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देश को तैयार करने का तरीका..

By   /  May 3, 2013  /  No Comments

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– जितेन्द्र कुमार ज्योति||

सराय काले खां बस अडडा से पहले सड़क के किनारे हरे-भरे खेत, आलू, बंधगोभी हरी-भरी शाक-सब्जी अनायास ही अपनी ओर आकर्षित  करती है। लेकिन, इस मनमोहक ,आकर्षक और प्राकृतिक केन्द्र में  मेट्रो का नया खंभा यमुना नदी और खेत के बीचोंबीच लगता है मानो, मेहनतकश  किसान के दिल पर चाकू से नए जख्म दे दिए गए हों।farmer

दिल्ली की  तस्वीर है यह । तस्वीर तो कुछ और भी है जहां एक ओर बड़े-बड़े रेस्त्रां, मल्टीकाम्पलेक्स और उंची इमारते दिखती है, वहीं फ्लाय ओवर के नीचे का दृश्य  भी दिखता है जहां बच्चे जन्म भी लेते हैं और उसी जगह से उसकी अर्थी भी उठती है। मसलन,सवाल फिर से वहीं हरे भरे खेत के बीचोबीच मेट्रो के नए खंभे की। मेट्रो के पिलर को विकास के नाम पर हरे भरे खेतों में गाड़ा जाना अतिकष्टदायक है। विकास का आधार  स्थायी हो तो विकास  की परिभाषा  सुनने में, दिखने में, पढने में ज्यादा अच्छा लगता है। मसलन, बिजली, पानी, रोजगार, नारी सुरक्षा के मुददे गंभीर हैं तो किसान मजदूर की समस्या गंभीरता से आगे भी सोचने पर अनायास ही सोचने पर मजबूर कर देता है।

जन्तर मंतर से लेकर देश  के विभिन्न प्रांतो में किसी न किसी संगठन के बैनर तले मजदूर,किसान और गरीब तबका अपने अधिकार की लड़ाई कई वर्शों से लड़ते रहा है परिणाम कहने की शायद आवश्यकता  नहीं। सवाल यह नहीं कि किसान, मजदूर व गरीब तबके की समस्या पर कोई ध्यान नहीं देता। कौन देगा ध्यान?  सत्ता पक्ष या विपक्ष जो  अप्रत्यक्ष तौर पर एक दूसरे का साथ देने का वायदा कर चुका है या वह वर्ग जो सुबह से लेकर शाम तक पैसे कमाने की होड़ में एक दूसरे को मात देने के लिए छल कपट और प्रपंच के नित नए रणनिती बनाते रहता है, सवाल यह है कि किसान, मजदूर, गरीब तबका क्यों अपनी आवाज को सत्ता के केंद्र तक पहुंचा पाने में असमर्थ रहा है?

चुनाव के वक्त बड़ी संख्या में यह वर्ग धूप हो या बरसात में खड़े रहकर मतदान करता है वहीं पैसे के रस में डूबे रहने वाला तबका किसी रेस्त्रां या मल्टीकाम्पलेक्स या मंहगे सिनेमा घर में मौज कर रहा होता है। जब परिणाम सामने आता है ,सरकार बनती है तो मल्टीकाम्पलेक्स या मंहगे सिनेमा घर में मौज करने वाले लोग जिसने अपने मताधिकार का भी प्रयोग नहीं किया यही लोग देश  के नीति-निर्धारक बनते हैं और फसल,खाद,बीज,पानी,बिजली का रेट तय करते हैं। क्या ऐसे में देश  का वास्तविक विकास संभव है? नहीं और नहीं।

दरअसल , एक वास्तविक सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिदृश्य  जो उभरकर सामने आता है वह है ’’पूंजीवाद रूपी दानवीय व्यवस्था’’। भारत पूंजीवाद के तलवे के नीचे पिस रहा है। मसलन,इस व्यवस्था को जबतक जड़ से उखाड़ नहीं दिया जाता है ,अमीरी गरीबी की खाई जो  कई लाखों फीट गहरी हो गई है इसे पाटना शायद  ही संभव हो। जहां एक तरफ एक वर्ग सड़कों पर रात  बिताने पर विवश  है वहीं अंबानी जैसे लोग 22 मंजिल की घर बनाकर जेड कटैगरी की सुरक्षा में गरीब लोगों के खून पसीने पर करोड़ों की गाड़ियां से ऐशो  आराम करता है। किसान आत्महत्या कर लेता है। किसान पानी, बिजली  की मांग करता है तो अरबों की संपत्ति के घमंड मे जनता का नौकर पानी की जगह पेशाब  देने की बात करता है।  मजदूर महीने में एक कटोरा दाल खाने के लिए कई दफे योजना बनाता है और योजना ख्वाब बनकर ही रह जाती है। संभव ही नहीं है एक कटोरा दाल । एक वर्ग को लाठी और बंदूक के सहारे सुरक्षा दी जाती है तो वहीं दूसरी ओर एक वर्ग लाठी और आंसू के गोले खाता  है ।

लाठी और आंसू के गोले खाने के बाद भी जब यह वर्ग अपनी अधिकार की लड़ाई लड़ता है तो नक्सली बनाकर  इन्हें जेल में डाल दिया जाता है। बहरहाल, देश  को तैयार करने में क्रांति की जरूरत है लेकिन इसका आधार क्या हो? आधार यही होना चाहिए ’’क्रांति जनता द्वारा,जनता के हित में।’’

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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