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सुब्रत राय: पानी में फंसा मगरमच्छ..

By   /  March 17, 2013  /  3 Comments

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सहारा की सैट से नहीं हो पायी सैटिंग, सुनवाई 23 तक टली

: एक इंच जमीन नहीं, पर कालोनियों का झूठ : खुद पर बवालेजान रहीं सुब्रत राय की झूठी बयानबाजी :

-कुमार सौवीर||

सिक्योरिटीज अपैलेट ट्राइब्यूनल (एसएटी) ने सहारा को अंतरिम राहत देने से इनकार किया है। साथ ही, एसएटी ने सेबी और सहारा मामले की सुनवाई 23 मार्च तक टाल दी है। सहारा ने सुब्रत रॉय सहारा की निजी संपत्ति और बैंक खातों को जब्त करने के सेबी के फैसले को एसएटी में चुनौती दी है। सहारा द्वारा पैसे न चुकाए जाने पर सेबी ने सहारा ग्रुप के बड़े अधिकारियों के साथ ग्रुप कंपनियों के बैंक खाते सील किए है। subrato royसुप्रीम कोर्ट ने सहारा की दो कंपनियों सहारा इंडिया रियल एस्टेट कॉरपोरेशन और सहारा हाउसिंग इंवेस्टमेंट कॉरपोरेशन को निवेशकों से जुटाए गए 24000 करोड़ रुपये लौटाने को कहा है।

हाजी मस्तान और चार्ल्स शोभराज ही नहीं, नटवरलाल भी कई मौकों पर ऐलानिया बोलता रहा था कि अगर सरकार उसे छोड़ दे, तो वह सरकार पर लदे सारे कर्ज को हमेशा-हमेशा के लिए केवल चुटकियों में खत्म कर सकता है। लेकिन सरकार ने इन लोगों को यह इजाजत कभी नहीं दी। कुछ कमोबेश ऐसा ही प्रस्ताव एक और शख्स ने ऐलान किया कि पैसा मेरे लिए कभी भी समस्या नहीं रहा है। मैं जब जितना भी चाहूं, चुटकियों में बांट सकता हूं। यह शख्स है आज दुनिया में आर्थिक-जगत का सबसे बड़ा जादूगर साबित हो चुका सुब्रत राय। अब तक इस शख्स ने अपने हाथ की सफाई में तो महारत खूब हासिल की है, लेकिन बात तो अब सर्वोच्च न्यायालय के फैसले और उस पर उसके कड़े तेवरों पर है ना, तो सुब्रत राय की सारी कीमियागिरी धूल चाटती दिख रही है। सर्वोच्च न्यायाधीश कबीर अल्तमस की अध्यक्षता में देश की सबसे बड़ी बैंच ने भरी कोर्ट में सहारा इंडिया के मामले में पुनर्विचार से इनकार कर दिया है और साफ तौर पर कह दिया है कि पहले निवेशकों को रकम लौटाओ, वरना अदालत की ओर रूख मत करना। कहने की जरूरत नहीं कि इस फैसले के बाद सहारा में पांच बरसों से लॉक करीब पौने 26 हजार करोड़ रूपयों की अदायगी मजबूरन फर्ज बन गयी अपनी सहारा-किश्ती को इस जबर्दस्त बवंडर से निकालने के लिए सुब्रत राय हर चंद कोशिशों में जुट गये हैं। लेकिन इस बार अपने त्राण के लिए वे नये हवाई किले बनाने में नहीं जुटे हैं, बल्कि दिमागी कसरत में महारत हासिल रखे वकीलों की शरणागत हैं। कदम फूंक-फूंक कर कदम रखना अब सुब्रत राय के लिए मजबूरी है, क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय के पिछले रवैये से उनके हाथ-पांव पहले ही ठंडे हो चुके थे। लेकिन हकीकत यह है कि इस अदायगी के लिए आठ महीनों से लटका रहे सहारा इंडिया के पास यह रकम है ही नहीं।

बिहार का अररिया जिला देश का इकलौता इलाका है जहां से पूर्वोत्तर प्रदेशों तक पहुंचने के लिए एक संकरा रास्ता बना है। बांग्लादेश और चीन-भूटान के बीच करीब 28 किलोमीटर चौड़ा यह गलियारा आम बोलचाल ही नहीं, बल्कि ब्यूरोक्रेटिक शब्दावली पर हेन-नेक यानी मुर्गे की गर्दन के तौर पर पुकारा जाता है जिसे दुश्मन जब चाहे, उसकी गर्दन तोड़ सकता है। 10 जून-1948 को इसी इलाके अररिया जिले में पैदा हुए सुब्रत राय अब देश के लाखों निवेशकों की गर्दन तोड़ने पर आमादा हैं। बचपन से ही यह परिवार गोरखपुर के बंगाली समुदाय में खप गया। यूपी सरकार के एक अदने से कर्मचारी के पुत्र सुब्रत राय ने अपने दोस्तों के साथ गोरखपुर से सन-1978 को सहारा नाम की चिट-फंड फर्म बनायी और जल्दी ही अपने भाई जयब्रत राय समेत ज्यादातर रिश्तेदारों को खपाकर कम्पनी बनायी। गोरखपुर के लोग याद करते हैं कि पहले यह बेरोजगार लोग सिनेमा के टिकट ब्लैक करने जैसे कई काम करते थे। लेकिन यह पहले की बात है। बहरहाल, इस सहारा चिट-फंड कम्पनी काम था जनता से पैसा उगाहना। जमीनी हकीकत से कोसों दूर, हवाई अट्टालिकाओं की मरीचकाओं जैसा सपना दिखाना। तरीका सीखा था पियरलेस कम्पनी से, जो नान-बैंकिंग की एकलौती और निर्विवाद कम्पनी थी। इन लोगों ने आसमानी सपने बेचने का सारा खाका बुन डाला। बुनियाद रही केवल झूठे और धोखे की जमीन पर उगे सुनहले वायदे। लेकिन सपनों की दूकान चल ही गयी। ( जारी )

(सौजन्य: मेरीबिटिया.कॉम)

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

3 Comments

  1. naam bade or darshan khote…..

  2. ASHOK SHARMA says:

    इनको जमीं कौड़ियों के भाव और गरीबों को करोड़ों के भाव देश मई आज ये सबकुछ करना चाहते है

  3. Ashok Sharma says:

    inko dayre mai rakhna jaruri.

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