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मीडिया दरबार दो साल का हुआ….

By   /  May 5, 2013  /  10 Comments

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मीडिया दरबार आज दो साल का हो गया और अपने तीसरे साल में प्रवेश कर गया. बीते दो सालों के दौरान मीडिया दरबार ने साबित कर दिया कि वेब मीडिया आर्थिक तौर पर तो ताकतवर नहीं है पर मुद्दों को उठा कर उसे उसकी नियति तक पहुँचाने में पारम्परिक मीडिया से भी ज्यादा सशक्त है. बशर्ते कि मुद्दों को अभियान की तरह चलाया जाये. क्योंकि इस माध्यम के साथ आम लोगों की सीधी भागीदारी है जबकि पारम्परिक मीडिया तक हर पाठक की बात भी नहीं पहुंचती, जो कि वेब मीडिया को वैकल्पिक मीडिया का दर्ज़ा देती है. media-darbar

मीडिया दरबार ने यही किया. जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को पत्र लिख कर विंडसर प्लेस का नाम बदल कर “सर” सोभा सिंह के नाम कर देने की सिफारिश की तो मीडिया दरबार ने देश वासियों को याद दिलाया कि नारियों के खिलाफ सबसे भौंडा लेखन करने वाले खुशवंत सिंह का पिता “सर” सोभा सिंह शहीद भगत सिंह को फांसी के तख़्त तक पहुँचाने में अंग्रेज़ सरकार का सबसे बड़ा सहयोगी रहा था. इसी सोभा सिंह ने अपने एक अन्य साथी “सर” शादी लाल के साथ मिलकर शहीद भगत सिंह की शिनाख्त की थी और शहीद भगत सिंह के खिलाफ कोर्ट में गवाही देकर क्रांतिकारियों के खिलाफ़ अंग्रेज़ सरकार के नापाक मंसूबों को पूरा किया था. जब भारत वासियों को भारत के इस गद्दार के सनसनीखेज़ इतिहास का पता चला तो देश भर में सरदार मनमोहन सिंह और खुशवंत सिंह की इस इच्छा के विरोध में आवाजें उठने लगी.

cartoonफेसबुक पर तो जैसे एक भूचाल आ गया. भगत सिंह क्रांति सेना के तेजिन्द्र सिंह बग्गा ने सक्रिय हो दिल्ली में जगह जगह धरने प्रदर्शन किये तो पंजाब में भी लोग सड़कों पर उतर आये. सोशल मीडिया पर तो हंगामा मच गया और आम जन अपने अपने तरीके से विरोध जताने लगा. देशभर से विरोध की आवाजें उठने पर गृह मंत्रालय ने खुशवंत सिंह की गद्दार को हीरो बनाने की इस कुत्सित इच्छा को नकार दिया.

इसके बाद निर्मल बाबा और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की मिली भगत से देश के लाखों लोगों को हास्यास्पद नुस्खे बता कर आर्थिक चूना लगाने की पूरी कथा निर्मल बाबा के इतिहास के साथ मीडिया दरबार ने अपने पाठकों के समक्ष रखी तथा अवगत करवाया कि कैसे ईंट का भट्ठा बिठाने के बाद भोले भाले लोगों का भट्ठा बिठा रहे थे ये महाशय और विभिन्न टीवी चैनलों को निर्मल बाबा के कार्यक्रम रुपी विज्ञापन बंद करने पर मजबूर किया.

मीडिया दरबार द्वारा खोली गयी इस पोल का वेब मीडिया ने पूरा साथ दिया. जब वेब मीडिया पर nirmal-babaनिर्मल बाबा के खिलाफ तूफ़ान आ गया तो प्रिंट मीडिया भी मीडिया दरबार के इस अभियान का हिस्सा बन गया. नतीज़न इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को भी निर्मल दरबार की जगह मीडिया दरबार का साथ देना पड़ा और अब खुद निर्मल बाबा को चार समोसे हरी चटनी के साथ खुद खाने और चार समोसे पड़ोसियों को भी खिलाने की जरूरत आन पड़ी है. कई राज्यों में धोखाधड़ी के मुकद्दमों में फंसे और बड़ी मुश्किल से जेल जाने से बचे. अब दिल्ली उच्च न्यायालय से निर्मलजीत नरूला उर्फ़ निर्मल बाबा पर बेतुके उपाय बताने पर पाबंदी है.

इसके अलावा हरियाणा के “अपनाघर सेक्स स्कैंडल” और पूर्व एयर होस्टेस गीतिका आत्महत्या प्रकरण में गोपाल कांडा की असलियत सामने लाया और नारी सम्मान की रक्षा के लिए मीडिया दरबार बेहतरीन मंच बतौर सामने आया.

वेब मीडिया के कुछ साथियों पर आये संकट में मीडिया दरबार ने तथ्यात्मक रिपोर्टिंग कर इन साथियों के पक्ष में आवाज बुलंद की. राजनामा.कॉम के संपादक मुकेश भारतीय को झारखण्ड पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिए जाने पर जो तथ्य मीडिया दरबार पर प्रस्तुत किये, उसे झारखण्ड की अदालत ने भी माना. मीडिया दरबार पर प्रकाशित पृष्ठों के प्रिंट आउट पेश होने पर अदालत ने मुकेश भारतीय को तुरंत जमानत दे दी.

सिर्फ मुकेश भारतीय ही नहीं बल्कि भड़ास के संपादक यशवंत सिंह को इंडिया टीवी के विनोद कापड़ी द्वारा रंगदारी के झूठे मामले में गिरफ्तार करवाने पर भी मीडिया दरबार यशवंत सिंह के समर्थन में आवाज़ बुलंद करता रहा.

दुसरी तरफ लखनऊ के शलभमणि त्रिपाठी प्रकरण की असलियत जब मीडिया दरबार ने सामने रखी तो मायावती सरकार ने भी मीडिया दरबार पर अपना पूरा भरोसा जताया.

मीडिया दरबार द्वारा चलाये गए मुद्दा आधारित अभियानों को फेसबुक के मित्रों का भरपूर सहयोग मिला. फेसबुक पर मीडिया दरबार को अच्छा खासा समर्थन मिला. मीडिया दरबार टीम के सदस्यों को फेसबुक पर उनके कई हज़ार मित्रों का सक्रिय सहयोग मिलता रहना मीडिया दरबार की सफलता का सबसे बेहतरीन कारण रहा. मीडिया दरबार अपने सभी लेखकों, समर्थकों और सहयोगियों का तहे दिल से आभारी है.

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

10 Comments

  1. ASHOK SHARMA says:

    आपसे इमानदार पत्रिकारिता की आशा और विश्वाश के साथ [अशोक शर्मा ]

  2. Ashok Sharma says:

    congratulation and I hop honest jurnalisam.

  3. Kumar Rajnish says:

    bahut shubhkamnayein!

  4. Kumar Rajnish says:

    bahut bahut bandhai!

  5. Dilip sikarwar says:

    कौन कहता आसमान में सुराख नहीं हो सकता …एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों.. आपकी पहल लोगों की आवाज़ बनी. पूरी टीम को हार्दिक बधाई!
    दिलीप सिकरवार
    09425002916

  6. MANGE RAM TANWAR says:

    बेवाक बात कहने और जन भावना को प्रदर्शित कर दो साल पुरे करने के लिए बधाई I

  7. आपको बहुत बहुत बधाई, समझा जा सकता है कि आपने किन चुनौतियों से मुकाबला करते हुए यह मुकाम हासिल किया है, आपको साधुवाद

  8. Ashok Gupta says:

    kis bate ki badhi media too 4-5 ko bethaker aapas me lervane ka kame kerta hai

  9. mahendra gupta says:

    बेवाक बात कहने और जन भावना को प्रदर्शित कर दो साल पुरे करने के लिए बधाई

  10. बेवाक बात कहने और जन भावना को प्रदर्शित कर दो साल पुरे करने के लिए बधाई.

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