/सरबजीत पर हमला, पाकिस्तान में हावी होते कट्टरपंथी..

सरबजीत पर हमला, पाकिस्तान में हावी होते कट्टरपंथी..

-आशीष वशिष्ठ||
पाकिस्तान में लाहौर की कोट लखपत जेल में बंद भारतीय कैदी सरबजीत पर हमला एक गंभीर मामला है। मुंबई बम धमाके के आरोपी आतंकी अजमल कसाब और संसद पर हमले के दोषी अफजल गुरू को फांसी देने के बाद से ही पाकिस्तान की जेलों में बंद भारतीय कैदियों को लगातार धमकियां मिल रही थी और उन्हें जान से मार से मारने की धमकियां मिल रही थी। जमीनी हालातों से दोनों देशों की हुकूमतें वाकिफ थी बावजूद इसके कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई। पिछले दिनों पाकिस्तान में सरबजीत के वकील अवैस शेख को भी आतंकी गुट तहरीक-ए-तालिबान ने जान से मारने की धमकी दी थी। इस साल जनवरी में कोट लखपत जेल में ही बंद एक भारतीय कैदी चमेल सिंह को भी कैदियों ने पीट-पीटकर मार डाला था। उस घटना पर भारत सरकार के ढीले रवैये ने पाकिस्तानी कट्टरपंथियों के हौसले को बढ़ाया जिसका नतीजा सरबजीत पर प्राणघातक हमले के तौर पर सामने आया है। चार महीने में दो भारतीय कैदियों पर प्राणघातक हमला मानवाधिकारों के उल्लंघन का गंभीर मामला है।sarabjit-critical-after-attack-in-jail-1367013688-3874
सरबजीत पर हमला कैदियों के बीच आपसी संघर्ष मानना एक बड़ी भूल होगी। मामले की गंभीरता को समझते हुये पाकिस्तान की आंतरिक सरकार ने कसूरवार जेल अधिकारियों और कर्मचारियों को बर्खास्त कर दिया है और हमले में शामिल कैदियों की शिनाख्त भी कर ली है। सरबजीत पर हमले करने वाले कैदियों ने अपना गुनाह कबूल लिया है और उन्होंने कहा है कि वो सरबजीत से १९९० में हुये बम धमाके का बदला लेना चाहते थे। १९९० के बम धमाकों के गुनाह में ही सरबजीत पिछले २३ सालों से पाकिस्तान की जेलों में नारकीय जीवन व्यतीत कर रहा है।
सरबजीत पर जानलेवा हमले के पीछे पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई और कट्टरपंथी गुटों का हाथ की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है, मीडिया के माध्यम से ऐसी रिपोर्ट आ भी रही हैं। पिछले दिनों भारत यात्रा पर आये पाकिस्तान के प्रधानमंत्री रहमान मलिक के समक्ष भारत सरकार ने कैदियों की सुरक्षा और उन्हें जेल में लगातार मिल रही धमकियों से संबंधित खुफिया जानकारियां सांझा की थी। भारत ने पाक से भाईचारा बढ़ाने की नीयत से भारतीय जेल में बंद पाकिस्तान कैदी खलील चिश्ती को पिछले साल रिहा किया था। भारत के सद्भाव के बदले मे राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने भारत यात्रा के बाद सरबजीत सिंह को रिहा करने का प्रयास किया था। सरबजीत की रिहाई की खबर आने के २४ घण्टे बाद ही पाकिस्तान सरकार को अपने बयान से पलटना पड़ा था, और सरबजीत की जगह एक अन्य भारतीय कैदी सुरजीत सिंह को रिहा किया था। असल में पाकिस्तान में फौज, खुफिया एजेंसियां और कट्टरपंथी ताकतें इस कदर हावी है कि वो शांति के किसी भी प्रयास को सिरे चढने नहीं देती। सरबजीत भी इसी सियासत का शिकार है।
pakistan_india_prisoner_sarabjit_singh_attacked_l_35446711कसाब को फंासी के बाद पाक सैनिकों ने दो भारतीय सैनिकों की नृंशस हत्या कर दी थी और एक सिपाही को सिर वो अपने साथ ले गये थे। जनवरी २०१३ में लखनऊ में सरबजीत पर लिखी पुस्तक के विमोचन समारोह के दौरान मेरी सरबजीत की बहन दलबीर कौर उसकी छोटी बेटी पूनम और पुस्तक के लेखक एवं वकील अवैस शेख से मुलाकात हुई थी। उस समय दलबीर कौर ने बताया था कि जेल में सरबजीत सुरक्षित नहीं है उस पर किसी भी वक्त हमला हो सकता है। सरबजीत को खाने में धीमा जहर मिलाकर दिया जा रहा है। जेल में उसके साथ दुर्व्यवहार, अपमान और प्रताडना आम बात है दलबीर कौर ने पिछले दिनों भारत सरकार के गृह मंत्री को बताया था कि सरबजीत पर हमला हो सकता है क्योंकि जेल में पाकिस्तानी कैदी उसे जान से मारने की धमकियां दे रहे हैं लेकिन भारत सरकार ने कोई संज्ञान नहीं लिया जिसका दुष्परिणाम आज सामने है।
पंजाब में तरनतारन जिले के भिखीविंड गांव का रहने वाला है सरबजीत। सरबजीत का परिवार कहता है कि वह पंजाब में सीमा पर स्थित अपने गांव से संयोगवश भटक कर 28 अगस्त, 1990 को पाकिस्तान में प्रवेश कर गया था। 30 अगस्त, 1990 को पाकिस्तानी सेना ने उसे गिरफ्तार किया। लाहौर और फैसलाबाद में हुए बम धमाके में जिसमें 14 लोगों की जान गई थी। इसी मामले में 1991 में उसे फांसी की सजा सुनाई गई थी। सरबजीत ने 5 बार दया याचिका पाकिस्तान के राष्ट्रपति को दी थी जो लंबित है। पिछले २३ वर्षों से पाकिस्तान की जेल में नरक की जिंदगी जी रहा सरबजीत गलत पहचान का शिकार है। जिस मामले में उसे फंासी की सजा सुनाई गई है उस एफआईआर में किसी मंजीत सिंह का नाम है सरबजीत सिंह का नहीं। तमाम सबूतों के बावजूद पाकिस्तान अदालत और सरकार उसे माफ करने को तैयार नहीं है।
हर कोई जानता है कि पाकिस्तान में किस तरह मानवाधिकारों का उल्लंघन किया जा रहा है। सम्पन्न और सत्ता से जुड़े लोग हत्या जैसे अपराध से भी बरी हो जा रहे हैं जबकि कमजोर लोगों को झूठे मामलों में फंसाया जाता है। पाकिस्तान मानवाधिकार आयोग की रपट बेहद हताश करने वाली है। एचआरसीपी के अनुसार, लोकतांत्रिक सरकार के सत्तासीन होने के बावजूद वर्ष 2008 में पाकिस्तान में मानवाधिकार की स्थिति और अधिक खराब हुई। साफ है कि जनता द्वारा चुनी गई सरकार ने भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान नहीं किया। तालिबान का विरोध करने वाले लोगों की गर्दनें काट दी जाती हैं। तालिबान लड़ाकू दरिंदगी की हद पार कर रहे हैं। वे शवों को सार्वजनिक स्थलों पर रखकर आम लोगों में खौफ पैदा करने की कोशिश करते हैं। यहां तक कि मारे गए लोगों को दफनाने की भी इजाजत नहीं दी जाती है।
पाकिस्तान में हिन्दू और सिख समुदाय के लोगों की स्थिति बेहद दयनीय है। वे हमेशा डर और आतंक के साये में जीते हैं। अन्य समुदायों के अल्पसंख्यकों की भी यही दशा है। इसका खुलासा खुद पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग (एचआरसीपी) ने किया है। अपनी रिपोर्ट में आयोग ने खासतौर पर वर्ष 2010 को अल्पसंख्यकों के लिए बेहद खराब बताया। पिछले हफ्ते जारी आयोग की रिपोर्ट के अनुसार ओराकजाय एजेंसी नामक इलाके में 102 सिख परिवारों में से करीब 25 प्रतिशत ने तालिबानियों के फरमान के बाद अपना घर छोड़ दिया। उन्हें तालिबान ने जजिया चुकाने या वह क्षेत्र छोड़ देने का फरमान सुनाया था। सैन्य कार्रवाई के बाद ही सिख अपने घरों में लौट पाए। इसी तरह सुरक्षा कारणों से 27 हिन्दू परिवारों को भारत में शरण लेनी पड़ी।
चमेल सिंह की हत्या के बाद भारत सरकार को कड़ा विरोध दर्ज कराना चाहिये था लेकिन वो उसमें वो असफल रही। सरबजीत पर हमला केवल एक भारतीय कैदी पर हमले ही नहीं बल्कि देश की प्रतिष्ठा पर भी हमला है। सरबजीत की तुलना कसाब और अफजल गुरू से कदापि नहीं की जा सकती। कसाब ने क्या किया वो सारी दुनिया जानती है। सरबजीत तो गलत पहचान का शिकार है। पाकिस्तान में चुनाव का वक्त है ऐसे में कट्टरपंथी ताकतें फिर से अपना सिर उठा रही हैं उनका साथ वहां की सियासी पार्टियां भी दे रही हैं क्योंकि भारत विरोध का सियासी लाभ उठाने की फिराक में हैं। भारत सरकार को इस मुद्दे की गंभीरता को समझते हुये सरबजीत के ईलाज और सुरक्षा के साथ पाकिस्तान की जेलों में बंद अन्य कैदियों की सुरक्षा के लिए पुख्ता प्रबंध करने चाहिए क्योंकि यह मसला दो देशों के आपसी संबंधों और विदेश नीति से जुड़ा है जिससे दोनों देशों की लाखों लोग सीधे तौर पर प्रभावित होते हैं।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.