/पारिस्थितिकी और मानव आपदा के कगार पर है झरिया और रानीगंज!

पारिस्थितिकी और मानव आपदा के कगार पर है झरिया और रानीगंज!

-एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास​||

कोयलांचल में झरिया और रानीगंज दो ऐसे शहर हैं, जो धधकती हुई आग के ऊपर बसा है। कोयला खदानों के राष्ट्रीयकरण के बाद से इन शहरों के स्थानंतरण की बाते की जाती रही हैं। लेकिन पुनर्वास के बिना ऐसा संभव नहीं हो पाया है और न ही जमीन के नीचे कोयलाखानों में धधकती आग को नियंत्रित करने में कोई कामयाबी हासिल हुई है।​लोगों के सामने अब तक पुनर्वास की कोई संतोषजनक योजना नहीं पेश होने से और उसे अमली जामा पहनाने का भरोसा दिलाने में नाकामी की वजह से इसके राजनीतिक कारण भी हैं।jharia-coal-fires

झरिया कोयला खानों का अभी तक पूरा दोहन नहीं हुआ और वहां केवल कोकिंग कोयले का उत्पादन होता है।झारिया कोयला क्षेत्र 450 वर्ग किमी. क्षेत्र में विस्तृत है एवं यहाँ से झारखण्ड राज्य का लगभग 50 प्रतिशत कोयला निकाला जाता है। यदि झरिया खान में लगी आग पर काबू पा लिया जाए और इस सुविधा का सही तरीके से उपयोग किया जाए तो इसी खान से ही पूरे स्टील उद्योग को कोयले की आपूर्ति की जा सकती है।इसीतरह कोयलाखानों में अनियंत्रित आग की वजह से रानीगंज कोयलांचल के कोयले का पूरीतरह दोहन असंभव है। पश्चिम बंगाल राज्य का रानीगंज कोयला क्षेत्र ऊपरी दामोदर नदी घाटी में है, जो भारत का सबसे महत्वपूर्ण एवं बड़ा कोयला क्षेत्र है। इसका कुल क्षेत्रफल लगभग 1,500 वर्ग किमी है। इसमें बराकर तथा रानीगंज श्रेणियों का उत्तम कोयला निकाला जाता है। इस क्षेत्र से भारत का लगभग 35 प्रतिशत कोयला प्राप्त होता है।रानीगंज वर्धमान जिले में कोयले की खानों के पास स्थित एक नगर तथा कोयला क्षेत्र है। यहाँ सर्वोत्तम श्रेणी का कोयला तथा कोक बनाने के लिए मिलाने लायक कोयला बेगुनिया, रामनगर तथा लायकडीह खानों में मिलता है। यहाँ की खानें छिछली हैं तथा बिना मंशीन के खुदाई होती है।

कोयलांचल के बीचोंबीच दो बड़े शहरों और घनी आबादी के होने से आग पर नियंतरण के उपाय भी कारगर नहीं होते।अरबों रुपये का अमूल्य कोयला भूमिगत आग में राख हो रहा है।

यह सिर्फ तकनीकी मामला नहीं है कि कोलइंडिया इससे निपट लें।लेकिन इस मसले को सुलझाने में दोनों राज्यों की सरकारें और केंद्र सरकार जिनके मातहत खनन संबंधी मंत्रालय हैं,अभीतक राजनीतिक पहल नहीं कर सकी है।

​​

​झरिया कोयलांचल अपने समृद्ध कोयला संसाधन के लिए प्रसिद्ध है । झरिया के कोयला से कोक बनाने के लिए प्रयोग किया जाता है, जिसका प्रयोग मुख्य रूप से लोह-इस्पात उद्योग में होता है । झरिया कोयलांचल धनबाद शहर और अर्थव्यवस्था के विकास में एक बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, और धनबाद शहर के एक भाग के रूप में माना जाता है। झरिया के शहर के नीचे बेकाबू आग है, जिसको बुझाना मुश्किल है, इस आग ने पूरे शहर को अपने कब्जे मे ले लिया है, जो कि जान माल के लिऐ अत्यन्त असुरक्षित है । इसके कारण झ्ररिया को स्थानांतरित किया जा रहा है।

दूसरी ओर,पश्चिम बंगाल में रानीगंज के हालात भी झरिया से कम बयावह नहीं है। दरअसल रानीगंज आसनसोल कोयलांचल में जमीन के नीचे आग इतनी भयावह है कि धुंए में इलाकावासियों का जीना मुश्किल है।पूरे इलाके में भूमिगत आग के कारण जमीन खिसकती रहती है। जिसकी चपेट में अक्सर आबादी आ ​​ही जाती है। ईस्टर्न कोलफील्ड्स के अंतर्गत इस इलाके में भी पिछले तीन दशकों से जमीन के नाचे की धधकती आग को नियंत्रित करने में कामयाबी नहीं मिली है।झरिया की तरह रानीगंज का भा आसनसोल दुर्गापुर औद्योगिक इलाके के विकास में भारी योगदान है। झरिया की तरह रानीगंज भी कारोबारी शहर है।

दोनों शहरों के लोग दूसरी जगह जाने को तैयार नहीं है। तीन दशकों से जारी लगातार चेतावनियों के बवजूद दोनों शहरों का स्थानांतरण संभव नहीं ​​हुआ है। जनभावनाओं के खिलाफ विशेषज्ञों की चेतावनी को नजरअंदाज करके राज्य सरकारें खतरा को नजरअंदाज करते हुए भारी संकट को न्यौता देने को मजबूर हैं।

कोल इंडिया लिमिटेड झारखंड के झरिया में खनन कार्य शुरू करने के लिए 100 अरब रुपये का निवेश करने का ऐलान २००९ में कर चुकी है। यह राशि खदान में लगी आग पर काबू पाने और खनन के लिए आधुनिक प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल पर खर्च की जानी है। करीब एक लाख परिवारों के पुनर्वास काम मामला झरिया में लंबित है तो रानीगंज में यह संख्या कुछ ज्यादा ही होगी। पर दोनों शहरों में अभीतक ऐसी कोई पुनर्वास योजना को अमल में लाने या उसमें राज्य सरकारों की भागेदारी की सूचना नहीं मिली है।

रानीगंज के सतग्राम और नीमचा कोयला खानों में आग लगने से जनवरी , २००८ में करीब दस हजार लोग प्रभावित हुए। उन्हें ईसीएल परिसर में तदर्थ तौर पर ठहराया गया पर उनको इस खतरनाक इलाके से स्थानांतरित करने के बजाय आग बूझने तक का इंतजार किया गया।

यह एक ​​उदाहरण है। पूरे कोयलांचल में जहां भी आग लगती है यानी जमीन की आग सतह पर आ जाती है या जमीन धंसकने लगती है, तो त्ताकालिक रुप से आबादी को तदर्थ तौर पर हटा दिया जाता है लेकिन पीड़ितों के स्थाई पुनर्वास का इंतजाम नहीं होता। आग पर नियंत्रण पाते ही या धंसान का असर खत्म होते न होते पुरानी आबादी अपनी पुरानी जगह आ जाती है और अगली दुर्घटना का इंतजार करती है। झरिया रानीगंज की रोजमर्रे की जिंदगी यही है।

गौरतलब है कि झरिया रानीगंज कोयला क्षेत्र की आग लगभग एक सदीपुरानी है। पहलीबार कोयलाखदानों में भूमिगत आग के बारे में 1916 में ​​पता लगा था। 1972 तक अकेले झरिया क्षेत्र में 70 से अधिक भूमिगत आग की सूचनाएं मिलीं।

कोयला राज्‍य मंत्री प्रतिक प्रकाशबापू पाटील ने लोकसभा में बताया है कि कोयला खानों के राष्‍ट्रीयकरण के समय, झरिया कोलफील्‍ड्स (जेसीएफ) से 78 आगों की सूचना प्राप्‍त हुई थी जिनमें से 11 स्‍थानों पर आग सुसुप्‍त हैं, 10 स्‍थानों पर आग को बुझा दिया गया है तथा शेष 57 स्‍थानों पर आग सक्रिय है तथा रानीगंज कोलफील्‍ड्स (आरसीएफ) में 7 आगों की सूचना प्राप्‍त हुई थी। मामूली गहराई पर पूर्ववर्ती खान मालिकों द्वारा खनन किये गए भूमिगत कोयला खानों में रानीगंज कोलफील्‍ड्स में आग रानीगंज क्षेत्रों में कई स्‍थानों पर जैसे संकतोरिया गांव, नीमचा, तोपोषी रानीगंज, रातिबाती, सामदी, संग्रामगढ़, आदि में मौजूद है।

झरिया तथा रानीगंज कोयला खानों में आग के मसले का समाधान करने के लिए कोयला मंत्रालय ने भारत कोकिंग कोलफील्‍ड्स लि. (बीसीसएल) के कमान क्षेत्रों में जेसीएफ के इन क्षेत्रों के लिए 7112.11 करोड़ रूपये तथा ईस्‍टर्न कोलफील्‍ड्स लि. (ईसीएल) के कमान क्षेत्रों में आरसीएफ के इन क्षेत्रों के लिए 2661.73 करोड़ रूपये के कुल पूंजी निवेश से बीसीसीएल एवं ईसीएल के लीज होल्‍ड क्षेत्रों में आग, धंसाव एवं पुनर्वासन से निपटने के लिए मास्‍टर प्‍लान का अनुमोदन किया है।

उन्‍होंने यह भी कहा कि देश में खान सुरक्षा तकनीक में पिछले कुछ समय में सुधार हुआ है। लोंगवाल खनन, सतत् खनिक का उपयोग तथा स‍तही निंत्रण प्रौद्योगिकी जैसे प्रौद्योगिकी से खनन की सुरक्षा स्थिति में सुधार आया है। सुरक्षा तकनीकों में प्रमुख सुधार रूफ स्‍ट्रेटा नियंत्रण प्रबंधन, आधुनिक और उन्‍नत उपकरणों का उपयोग कर ज्‍वलनशील तथा विषैली गैसों का शीघ्र पता लगाना, सतत् ऑनलाइन खान वातावरण मॉनिटरिंग प्रणाली, नवीनतम गैस क्रोमेटोग्राफी प्रौद्योगिकी का उपयोग कर बेहतर एवं सटीक खान ऐयर सेम्‍पलिंग, ओपन कास्‍ट में विस्‍फोट को समाप्‍त करने के लिए पारिस्थितिकी के अनुकूल सतह खनिक, स्‍वतंत्र ट्रक प्रेषण प्रणाली (ओआईटीडीएस), ढलान स्‍थायित्‍व रडार (एसएसआर), भूमिगत प्रचालन का यांत्रिकीकरण, प्रशिक्षण एवं कौशल विकास के माध्‍यम से संभव थे।

झरिया तथा इसके आस-पास के क्षेत्रों में लग रही आग को बुझाने में सीधे तौर पर अग्निशमन पद्धतियों का उपयोग करने के लिए आग क्षेत्र का पहुंच में न होना तथा इन क्षेत्रों में अत्‍यधिक आबादी तथा लोगों के रहने के कारण बाधाएं हुई हैं।

Facebook Comments

संबंधित खबरें:

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.