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सुब्रत राय: पानी में फंसा मगरमच्छ..( तीन)

By   /  March 17, 2013  /  No Comments

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एक इंच जमीन नहीं, पर कालोनियों का झूठ

अपनी पत्‍नी के नाम पर भी स्‍वप्‍ना सिटी जैसे हवाई किले बना दिये, खुद पर बवालेजान रहीं सुब्रत राय की झूठी बयानबाजी…

-कुमार सौवीर||

मास्टर ब्लास्टर सचिन जलती चिता में आग दें, युवराज सिंह कब्र खोदें और वीरेंद्र सहवाग को अस्पताल में ड्रिप चढ़ायें तो मामला गंभीर नहीं, बल्कि सहारा इंडिया के ताजा विज्ञापन का तरीका है। दरअसल, इसमें सहारा यह कहना चाहता है कि कम्पनी अब फुटकर बिक्री के रास्ते पर हैं और इसका नया ब्रांड नाम है ‘क्यू-शॉप’। विज्ञापन में सचिन, युवराज और सहवाग के अलावा विराट कोहली, महेंद्र सिंह धोनी समेत कई अन्य खिलाडि़यों को मौत से डराते दिखाते हुए कम्‍पनी ने दावा किया है कि यदि क्यू शॉप से सामान न लेने वाले पर आपको मिलावटी सामान मिलेगा जो आपकी मौत भी बन सकता है। sahara_subratइस विज्ञापन का प्रोमो फिलहाल क्लाइंट्स को दिखाया गया है। फिर इसे टीवी पर भी प्रसारित किया गया। लेकिन टीवी पर आते ही हंगामा हो गया। लोगों को गुस्सा है कि सचिन, युवराज को अंतिम संस्कार और कब्र खोदने का काम क्यों दिया गया। शिकायत थी कि कब्र खोदने के पहले कम्पनी को निवेशकों को उनकी रकम वापस दिलवानी चाहिए, उसके बाद कम्पनी के मालिकान हों या फिर सचिन, युवराज और सहवाग के अलावा विराट कोहली, महेंद्र सिंह धोनी भले ही अपनी कब्र खोदें।

swaapna city - copy

कुछ भी हो, विज्ञापन की ट्रिक इस्तेमाल करके सुब्रत राय ने अपना साम्राज्य खड़ा किया, लेकिन अब यही तरीका अब कम्पनी पर बहुत भारी पड़ रहा है। सवाल विज्ञापन का नहीं, बल्कि ऐसे विज्ञापनों में किये जा रहे दावों पर। ज्यादातर मामलों में सहारा के सारे विज्ञापन केवल झूठ के पुलिंदा ही साबित रहे हैं। सबसे बड़ा मामला तो है आईपीओ और ‘क्यू-शॉप’ का। एक भी ‘क्यू-शॉप’ नहीं है, लेकिन कम्पनी ने सेबी से बचने के लिए उसके एकाउंट में निवेशकों की विवादित रकम ट्रांसफर करने की कोशिश की। जबकि 15 अगस्त-12 तक देश के 60 शहरों में यह दूकानें खुल जानी थीं। रकम लगती 3000 करोड़। यही हालत आईपीओ की है, जिसमें झूठ भरा पड़़ा है। सन-07 में सहारा ने दावा किया कि देश के 271 शहरों पर सहारा अपनी आवासीय व निर्माण परियोजना शुरू कर चुका है। जबकि गोरखपुर, लखनऊ और लोनावाला जैसे दो-चार शहरों के छोड़कर सहारा के पास जमीन होना तो दूर, शहरो की लिस्ट तक नहीं मौजूद है। इतना ही नहीं, देश में इतने शहर भी नहीं हैं, जहां आवासीय कार्यक्रम व्यावसायिक तौर पर किये जा सकें। अगली लिस्ट में नाम है नया स्टेडियम जो सुब्रत राय के नाम पर बनाने की बात चली, लेकिन इसपर क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने ऐतराज कर दिया। पुणे वारियर्स की तो ऐसी की तैसी हो ही चुकी है जिसमें अमिताभ बच्च्न, बिपाशा बसु, प्रियंका चोपड़ा और दिया मिर्जा के साथ समीरा रेड्डी ने रेवड़ी बांटीं।

सहारा इंडिया की करतूतों पर तो विकीपीडिया तक ने नजर रखी है। विकीपीडिया ने सहारा इंडिया के शीर्ष मुनीम-नुमा मालिक सुब्रत राय के बारे में खासी मेहनत के बाद खुले तौर पर खुलासा किया है कि सुब्रत राय जब भी अपने नाम से कोई विज्ञापन देते हैं, बड़ा जोरदार देते हैं। एकदम पठनीय और चर्चा के लायक। (याद कीजिये कोमनवेल्थ गेम्स के पहले भ्रष्टाचार को लेकर सुब्रत रॉय का विज्ञापन, जिसमें देश की इज्ज़त का हवाला देकर जांच टालने की बात थी.) पहली नज़र में वह एक ईमानदार कोशिश लगती है लेकिन बाद में वह आम तौर पर विवादों में आ जाता है क्योंकि उसमें उनका दंभ और आडम्बर तो सामने आता ही है, उनकी चालाकियां भी साफ़ नज़र आ जाती हैं।

सहारा की रियल इस्‍टेट और हाउसिंग कम्‍पनियों के सैकड़ों शहरों पर मकान बनाने का ऐलान किया है। अकेले सहारा स्‍वप्‍ना सिटी के नाम पर सहारा ने 367 शहरों में 1228 परियोजनाओं को बनाने का दावा किया है, जिसमें बीस लाख से ज्‍यादा मकान बनाये जाएंगे। सुब्रत राय की पत्‍नी के नाम बनने वाले इन मकानों की कीमत पांच से 17 लाख रूपयों के बीच रखने का दावा किया है सहारा ने। जबकि 10 साल पहले अपने सबसे छोटे मकान की कीमत सहारा ने साढे 17 लाख रूपये तय की थी। यह मकान भी आकार में स्‍वप्‍ना सिटी के मकानों के ही तरह है।

इतना ही नहीं, कोचि समेत विशालतम और सुदंरतम व भव्‍य कालोनियों का खाका पिछले 20 बरसों से केवल कागज पर बना है, और उसी प्रस्‍ताव को ही प्रचार करते हुए निवेशकों से सहारा जोरदार उगाही करता रहा है

( जारी )

(सौजन्य: मेरीबिटिया.कॉम)

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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