/लचर विदेश नीति ने ली सरबजीत की जान..

लचर विदेश नीति ने ली सरबजीत की जान..

-आशीष वशिष्ठ||

आखिरकर सरबजीत जिंदगी की जंग हार गया। सवाल यह है कि सरबजीत की मौत का असली जिम्मेदार कौन है पाकिस्तान या भारत। पाकिस्तान से तो उम्मीद करना ही व्यर्थ है, देखा जाए तो इसके लिए पूरी तरह हमारी कमजोर विदेश नीति और राजनीतिक इच्छा शक्ति का अभाव साफ तौर पर दिखाई देता है। पाकिस्तान बनने के बाद से ही वहां राजनीतिक अस्थिरता का माहौल बना है और फौज और कट्टरपंथी ताकतें पूरी तरह से लोकतंत्र पर हावी है। Sarabjit-Singhपाकिस्तान में मानवाधिकार नाम की चिड़िया को उड़ान भरने की सख्त मनाही है। पाकिस्तान की जेलों में कई सौ भारतीय नागरिक बंद है जिनके लिए चंद मानवाधिकार संगठनों के अलावा सरकार के स्तर पर कोई आवाज उठती दिखाई नहीं देती है। सरबजीत की बहन दलबीर कौर पिछले 23 सालों से दर की दर ठोकरें खा रही थी कि पाकिस्तान की जेल में बंद उसके बेगुनाह भाई को सरकार छुड़ाने का प्रयास करे लेकिन जिस ठोस तरीके से अपने नागरिक के अधिकारों की पैरवी भारत सरकार को करनी चाहिए थी वैसा सख्त रवैया, ठोस पहल और कोशिश होती दिखी नहीं। चमेल सिंह की हत्या के बाद सरकार को चेत जाना चाहिए था लेकिन उसका ढुलमुल रवैया कायम रहा और अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में भी पाक की इस नापाक करतूत को प्रचारित करने और उस पर दबाव बनाने में सरकार नाकामयाब रही जिसकी कीमत तीन महीने बाद सरबजीत की जान देकर चुकानी पड़ी।

मुंबई बम धमाकों के आरोपी कसाब और संसद हमले के आरोपी अफजल गुरु को जब फांसी हुई थी तभी से ये आशंकाएं बलवती हो रही थीं कि सरबजीत पर जानलेवा हमला हो सकता है और उसे बिना फांसी दिये ही मौत के घाट उतारा जा सकता है। इस आशंका की कई वजहें थीं, जिनमें प्रमुख थी पाकिस्तान का घिनौना राजनीतिक चरित्र। पाकिस्तान में विभिन्न राजनीतिक पार्टियों पर आतंकवादियों का दबाव और भारत के विरुध्द नफरत भी ऐसी आशंकाओं का बड़ा कारण था। वास्तव में अपने आपको पढ़े लिखे और माडरेट राजनेताओं में शुमार करवाने वाले इमरान खान जैसों तक ने कसाब की मौत के बाद ऐसी ही भड़काऊ और फूहड़ प्रतिक्रिया की थी। हालांकि सरबजीत की तब किस्मत अच्छी थी और वह ऐसे आशंकित, बर्बर जानलेवा हमले से बचे रहे। लेकिन बहुत देर तक यह संभव नहीं हुआ। यहां तक कि जिन दिनों सरजीत को किसी तरह मार डाले जाने की आशंका थी, उन दिनों वह तो बच गये लेकिन एक दूसरे भारतीय कैदी चमेल सिंह को पाकिस्तान की बर्बर आशंका भुगतनी पड़ी। पाक कैदियों ने उन्हें मौत के घाट उतार दिया

फिर पाकिस्तानी जेल प्रशासन ने लीपापोती करके चमेल सिंह को मौत को अचानक दिल के पड़े दौरे से जोड़ दिया। लेकिन सरबजीत सिंह की किस्मत अभी पूरी तरह से सुरक्षित नहीं थी बावजूद इसके लौहार को कोट लखपत जेल के प्रशासन ने उनकी सुरक्षा को लेकर गंभीर लापरवाही बरती या यह कहा जाए जेल प्रशासन ने ही सरजीत को बिना फांसी दिये मौत के घाट उतार देने की पूरी योजना बनायी। अगर ऐसा नहीं होता तो जिस कैदी को अभी एक डेढ़ महीने पहले सर्वाधिक सुरक्षित जेल कोठरी में रखे जाने के आदेश थे, उस कैदी को एक घंटे के लिये जेल के भीतर खुले में छोड़ देने का क्या मतलब था? अगर पाकिस्तान कहता है कि सरबजीत सिंह को मानवाधिकारों के तहत सीमित आजादी महसूस करने के लिये खुला छोड़ा गया था तो जेल प्रशासन का यह मासूमियत से कोटेड यह बर्बर बहाना किसी के गले नहीं उतरेगा। वास्तव में सरबजीत को मार डाले जाने की घृणित योजना के तहत ही जेल में एक घंटे के लिए उसे खुले में छोड़ दिये जाने की हरकत की गयी। जिससे कि मौका पाकर आधा दर्जन खूंखार पाकिस्तानी कैदियों ने सरबजीत पर भोथरी चीजों से हमला किया गया।

इसमें कोई दो राय नहीं है कि किसी भी संस्थान की प्रशासनिक चूक को उस देश के चरित्र से नहीं आंका जा सकता, लेकिन जब बात पाकिस्तान की हो तो यह मानने में कतई झिझक नहीं होनी चाहिये कि सरबजीत पर किया गया हमला महज जेल प्रशासन की लापरवाही नहीं है बल्कि यह पाकिस्तान सरकार की गंभीर चूक है जिसमें गहरे षडयंत्र की बू आती है। पिछले कुछ दिनों से जिस तरह पाकिस्तान में आगामी चुनावों के लिये प्रचार अभियान जोर पकड़ रहा था और उसमें सीधे-सीधे भारत के संबंध में ज्यादा कुछ नहीं कहा जा रहा था। उससे लग रहा था कि जैसे पाकिस्तान देर में ही सही राजनीतिक परिक्वता की तरफ बढ़ रहा है। लेकिन इस घिनौने कृत्य के बाद साफ हो जाता है कि पाकिस्तान से इस तरह की उम्मीदें नादानी के सिवा कुछ नहीं है। पाकिस्तान से जब भी हम यह उम्मीद करेंगे कि वह अब राजनैतिक रूप से या कूटनीतिक लिहाज से परिपक्व हो गया है, हम तब तक मात खायेंगे।

वास्तव में सरबजीत पर यह हमला महज कुछ कैदियों के जानलेवा गुस्सा भर का नतीजा नहीं है। सरबजीत पर हुए इस हमले के पीछे उस आतंकी मानसिकता का हाथ है जो पाकिस्तान के अस्तित्व के लिये भारत से नफरत के पार कुछ देख नहीं सकती। निश्चित रूप से इस हमले में प्रत्यक्ष रूप से लश्करे-तौयबा और जमात-उद-दावा जैसे आतंकी संगठनों का बनाया गया नफरती माहौल जिम्मेदार है, साथ ही कहीं न कहीं इस हमले के पीछे वह कमजोर दिल वाली पाकिस्तानी राजनीति भी है जो अभी भी भारत से नफरत प्रदर्शित किये बिना अपनी स्वतंत्र ताकत का ऐहसास नहीं कर पाती। निश्चित रूप से सरबजीत पर किए गये हमले का राजनीतिक फायदा जमाते इस्लामी जैसी सियासी पार्टी को मिलेगा मगर किसी हद तक इस हमले का राजनीतिक फायदा मौजूदा कार्यवाहक सरकार के पहले की सत्तारूढ़ रही पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी भी उठायेगी।

लेकिन यह अकेले पाकिस्तान की घिनौनी हरकत भर का नतीजा नहीं है। यह भारत का आदतन नाकामयाबी का भी एक बड़ा कारण है। भारत सरकार अपने आधी सदी से ज्यादा के अनुभवों से इस बात को भलीभांति जानती थी कि राजनीतिक रूप से अपरिपक्व पाकिस्तान का सत्तारूढ़ प्रबंधन तंत्र लोगों को बरगलाने और भारत के विरुध्द दशकों में बनी नफरत को बरकारर रखने के लिये कोई भी शैतानी कदम उठा सकता है। बावजूद इसके सरबजीत की जिंदगी के लिये कोई भी सजग, ताकतवर और प्रभावशाली दबाव बनाने वाले कदम नहीं उठाए गये जबकि सरबजीत की बहन कुछ ही दिनों पहले पाकिस्तान से लौटी थीं और उसने गृहमंत्री शिंदे को लिखित में सरबजीत की सुरक्षा के लिये प्रार्थना की थी। यही नहीं सरबजीत की बहन ने गृहमंत्री से उन लोगों के नामों का भी खुलासा किया था जिनसे सरबजीत को मौत के घाट उतारे जाने की धमकियां मिल रही थीं। बावजूद इसके भारत सरकार ने कुछ नहीं किया या किया भी हो तो उसका दबाव पाकिस्तान ने जरा भी महसूस नहीं किया। यह अजीब विडंबना है कि जैसे-जैसे भारत आर्थिक और सियासी रूप में ताकतवार हो रहा है। वैसे-वैसे उसके अतंर्राष्ट्रीय प्रभाव में कमी सी आती जा रही है। कभी अमेरिका हमारी नागरिकों की सामान्य नागरिक होने की गरिमा नहीं बरकरार रखता, कभी चीन हमारी सीमाओं के अंदर जबरदस्ती घुस आता है, अपना तम्बू गाड़ देता है और फिर उल्टे हमीं पर आरोप लगाता है कि हम उसके साथ दोस्ताना रिश्ते नहीं रख रहे। इसी कड़ी में ही सरबजीत के मामले में भी देखा जाना चाहिये।

सरबजीत पर जानलेवा हमला महज एक कैदी पर हमला नहीं है। यह भारत सरकार के अस्तित्व, उसके अंतर्राष्ट्रीय कद पर भी किया गया जानलेवा हमला है। इससे भारत की ऐसी छवि निर्मित हो रही है कि हमारी कोई परवाह नहीं करता और किसी को हमारी परवाह किये जाने की चिंता नहीं है। खासतौर पर जब 15 जनवरी को चमेल सिंह की इसी जेल में हत्या कर दी गई थी तो भारत सरकार को इस मामले को प्रभावी ढंग से उठाना चाहिए था। भारतीय सैनिकों के सिर काट दिए जाएं, पाक जेलों के अन्दर मार दिया जाए। भारत सरकार की मजाल है कि वह एक शब्द भी अपने नागरिकों के लिए मुंह से निकालें। सरबजीत की मौत के पीछे भारत सरकार भी कम दोषी नहीं है, दुःख से कहना पड़ता है कि भारत सरकार ने सरबजीत को बचाने के लिए कोई गंभीर प्रयास नहीं किये। सरबजीत की मौत हमारी विदेश नीति की बड़ी नाकायाबी है। सरकार को चमेल और सरबजीत की मौत के बाद जागना चाहिए और विदेशों खासकर पाकिस्तान की जेलों में बंद भारतीय कैदियों की सुरक्षा के लिए ठोस कदम उठाने चाहिएं और सजा पूरी कर चुके और बेगुनाहों की वतन वापसी का प्रबंध करना चाहिए और अंतरराष्ट्रीय मंच में पाकिस्तान की इस नापाक हरकत को असरदार तरीके से रखना चाहिए, वरना पाकिस्तान का दुःसाहस बढ़ता जाएगा।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.