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सुब्रत राय: पानी में फंसा मगरमच्छ (चार)

By   /  March 17, 2013  /  No Comments

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-कुमार सौवीर||

सहारा के दावों पर लोगों को हैरत है और कम्पनी के दावे दिलचस्प, जो नामुमकिन भी है। मसलन 11 जुलाई, 2008 को सहारा इंडिया की ओर से प्रकाशित विवरण पत्र में दिखाया गया था कि एसआइएफसीएल ने 1987 में अपनी शुरुआत के बाद से जमा राशियों के रूप में 59,076.26 करोड़ रूपये (ब्याज समेत) जुटाए और जमाकर्ताओं को 30 जून, 2008 तक 41,563.06 करोड़ रूपये (ब्याज समेत) वापस किए। sahara-subrot-royसेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनामी की ओर से संकलित आंकड़ों के मुताबिक मार्च, 2009 तक जमाकर्ताओं के प्रति देनदारी (जिसमें ब्याज भी शामिल था) 17,640 करोड़ रूपये थी। मार्च, 2010 के अंत तक इसकी कुल देनदारी 13,235 करोड़ रु. थी। मार्च, 2010 के बाद का आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। लेकिन रिजर्व बैंक के करीबी सूत्रों का कहना है कि देनदारी घटकर 9,000 करोड़ रूपये से 11,500 करोड़ के बीच रह गई है। लेकिन सुब्रत राय दावा करते रहे कि कम्पनी की भुगतान व्यवस्था दुरूस्त है। कम्पनी की कुल 3,800 शाखाएं हैं और सहारा के लिए निवेशकों को देने के लिए नगदी भले ही बड़ी चिंता न हो, लेकिन नवंबर-10 में सेबी के अंतरिम आदेश के तहत पूंजी जुटाने की उनकी योजनाओं का गला घोंटने का सरकार की कोशिशें जगजाहिर

हैं। उनका दावा है कि इस आदेश से प्रभावित होने वाली उनकी दो कंपनियों में से एक, एसएचआइसीएल में उनकी मौजूदा पूंजी, नगदी और बैंक में जमा राशि करीब 725 करोड़ रु. है, जबकि एससीएससीएल में उनकी पूंजी, नगदी और बैंक में जमा राशि 4,266 करोड़ रूपया है। सहारा समूह ने पिछले 10 वर्षों में आयकर और सेवाकर के रूप में कुल 2,757 करोड़ रूपये चुकाए हैं। इस तरह यह टैक्स चुकाने के हिसाब से एक समर्पित समूह बन गया है।

सहारा के समर्थकों की लाबी का दावा है कि सुब्रत राय अपने दिखावे और मित्रता के रिश्तों की कीमत चुका रहे हैं। लेकिन इसके पीछे भी शायद कोई न कोई कारण ही होगा, क्योंकि केंद्र सरकार की एजेंसियां पैसा उगाहने की रॉय की क्षमता के पीछे पड़ गई हैं। फिर सहारा को निशाना क्यों बनाया गया, यह भी देख लीजिए। जानकार बताते हैं कि क्योंकि लगा कि सहारा कथित तौर पर कालाधन को सफेद बदलने में जुटी है। दिल्ली के एक बड़े निवेश-प्रबंधक ने नाम न छापने की शर्त पर सवाल पूछा है,”यह कैसे हो सकता है कि सुब्रत रॉय आपकी रजामंदी के बिना इतने वर्षों तक एक समांतर पैराबैंकिंग कंपनी चलाते रहे और अचानक सब कुछ बदल गया। किसी को निशाना बनाने की बात पर अटकलें मत कीजिए, क्योंकि मैं सहारा की हकीकत खूब जानता हूं।

सहारा के सितारे तो खूब चमक रहे थे, लेकिन अचानक गर्दिश में गये। यह बात है मई-04 की, जब यूपीए सत्ता में आया और यूपी में सुब्रत राय और सहारा इंडिया की हरकतों पर निगहबानी होने लगी। मकसद था सुब्रत राय के बालू के महल यानी पैराबैंकिंग को धक्का मारा जाए। एक बड़े बैंकर ने बताया है कि सहारा की फाइनेंशियल कम्पनी के विज्ञापनों पर रिजर्व बैंक और सेबी वगैरह ने नजर रखनी शुरू कर दी जिसमें मनमानी रकम को सहारा के खाते बताते हुए निवेशकों को धोखा देने जैसी कथित गतिविधियों का ब्योरा था।( जारी )

(सौजन्य: मेरीबिटिया.कॉम)

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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