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बैंकिंग लाइसेंस की जुगाड़ में 100 से अधिक कारपोरेट घराने…

By   /  April 16, 2013  /  1 Comment

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सरकार पहले ही अपने राजनीति समीकरण साधने के लिए बैंकों पर आधारकार्ड योजना थोपने का फैसला कर चुकी है। गैरकानूनी आधारकार्ड कारपोरेट योजना भारतीय बैंकिंग का कबाड़ा कर दे, इससे पहले अब कारपोरेट घराने सीधे बैंकिंग में उतरकर सरकारी बैंकों को बाजार से बाहर कर देने की तैयारी में हैं और उनके साथ मजबूती से खड़े हैं प्रणव की ही तरह चिदंबरम भी।

-एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास||
भारत में कारपोरेट मसीहा धर्माधिकारी प्रणव मखर्जी का नाम हर घोटाले में आगे है और उनका कोई बात बांका कर नहीं सकता। उनके उत्तराधिकारी पी चिदंबरम दुनियाभर में घूम घूमकर भारत बेचने में लगे हैं।सरकारी क्षेत्र के स्टेट बैंक आफ इंडिया समेत तमाम बैंकों का भारतीय जीवन बीमा निगम की तरह बारह बजाकर औद्योगिक और कारपोरेट घरानों को बेंकिंग लाइसेंस देने का प्रस्ताव तो प्रणव मुखर्जी का ही था, उसे अमली जामा पहनाने में चिदंबरम की अति सक्रियता की खबर कोई छुपी नहीं है। इस सिलसिले में ब्याज दर घटाने के निरंतर दबाव के मध्य रिजर्व बैंक को धमकाने की खबरें आती जाती रही हैं। पर जनप्रतिनिधियों का आलम यह है कि कारपोरेट राजनीति में वे कारपोरेट के ही गुलाम हैं और कुछ भी बेसुरा गा नहीं सकते। जो राजनीति नहीं करते और जिनकी हालत एअर इंडिया होने वाली है, वे घोड़े बेचकर सो रहे हैं। तूफान आकर चला जायेगा और उन्हें आंच तक नहीं आयेगी, इस गलतफहमा में अति सुरक्षित सरकारी क्षेत्र के कर्मचारियों के सामने अब तो जब तब सपरिवार आत्महत्या करने की नौबत आ ही गयी है।अब भी वे किस इंतजार में हैं? स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की अगुवाई में कुछ बैंकों ने यूनीक आइडेंटिफिकेशन अथॉरिटी ऑफ इंडिया (यूआईडीएआई ) प्लैटफॉर्म के पक्ष में मौजूदा सिस्टम को खत्म करने पर ऐतराज जताया है पर सरकार पहले ही अपने राजनीति समीकरण साधने के लिए बैंकों पर आधारकार्ड योजना थोपने का फैसला कर चुकी है। गैरकानूनी आधारकार्ड कारपोरेट योजना भारतीय बैंकिंग का कबाड़ा कर दे, इससे पहले अब कारपोरेट घराने सीधे बैंकिंग में उतरकर सरकारी बैंकों को बाजार से बाहर कर देने की तैयारी में हैं और उनके साथ मजबूती से खड़े हैं प्रणव की ही तरह चिदंबरम भी।

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यूआईडीएआई ही आधार नंबर जारी करती है। सरकार लोगों के बैंक अकाउंट्स में वेलफेयर स्कीम्स का पैसा पहुंचाने के लिए आधार नंबर को ही पहचान पत्र बनाना चाहती है। इस विरोध से कैश ट्रांसफर सिस्टम लागू करने की सरकारी योजना खटाई में पड़ सकती है, जिसे 2014 के आम चुनाव के लिए यूपीए के हथियार के तौर पर देखा जा रहा है।यूआईडीएआई प्लैटफॉर्म को पहचान पत्र बनाने के पीछे बैंकों ने दो बड़ी वजहें गिनाई हैं। पहली, बैंक चाहते हैं कि यूआईडीएआई झूठे पहचान से जुड़े सभी लायबिलिटी अपने पर ले। इसका मतलब यह है कि अगर किसी की शिकायत आई कि किसी और ने सही शख्स के बदले बैंक अकाउंट से पैसे निकाल लिए, तो जिम्मेदारी यूआईडीएआई की होगी। एसबीआई में ग्रामीण बिजनेस (आईटी-पीऐंडएसी) के डेप्युटी जनरल मैनेजर एलपी राय ने बताया, ‘जब तक यह मसला सुलझ नहीं जाता, तब तक हम इस सिस्टम का इस्तेमाल नहीं कर सकते।’

नए बैंक लाइसेंस देने के लिए नियमों की व्याख्या करने के संबंध में रिजर्व बैंक के पास अनुरोध का ढेर लग गया है जिनमें नए बैंकिंग लाइसेंस संबंधी हाल में जारी दिशा-निर्देशों के विभिन्न उपबंधों की ‘अस्पष्टता’ दूर किए जाने की मांग है। कुल 100 से अधिक कारपोरेट घरानों ने बैंकिंग लाइसेंस हासिल करने में शुरुआती रुचि दिखाई है। नए बैंकिंग लाइसेंस जारी करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) के दिशानिर्देशों पर स्पष्टीकरण के लिए भी बड़ी संख्या में अपीलें मिली हैं। देश के ज्यादातर बड़े समूहों अनिल अंबानी के नेतृत्व वाले एडीए समूह, एलएंडटी, महिंद्रा, बिड़ला, रेलिगेयर और वीडियोकॉन ने सार्वजनिक रूप से लाइसेंस हासिल करने में रुचि जताई है। श्रीराम समूह, इंडियाबुल्स, इंडिया इंफोलाइन, आइएफसीआइ और पीएफसी सहित कई गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियां (एनबीएफसी) भी इसमें रुचि जता चुकी हैं।कई कंपनियों ने लाइसेंस हासिल करने की तैयारी के लिए देश विदेश के पूर्व बैंक प्रमुखों और अन्य सीनियर बैंकरों को सलाहकार नियुक्त किया है। खास बात यह है कि बड़ी संख्या में रीयल एस्टेट कंपनियों ने लाइसेंस के लिए आवेदन करने में रुचि दिखाई है, जबकि उनकी वित्तीय स्थिति पूरी तरह से आरबीआइ के दिशानिर्देशों के अनुरूप नहीं है।
कॉरपोरेट्स को बैंक लाइसेंस देने पर भी कुछ ऐतराज सामने आए हैं। पूर्व फाइनेंस मिनिस्टर और संसद की स्थायी समिति के चेयरमैन यशवंत सिन्हा भी इसके खिलाफ हैं। उन्होंने कहा था, ‘कॉरपोरेट को बैंक लाइसेंस देना बहुत खराब आइडिया है। दशकों पहले इसे खत्म किया गया था और वह फैसला सही था। इस नॉर्म्स में किसी तरह की ढील देने से न सिर्फ हितों का टकराव बढ़ेगा बल्कि फाइनेंशियल सिस्टम के लिए गैर-जरूरी खतरे भी बढ़ेंगे।’ आरबीआई के एप्लिकेंट्स के बारे में इनकम टैक्स डिपार्टमेंट, सीबीआई और एनफोर्समेंट डायरेक्टोरेट से इनक्वायरी कराने का भी समिति के कुछ मेंबर्स ने विरोध किया है।
आरबीआई पहले कह चुका है कि वह बैंकिंग लाइसेंस लेने की ख्वाहिश रखने वालों के फाइनल नॉर्म्स से जुड़े सवालों पर जल्द तस्वीर साफ करेगा। उसने कहा था, ‘जिन क्लेरिफिकेशन की मांग की गई है, वे बड़े वर्ग के हित में हैं। इनसे सभी बैंक लाइसेंस एप्लिकेंट्स को फायदा होगा। इसलिए रिजर्व बैंक ने क्लेरिफिकेशन को अपनी वेबसाइट पर डालने का फैसला किया है। सवाल पूछने वालों की पहचान जाहिर नहीं की जाएगी।’
दूसरी ओर,शेल नॉन-बैंकिंग फाइनेंस कंपनियों (एनबीएफसी) के टेकओवर की राह में एक बड़ी बाधा खड़ी होने वाली है। ऐसी कंपनियों के अधिग्रहण की मंजूरी और इसका लाइसेंस नए खरीदार को ट्रांसफर करने का अधिकार आरबीआई खुद अपने हाथों में लेने की तैयारी में है। अधिग्रहण करने वाली कंपनियों पर लाइसेंस के गलत इस्तेमाल के आरोप के बाद आरबीआई ने यह योजना तैयार की है।रेगुलेटर के प्रस्ताव की जानकारी रखने वाले एक शख्स ने बताया कि टेकओवर करने वाली ऐसी कंपनियों को ऑपरेशन शुरू करने में एक साल तक का वक्त लग सकता है। फिलहाल, आरबीआई को बताने के बाद यह काम 1 महीने में हो जाता है।फाइनेंस कंपनियों के टेकओवर के लिए सख्त ड्यू डिलिजेंस का प्रस्ताव नए बैंकिंग लाइसेंस जारी करने की आरबीआई की योजना के मद्देनजर आया है, जहां मैनेजमेंट में बदलाव के बाद कई फाइनेंस कंपनियां बैंकिंग लाइसेंस के लिए अप्लाई कर सकती है। इस मामले से जुड़े शख्स ने बताया कि हालांकि, आरबीआई के पास बैंकिंग लाइसेंस जारी करने का सुरक्षित अधिकार है, लेकिन वह छोटे-मोटे मसलों को नजरअंदाज करना चाहता है।
टाटा और बिड़ला समेत तमाम दिग्गज देसी कारोबारी समूह फिलहाल इस मसले पर विचार कर रहे हैं कि बैंकिंग लाइसेंस के लिए आवेदन करते समय प्रवर्तक समूह के ब्रांड का इस्तेमाल किया जाए या नहीं। कारोबारी वकीलों के मुताबिक उद्योग समूहों ने इस मामले में बैंकिंग नियामक की राय भी मांगी है।
बिड़ला समूह के एक शीर्ष अधिकारी ने बताया कि समूह के वकीलों ने भारतीय रिजर्व बैंक के दिशानिर्देशों को जिस तरह से समझाया है, उसके बाद समूह अपने मुख्य ब्रांड का इस्तेमाल इस काम में नहीं करने पर विचार कर रहा है। इसीलिए समूहों ने 10 अप्रैल से पहले ही रिजर्व बैंक से इस मसले पर राय मांग ली। बैंक का ब्रांड नाम लाइसेंस के लिए आवेदन करते वक्त ही रिजर्व बैंक के सामने पेश करना होगा। इसकी आखिरी तारीख 1 जुलाई है।
इस बारे में संपर्क करने पर बिड़ला के एक प्रवक्ता ने कहा, ‘ब्रांडिंग के बारे में फिलहाल कुछ कहना जल्दबाजी होगी। समूह से जुड़े लोगों ने बताया कि बिड़ला को एक सर्वेक्षण से पता चला कि ‘आदित्य बिड़ला’ ब्रांड अच्छी विश्वसनीयता, नैतिकता, भरोसे और कॉर्पोरेट गवर्नेंस का प्रतीक है। ऐसे में आरबीआई इस मसले पर अपना रुख साफ कर दे तो समूह इस ब्रांड नाम का इस्तेमाल पसंद करेगा।
बिड़ला की तरह ही टाटा समूह की छवि भी भारतीयों के बीच काफी अच्छी है और समूह बैंकिंग कारेाबार के लिए इसी ब्रांड का नाम का इस्तेमाल करना चाहेगा। हालांकि इस पर फैसला आरबीआई का रुख देखने के बाद ही किया जाएगा। टाटा समूह के एक प्रक्वता ने बताया, ‘हम दिशानिर्देश की समीक्षा कर रहे हैं, इसलिए अभी इस पर कुछ नहीं कह सकते। बिड़ला और टाटा के पास पहले से ही गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां हैं, जो समूह के ब्रांड का नाम ही इस्तेमाल कर रही हैं। दिलचस्प है कि शुरुआत में बैंकिंग लाइसेंस पाने वाले उद्योग समूहों में शुमार हिंदुजा ने अपने ब्रांड नाम का इस्तेमाल नहीं किया और बैंक का नाम ‘इंडसइंड’ रखा।
मुकेश अंबानी की रिलायंस इंडस्ट्रीज, अनिल अंबानी की रिलांयस कैपिटल, महिंद्रा समूह और वीडियोकॉन समूह भी बैंकिंग लाइसेंस पर नजर रखे हैं।
ब्रांड सलाहकारों का कहना है कि आरबीआई का नए ब्रांडों पर जोर देना बेहतर होगा। नॉबी ब्रांड आर्किटेक्ट्स के संस्थापक और मुख्य कार्याधिकारी नवांकुर गुप्ता ने कहा, ‘मेरे विचार से आरबीआई सभी के लिए एकसमान मैदान पसंद करेगा। बड़े कारोबारी घरानों के साथ विरासत जुड़ी होती है और उनका ब्रांड नाम वजनदार होता है। इससे उन्हें छोटी कंपनी के मुकाबले ज्यादा फायदा हो सकता है। हालांकि इंटरब्रांड इंडिया के प्रबंध निदेशक आशीष मिश्रा मानते हैं कि फिजूल का खर्च बचाने के लिए आरबीआई को ब्रांड नाम के इस्तेमाल की इजाजत समूहों को दे देनी चाहिए।
हरीश बिजूर कंसल्टेंट्स के मुख्य कार्याधिकारी हरीश बिजूर ने कहा कि वित्तीय मामलों में ग्राहक भोले-भाले होते हैं, ऐसे में मूल ब्रांड को बैंकिंग कारोबार में लाना खतरनाक हो सकता है। आरबीआई इससे बचना चाहता है। नई कंपनियों को भी दिक्कत नहीं होनी चाहिए और नए कारोबार में नए ब्रांड के साथ उतरना चाहिए।
इसी के मध्य फाइनेंशियल सेक्टर लेजिसलेटिव रिफॉर्म्स कमीशन (एफएसएलआरसी) रिजर्व बैंक को टेलीकॉम कंपनियों और कुछ दूसरे उद्योगों को लिमिटेड परपस बैंक लाइसेंस देने की सिफारिश कर सकता है। कमीशन का मानना है कि इससे फाइनेंशियल इनक्लूजन को बढ़ावा मिलेगा। मॉर्गन स्टैनली इंडिया के चेयरमैन पी जे नायक की अगुवाई वाले वर्किंग ग्रुप ने बैंकिंग सुविधा से दूर लोगों के लिए बिलकुल नया अप्रोच अपनाने का प्रस्ताव दिया है। इससे इन लोगों को औपचारिक और सुरक्षित पेमेंट सिस्टम मुहैया कराया जा सकेगा। इस ग्रुप को एफएसएलआरसी ने देश के पेमेंट कानूनों में बदलाव करने की सिफारिशें देने का काम सौंपा है। ग्रुप ने पेमेंट और सेटलमेंट सिस्टम में रिजर्व बैंक को रेगुलेशन को भी खत्म करने का प्रस्ताव दिया है।ग्रुप के प्रस्ताव यूपीए-2 सरकार के लिए काफी अहम साबित हो सकते हैं क्योंकि इनके जरिए सरकार के महत्वाकांक्षी डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर प्रोग्राम को काफी मदद मिल सकती है। इस प्रोग्राम के जरिए सरकार तकनीक का इस्तेमाल करते हुए स्कीम के लाभार्थियों को सीधे सब्सिडी देना चाहती है। हालांकि, बैंकिंग सेक्टर से जुड़े कुछ लोग इस प्रस्ताव का विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि इसमें कई तरह के जोखिम जुड़े हुए हैं।
आईआईएम बंगलुरु के सेंटर फॉर पब्लिक पॉलिसी के मेंबर एम एस श्रीराम का कहना है कि यह रिपोर्ट इनोवेशन और रिस्क के बीच संतुलन स्थापित नहीं करती। इसमें छोटे बचतकर्ताओं के हितों को ताक पर रख दिया गया है। इस मसले पर आरबीआई को रक्षात्मक रुख अख्तियार करना चाहिए। पेपाल, वेस्टर्न यूनियन और केन्या के मोबाइल फोन सर्विस का उदाहरण देते हुए इस वर्किंग ग्रुप का कहना है कि इसी तर्ज पर टेलीकॉम कंपनियों को भी फाइनेंशियल डिपॉजिट हासिल करने की अनुमति दे देनी चाहिए। ग्रुप ने कमीशन से कहा है कि वह आरबीआई को लिमिटेड परपस बैंकिंग लाइसेंस जारी करने की सिफारिश करे। ग्रुप का कहना है कि यदि टेलीकॉम कंपनियों को जमा हासिल करने और उसे अदा करने की अनुमति मिल जाती है तो इससे पेमेंट ट्राजैक्शन के बिजनेस को बढ़ावा मिलेगा। साथ ही इस फाइनेंशियल इनक्लूजन भी बढ़ेगा।
ग्रुप ने अपनी रिपोर्ट में कहा है , ‘ डिपॉजिट हासिल करने वाले हरेक संस्थान को बैंकिंग लाइसेंस दिया जाना चाहिए। ऐसा संभव है यदि आरबीआई विभिन्न श्रेणियों के बैंकों , जिनमें टेलीकॉम कंपनियों द्वारा प्रायोजित बैंक या दूसरे उद्योगों द्वारा प्रायोजित बैंक भी शामिल हैं , को मंजूरी दे दे। ‘ सरकार के फाइनेंशियल इनक्लूजन को बढ़ावा देने के लिए इस रिपोर्ट में कहा है कि स्मॉल – वैल्यू पेमेंट की कुछ श्रेणियों को केवायसी नियमों के बगैर मंजूरी दी जा सकती है। इसका यह भी कहना है कि आधार जैसी परियोजना के पूरे होने के बाद बॉयोमीट्रिक आइडेंडिफिकेशन के जरिए इलेक्ट्रॉनिक केवायसी के साथ पेपर – बेस्ट केवायसी का जमा की जा सकती है।
रिजर्व बैंक ने नए बैंकों के लाइसेंस के लिए इस साल फरवरी में दिशा-निर्देश जारी किए। बैंक खोलने की इच्छुक कंपनियों से जुलाई, 2013 तक आवेदन जमा करने को कहा गया है। लाइसेंस के इच्छुक लोगों को केंद्रीय बैंक से 10 अप्रैल तक संबंधित किसी मुद्दे पर स्पष्टीकरण के लिए अनुरोध पत्र प्रस्तुत करने का समय दिया गया था।
घटनाक्रम से जुड़े सूत्रों ने कहा कि इस संबंध में रिजर्व बैंक से मांगे गए स्पष्टीकरण संबंधी अनुरोध पत्रों की संख्या को देखते हुए 100 से अधिक कंपनियां लाइसेंस के लिए आवेदन करने की इच्छुक प्रतीत होती हैं। एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि हालांकि कुछ ही कपंनियों को बैंक लाइसेंस दिए जाने की संभावना है।
उन्होंने कहा कि रिजर्व बैंक द्वारा 4.5 नई इकाइयों को लाइसेंस दिए जाने की संभावना है.. आरबीआई अधिक से अधिक 8-10 नए लाइसेंस जारी कर सकता है।
उल्लेखनीय है कि अनिल अंबानी की अगुवाई वाला रिलायंस समूह, एलएंडटी, महिंद्रा, बिड़ला, रेलीगेयर और वीडियोकान जैसे कई बड़े उद्योग घरानों ने लाइसेंस के लिए आवेदन करने का अपना इरादा पहले ही जगजाहिर कर दिया है।
वहीं, श्रीराम समूह, इंडियाबुल्स, इंडिया इनफोलाइन, आईएफसीआई और पीएफसी सरीखे कई गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) ने भी बैंकिंग लाइसेंस के लिए आवेदन करने की इच्छा जताई है। बैंकिंग लाइसेंस के लिए कथित तौर पर इच्छुक घरानों में टाटा और मुकेश अंबानी की अगुवाई वाला रिलायंस ग्रुप भी शामिल है।
भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) बैंक लाइसेंस ऑक्शन करने के हक में नहीं है। उसका कहना है कि इससे फाइनेंशियल इनक्लूजन को नुकसान होगा। गवर्नर डी सुब्बाराव ने नए बैंकिंग लाइसेंस पॉलिसी को रिव्यू करने वाली संसदीय समिति से यह बात कही है।
एक सरकारी अधिकारी ने बताया, ‘आरबीआई गवर्नर ने कमेटी को यह भी बताया है कि बैंक लाइसेंस की संख्या के बारे में अभी कुछ भी तय नहीं है।’ समिति के कुछ मेंबर्स ने नए बैंकिंग लाइसेंस के लिए एप्लिकेंट के सेलेक्शन को ट्रांसपैरेंट बनाने के लिए नीलामी का सुझाव दिया था। आरबीआई गवर्नर ने समिति को बताया कि आज तक सिर्फ एक देश ने ही बैंक लाइसेंस ऑक्शन किए हैं। नए लाइसेंस देने का मकसद फाइनेंशियल इनक्लूजन को बढ़ावा देना है।
आरबीआई की गाइडलाइंस के मुताबिक, नए बैंक के लिए अप्लाई करने वालों को कम से कम 25 फीसदी ब्रांच ऐसे रूरल एरिया में खोलनी होगी, यहां अभी बैंक नहीं हैं। समिति के कुछ सदस्यों ने बैंक एप्लिकेशन की जांच करने के लिए आरबीआई के बाहरी पैनल बनाने पर भी सवाल उठाया। आरबीआई ने इस साल फरवरी में नई बैंक गाइडलाइंस इश्यू की थीं। इसमें उसने कहा था कि लाइसेंस की एप्लिकेशंस को हाई लेवल एडवाइजरी कमेटी के पास भेजा जाएगा। यह कमेटी अपने सुझाव रिजर्व बैंक को देगी। इस बारे में सरकारी अधिकारी ने कहा, ‘सुब्बाराव ने समिति को बताया है कि आरबीआई ने अभी हाई लेवल एडवाइजरी कमेटी के बारे में कुछ फाइनल नहीं किया है।’

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  • Published: 5 years ago on April 16, 2013
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  • Last Modified: April 16, 2013 @ 1:11 pm
  • Filed Under: देश

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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  1. Carporate ghrana desh ko pahale do number se लूटा अब बैंकिंग के द्वारा एक नंबर से लूटेंगे.

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