/श्रमिकों के अधिकारों की पैरवी करता मई दिवस..

श्रमिकों के अधिकारों की पैरवी करता मई दिवस..

-आशीष वशिष्ठ||

मई माह के पहले दिन अर्थात 1 मई को विश्व के लगभग सभी देशों में मई दिवस या श्रमिक दिवस मनाया जाता है। यह मजदूरों का सबसे बड़ा त्यौहार है। इस दिन दुनिया भर में मजदूर इकट्ठे होकर पूंजीवादी लूट, शोषण के खिलाफ मजदूर वर्ग की लड़ाई को आगे बढ़ाने का संकल्प लेते हैं। पहली मई का दिन हर वर्ष जहां मजदूरों वर्ग के लिए नया जोश लेकर आता है, वहीं यह दिन दुनिया भर के पूंजीपतियों के दिलों में खौफ पैदा करता है। मई दिवस यह स्पष्ट ऐलान करता है कि मजदूरों को आज तक जो भी हक-अधिकार मिले हैं, वे लड़कर मिले हैं। मई दिवस बताता है कि मजदूर वर्ग जब सचेत होकर संगठित लड़ाई लड़ता है, तब वह दुनिया की हर लुटेरी ताकत को चकनाचूर कर सकता है।May-Day

श्रमिकों के काम के घंटों को कम करने और उन्हें अधिकार दिलाने के लिए अमेरिका में एक मुहिम की शुरूआत हुई। धीरे-धीरे यह मुहिम एक आंदोलन में परिवर्तित हो गई और भारत पहुंच गई। अमरीका में तो श्रमिक दिवस मनाने की परंपरा बहुत पुरानी है लेकिन भारत में इसे पहली बार 15 जून, 1923 को मनाया गया। इसके अलावा कई राष्ट्रों और संस्कृतियों में यह दिवस पारंपरिक बसंत महोत्सव के तौर पर भी मनाया जाता है और इस दिन सार्वजनिक अवकाश रखने का भी प्रावधान है

अमरीका में शुरू हुआ मजदूर आंदोलन, वहां उमड़े औद्योगिक सैलाब का ही एक हिस्सा था। इसका सीधा संबंध अमरीका की आजादी के लिए चल रही लड़ाई तथा 1860 में हुआ गृहयुद्ध भी था। 19वीं शताब्दी तक पहुंचते-पहुंचते मजदूर संगठन एवं मजदूर यूनियन बेहद मजबूत और अपने अधिकारों के लिए जागरुक भी हो गए थे। सबसे पहले मजदूरों के जो भी संगठन बने उनमें बुनकर, दर्जी, जूते बनाने वाले लोग, फैक्ट्री आदि में काम करने वाले पुरुष तथा महिला मजदूर प्रमुख थे। अपने अधिकारों की मांग करते हुए मजदूरों ने राष्ट्रव्यापी संगठन बनाने की भी कोशिश की और वर्ष 1834 में नेशनल ट्रेड यूनियन का निर्माण किया गया। संगठन से जुड़े मजदूरों ने सबसे पहले अपने काम के घंटे कम करने के लिए संघर्ष किया, जिसमें सबसे ज्यादा योगदान अमरीकी मजदूर श्तहरीक्य का था। नेशनल ट्रेड यूनियन और अन्य मजदूर संगठनों ने मिलकर यह निर्णय लिया कि 1 मई, 1886 को श्रमिक दिवस मनाया जाएगा। कुछ राज्यों में बहुत पहले से ही मजदूरों के लिए आठ घंटे काम करने का चलन था परंतु इसे कानूनी मान्यता नहीं दी गई थी। इस चलन को पूरी तरक वैधानिक बनाने के लिए पूरे अमेरिका में 1 मई, 1886 को हड़ताल हुई। जिसके बाद पहले जहां मजदूरों को 10 घंटे प्रतिदिन काम करना पड़ता था वहीं अब उनके लिए 8 घंटे निश्चित कर दिए गए।

भारत में मई दिवस पहली बार वर्ष 1923 में मनाया गया जिसका सुझाव सिंगारवेलु चेट्टियार  नाम के एक प्रभावी कम्यूनिस्ट नेता ने दिया। उनका कहना था कि दुनियां भर के मजदूर इस दिन को मनाते हैं तो भारत में भी इसकी शुरूआत की जानी चाहिए। मद्रास में मई दिवस मनाने की अपील की गई। इस अवसर पर वहां कई जनसभाएं और जुलूस आयोजित कर मजदूरों के हितों के प्रति सभी का ध्यान आकर्षित करने का प्रयास किया गया। आज भी विश्व के सभी बड़े देशों में श्रमिक दिवस या मई दिवस मनाया जाता है। भले ही अलग-अलग राष्ट्रों में इस दिन को मनाने का तरीका भिन्न है लेकिन इसका एकमात्र उद्देश्य मजदूरों को मुख्य धारा में बनाए रखना और उनके अधिकारों के प्रति समाज को और स्वयं उन्हें जागरुक करना है।

वर्तमान समय में देश में श्रमिक हित हेतु गठित मुख्यतरू अखिल भारतीय स्तर के चार-पांच श्रमिक संगठन हैं जिनमें प्रमुख हैं भाकपा की नीतियों से जुड़ी अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस (एटक), माकपा से जुड़ी सेन्टर ऑफ ट्रेड यूनियन (सीटू), कांग्रेस की छत्रछाया पायी भारतीय राष्ट्रीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस (इंटक) तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एवं भाजपा के विचारधारा से जुड़ी भारतीय मजदूर संघ (बीएमएस) है। इनके अलावा इन्हीं के बीच से स्वार्थ के वशीभूत होकर या फिर आपसी मतभेद के कारण उभरे अनेक श्रमिक संगठन भी हैं जिनमें हिन्दुस्तान मजदूर पंचायत, हिन्दुस्तान मजदूर सभा, किसान ट्रेड यूनियन आदि। जिनपर भी किसी न किसी राजनीतिक दलों की छाया विराजमान है। श्रमिकों के हित का संकल्प लेने वाले ये श्रमिक संगठन देश के मजदूरों को कभी भी एक मंच पर होने नहीं देते। देश के प्रायरू सभी संगठन 1 मई को मजदूर दिवस के रूप में मनाते तो है। पर संगठन का एक मंच न होना, मई दिवस की प्रासंगिकता को एक मायने में नकारता भी है।

मई दिवस उन शहीदों की कुर्बानियों को याद करने का एक मौका है, जिन्होंने अपनी जिंदगी देकर पूरी दुनिया के मजदूरों को यह संदेश दिया था कि उन्हें अलग-अलग पेशों और कारखानों में बंटे-बिखरे रहकर महज अपनी पगार बढ़ाने के लिए लडने के बजाय एक वर्ग के रूप में एकजुट होकर अपने राजनीतिक अधिकारों के लिए संघर्ष करना होगा। काम के घंटे कम करने की मांग उस समय की सबसे बड़ी राजनीतिक मांग थी।

मई दिवस के शहीदों की कुर्बानी बेकार नहीं गयी। जल्दी ही काम के घंटों की मांग पर संघर्ष की लहर की लहर पूरी दुनिया में फैल गयी। पूंजीपति वर्ग की सरकारें आठ घंटे काम के दिन का कानून बनाने के लिए मजबूर हो गयीं। यही नहीं, मजदूरों की जुझारू वर्ग चेतना से घबराई दुनिया के अधिकांश देशों की सरकारें श्रम कानून बनाकर किसी न किसी हद तक मजदूरों को चिकित्सा, आवास आदि बुनियादी सुविधाएं, तथा यूनियन बनाने का अधिकार देने, न्यूनतम मजदूरा तय करने और जब मर्जी रोजगार छीन लेने जैसी मालिकों की निरंकुश हरकतों पर बंदिशें लगाने के लिए मजदूर हो गयीं।

मगर पिछले 25-30 सालों के दौरान मजदूर आंदोलन की कमजोरी और बिखराव का फायदा उठाकर पूंजीपति फिर से मजदूरों पर हावी हो गए हैं। हमारे शहीद भाइयों ने अपना खून देकर जो हक हासिल किये थे वे एक-एक करके मजदूरों से छीन लिए गए हैं। आज फिर मजदूरों से 12-14 घंटे जानवरों की तरह काम कराया जाता है। न्यूनतम मजदूरी, जॉब कार्ड, ईएसआई, साप्ताहिक छुट्टी जैसे बुनियादी अधिकार तक हमें नहीं दिये जाते। अपनी यूनियन बनाने का अधिकार भी हमसे छीन लिया गया है। सिर झुकाकर बैल की तरह काम में जुटे रहना, कदम-कदम पर अपमान सहना औ कभी भी निकाल दिए जाने के डर में जीना – यही है आज मजदूर की जिंदगी। पिछले एक साल में देशभर में मजदूर आंदोलन और उनकी जायज मांगों को कुचलने का कुचक्र चलता रहा है। मारूति मजदूर आंदोलन में मालिक-मजदूर संघर्ष की याद ताजा करा दी।  देश में जब कभी भी श्रमिकों के हित में श्रमिक संगठनों द्वारा व्यवस्था के खिलाफ आंदोलन की बात उठती रही है तब-तब अलग-अलग खेमे में बंटे होने के कारण इस तरह के आंदोलन को सफलता नहीं मिल पायी है। जिसके कारण श्रमिकों की समस्या आज ज्यों की त्यों रह गयी है। जब कभी भी देश में श्रमिक संगठनों के बीच इस दिशा में एक होकर आवाज उठी है वह आवाज परिवर्तन का कारण बनी है।

ऐसे में मई दिवस का दिन हमें याद दिलाने आया है – साथियो, गुलामी की नींद से जागो, मजदूर संघर्षों की शानदार विरासत को याद करो। मजदूर वर्ग हमेशा के लिए परास्त नहीं हुआ है। लड़ाई अभी जारी है। पहला दांव पूंजीपतियों का सफल हुआ है। लेकिन मुऋीभर लुटेरे जोर-जुल्म से करोड़ों-करोड़ मेहनतकश आबादी को हमेशा के लिए दबाकर नहीं रख सकते। आने वाले वर्षों में पूंजी और श्रम के बीच आखिरी जंग होगी जिसमें जीत मेहनतकशों की ही होगी। इसकी तैयारी हमें आज से ही करनी होगी। यही मई दिवस का संदेश है।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.