपा नेता भंवर सिंह पलाड़ा और पूर्व मनोनीत पार्षद सत्यनारायण गर्ग सहित चंद नेता ही उनका स्वागत करने पहुंचे। अधिसंख्य भाजपा नेता और दोनों तत्कालीन विधायक प्रो. वासुदेव देवनानी व श्रीमती अनिता भदेल ने उनसे दूरी ही बनाए रखी। वजह थी मात्र ये कि अगर वे शेखावत से मिलने गए तो मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया नाराज हो जाएंगी। पूरे प्रदेश के भाजपाइयों में खौफ था कि वर्षों तक पार्टी की सेवा करने वाले वरिष्ठ नेताओं को खंडहर करार दे कर हाशिये पर धकेल देने वाली वसु मैडम अगर खफा हो गईं तो वे कहीं के नहीं रहेंगे।
वस्तुत: श्रीमती राजे ने एक बार मुख्यमंत्री बनने के बाद तय कर लिया था कि अब राजस्थान को अपने कब्जे में ही रखेंगी। शेखावत ही क्यों, उनके समकक्ष या यूं कहना चाहिए कि उनके वरिष्ठ अनेक नेताओं को उन्होंने खंडहर बता कर हाशिये पर खड़ा कर दिया। मगर अब जब वसुंधरा पर आगामी चुनाव जीतने की चुनौती है तो उन्हीं खंडहरों के यहां धोक दे रही हैं। इसी सिलसिले में वे हरिशंकर भाभड़ा व ललित किशोर चतुर्वेदी सरीखे दिग्गजों के घर जा कर उनका दिल जीतने की कोशिश कर रही हैं।
-तेजवानी गिरधर

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About the author

अजमेर निवासी लेखक तेजवानी गिरधर दैनिक भास्कर में सिटी चीफ सहित अनेक दैनिक समाचार पत्रों में संपादकीय प्रभारी व संपादक रहे हैं। राजस्थान श्रमजीवी पत्रकार संघ के प्रदेश सचिव व जर्नलिस्ट एसोसिएशन ऑफ राजस्थान के अजमेर जिला अध्यक्ष रह चुके हैं। अजमेर के इतिहास पर उनका एक ग्रंथ प्रकाशित हो चुका है। वर्तमान में अपना स्थानीय न्यूज वेब पोर्टल संचालित करने के अतिरिक्त नियमित ब्लॉग लेखन भी कर रहे हैं।

5 Comments

  1. यदि अपनी हठधर्मी पर नहीं रहती तो आज विपक्ष में नहीं मुख्यमंत्री की कुर्सी पर होती !!

  2. यानि ये राजनीति की रवायत है

  3. ASHOK SHARMA says:

    चलो अच्छा ही हुआ आंबेडकर के नाम से रोजी रोटी कमाने बालों ने सविता अम्बेड कर को जिन्दा रहते हुए कभी नाम तक नहीं लिया जबकि डॉ.आंबेडकर की प्रतिमा पर फूलमाला चडाते ते थे

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