/कोयला माफिया के साथ चिटफंड का साझा कारोबार..

कोयला माफिया के साथ चिटफंड का साझा कारोबार..

कोयलांचल में बेइंतहा पैसे को किसी भी स्विस बैंक से ज्यादा सुरक्षित ढंग से छिपा और खपा सकते हैं!

-एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास​||

कोलगेट को लेकर प्रधानमंत्री के इस्तीफे की मांग जोरों पर है। कोलगेट को लेकर सीबीआई आरोपों के घेरे में है। कोयलांचल का भूगोल आदिवासी बहुल इलाकों में महाराष्ट्र , छत्तीसगढ़, उत्तरप्रदेश से लेकर उड़ीसा, बिहार, झारखंड, असम और बंगाल तलक विस्तृत है। पूरे कोयलांचल में कोयला ब्लाकों के वितरण के लिए सर्वोच्च स्तर पर भ्रष्टाचार की कलई तो अब खुलने लगी है।

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लेकिन कोयलांचल में जिस तरह संवैधानिक प्रावधानों की हत्या करके पांचवी छठी अनुसूचियों, संविधान की धारा ३९ बी और सी, मौलिक अधिकारों, स्वायत्त निकायों, वनाधिकार कानून, खनन अधिनियम, पर्यावरण कानून के खुले उललंघन के तहत माफिया राज कायम है, बेदखली, उत्पीड़न और अपराध का अनंत सिलसिला है, उसका अभी खुलासा हुआ नहीं है। धनबाद झरिया हो या कोरबा या फिर बंगाल में आसनसोल रानीगंज, सर्वत्र माफिया राज कायम है, जिसके तार देश के सर्वोच्च नेतृत्व से जुड़ता है।वर्षो पहले इसके उत्खनन से लेकर लोडिंग तक माफिया तत्व इस पर हावी रहते थे। कोयले की काली कमाई के लिए वे आपस में लड़-भिड़कर जन सामान्य के लिए भी मुसीबतें पैदा करते थे। अब नई पीढ़ी तैयार हो गई है, जो सक्रिय राजनीति की ओट में कोयले की कमाई पर आधिपत्य के लिए परस्पर खून की होली खेल रही है।

शारदा समूह के भंडाफोड़ और इसी सिलसिले में सुदीप्त, देवयानी और मनोज से सघन पूछताछ से जहां राजनीति में चिटफंड के पैसे का ​​मुनाफाखोर निवेश, मंत्री से लेकर संतरी तक को पे रोल में रखने का खुलासा हुआ है और सीबीआई असम से लेकर अरुणाचल में घोड़ों की​​ मंडियों की खबर ले रही है, उसी तरह पता चला है कि तमाम राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में सत्तावर्ग की मिलीभगत से चिटफंड का पैसा लगा है। माओवाद, अलगाववाद, उग्रवाद से लेकर राजनीतिक अस्थिरता और सत्ता बदल , सामाजिक इंजीनियरिंग चिटफंड कंपनियों की मेहरबानी पर निर्भर है।कोयले की माफियागिरी और इसके कारण अकूत धन राशि कमाने के साथ-साथ क्षेत्रीय लोगों को सब्जबाग दिखाकर उनका जन समर्थन हासिल करने की यह वह कहानी है, जो इसमें संलग्न माफिया को बड़ी पंचायत तक भी पहुंचाती रही है।

24-chit-fund-scamअब पुलिस अंधेरे में तीर चलाकर शारदा समूह की संपत्ति की खोज में लगी है। अबतक करीब २३० खातों का पता चला है। इनमें से १८० खातों का स्टेटमेंट पुलिस के हाथों में है , जिनके मद्देनजर रिकवरी की कोई संभावना दूद दूर तक नहीं है।

संचयिनी और ओवरलैंडज के मामलों में जैसे बाजार से रिकवरी कर ली गय़ी थी, अब वह असंभव है।

क्योंकि शारदा समूह समेत तमाम चिटफंड कंपनियों का पैसा ऐसे माओवादी, उग्रवादी, राष्ट्रविरोधी और माफिया तत्वों के हवाले हैं, जिनके लिए भारतीय संविधान और कानून का राज बेमतलब है। पुलिस और माडिया में कयास लगाया जा रहा है कि सुदीप्त ने हो सकता है कि हवाला और हुंडी के मार्फत सारा पैसा विदेश पहुंचा दिया है। लेकिन इस दिशा में कोई तहकीकात हो नहीं रही है कि किस तरह मुंबई के अंडरवर्ल्ड से लेकर तमाम कोयलांचलों में सक्रिय छोटे बड़े माफिया गिरोहों की साझेदारी में यह कारोबार चल रहा है।

एजेंटों की चेन ही सबकुछ नहीं है। चिटफंड कंपनियों के तुरुप का पत्ता है माफिया और आपराधिक नेटवर्क, जिसमें सबसे बड़ी भूमिका झारखंड और बंगाल के कोयला माफिया गिरोहों की है। वे जबरन कोयला खनिकों और मजदूरों से हफ्ते से लेकर अपने अपने इलाके के तमाम लोगों को न केवल इन कंपनियों में में उनकी अनिच्छा के ​​बावजूद निवेश करने के लिए बाध्य कर सकते हैं, ठीक उसी तरह बेइंतहा पैसे को किसी भी स्विस बैंक से ज्यादा सुरक्षित ढंग से छिपा और खपा सकते हैं।

मुंबई का अंडरवर्ल्ड​ ​ चिटफंड के पैसों से न केवल फलफूल रहा है, बल्कि निरकुंश है। फिल्मकार अनुराग कश्यप की कृपा से बाकी देश को `वासेपुर गैंगस्टर्स’ के जरिये कोयलांचल के इस सर्वशक्तिमान माफियाराज की एक झलक भर मिली है, लेकिन यहां रोजाना `शूटआउट लोखेंडावाला’ और शूटाउट वडाला’ का नजारा है। बीसीसीएल के विभिन्न क्षेत्रों में वर्चस्व कायम करने के लिए आए दिन संघर्ष होते रहे हैं, लेकिन सुरक्षा कर्मी घटना के बाद ही हाथ सेंकने की नीयत से आगे बढ़ते हैं। ​

अकेले झारखंड में सालाना लगभग 7,20,000 टन कोयला तस्करी होता है. इसमें 50 हजार से ज्यादा लोग शामिल हैं. माफिया के हिस्सेदारों में कोयला कंपनियों के अधिकारी, कर्मचारी, पुलिस और नेता सब शामिल हैं।रांची, रामगढ़, हजारीबाग, गिरिडीह, धनबाद, बोकारो की बंद पड़ी सैकड़ों कोयला खदानें हजारों लोगों की आजीविका का स्रोत बन गई हैं। सीसीएल और बीसीसीएल के खनन कार्य पूर्णत: समाप्त होने के बाद इन खदानों पर स्थानीय कोल माफिया का कब्जा हो जाता है। कोयला कंपनियां खुली खदानों में एक सीमा के बाद दोहन करने से बचती है. यह सुरक्षा की दृष्टि से भी जरूरी है। पंचवर्षीय निर्देशों के हिसाब से कंपनियों को खनन कार्य समाप्त करने के बाद इन खदानों को पूर्णरूपेण भरने का नियम है। मगर, ज्यादातर कोल कंपनियां ये काम नहीं करतीं। अनुमान है कि झारखंड में ऐसे 2,000 से ज्यादा छोटी-बड़ी कोयला खदानें हैं। अपने इलाके का दबंग कोयला माफिया इन बंद पड़ी खदानों पर कब्जा जमा लेता है।खनन मजदूर दैनिक मजदूरी पर बहाल कर लिए जाते हैं। इन मजदूरों में कोल कंपनी के ठेका मजदूर भी होते हैं।

कोयला मंत्रालय इसलिए सबसे मालदार मंत्रालय है, जिसकी कालिख से दिशम गुरु शिबू सोरेन जैसे किंवदंती का भी त्रासद अवसान हो गया। यह कोयला माफिया की असीम ताकत का ही सबूत है। कोल इंडिया के दफ्तर में इन माफिया राजनीतिक गिरोहों, बाहुबलियों और धनपशुओं की मर्जी के बिना पत्ता तक नहीं खड़कता। आदिवासी और कोयला खनिक , मजूर तबका से लेकर सभी कोयलांचल के वाशिंदों के लिए रोजमर्रे की जिंदगी में कोयले की कालिख, भूमिगत आग की आंच और खून के छींटों से बचना असंभव है। कोयलांचल में रिहाइश का मतलब है कि दहशत की गुफाओं में बसना, जहां कहीं भी खूंखार जंगली जानवर आखेट की मुद्रा में शिकार की तलाश में है।​उड़ीसा की खदानों से हो रही कोयला चोरी पर लगाम लगाने में एमसीएल अधिकारी और पुलिस प्रशासन नाकाम साबित हो रहे हैं। धड़ल्ले से चल रहे कोयले के अवैध व्यापार से कंपनी को करोड़ों का चूना लग रहा है। नेताओं के संरक्षण में इस धांधली को और बढ़ावा मिल रहा है…

बीते कुछ सालों में उड़ीसा के झारसुगुडा और अंगुल जिलों समेत कई जगहों पर कोयला चोरी में लिप्त सैकड़ों लोग पकड़े गए और हजारों टन कोयला जब्त किया गया, लेकिन प्रशासन और खनन अधिकारी कोयला चोरी को रोकने में विफल रहे हैं…

​​​खनन के बाद खानों में बालू भरना हो या कोयला ढुलाई, खानों में आग निभाने का काम हो या कोल वाशरी, चालू कोयला खानों को अवैध घाषित करके बंद खानों से अवैध खनन हो या ट्रेड यूनियनें- कोयलांचल की तमाम गतिविधियों में कोयला माफिया का वर्चस्व है। काम किये बिना मशीन दिखाकर बिल पास करवाने, फरजी निविदा के जरिये ठेका वसूलने और फिर बिना काम किये भुगतान हासिल करने की यहां राष्ट्रीयकरण के बाद से अटूट सिलसिला है, जिसमें राजनीतिक दलों और ट्रेड यूनियनों की भी भागेदारी है।झारखंड में कोयला माफिया और पुलिस के गठजोड़ से संगठित अपराध का यह नायाब तरीका तैयार हुआ है।​ बताया जाता हे कि मुख्यमंत्री के एक करीबी एसपी ने इस डिस्को पेपर की शुरुआत वर्ष 2000 के आस-पास की थी।​धनबाद से डिस्को पेपर के बल पर कोयला उत्तर प्रदेश की चीनी मिलों, कोयला मंडियों और स्पंज आयरन फैक्ट्रियों में पहुंचता है।​ डिस्को पेपर पर कोयला तस्करी का कारोबार लगभग 400 करोड़ रुपये का है।​ डिस्को पेपर से कोयला के अवैध कारोबार की शुरुआत एक मैनेजर ने की थी।​ बाद में इकबाल और अल्लाहरक्खा जैसे शातिर भी जुड़ गए।​ बाद में मैनेजर बड़बील (उड़ीसा) में एक फैक्ट्री का मालिक बन गया।​बड़े कोयला माफिया ‘डिस्को पेपर’ का इस्तेमाल करते हैं। डिस्को पेपर दरअसल अवैध रोड परमिट है, जिसकी मान्यता धनबाद से वाराणसी तकसभी थानों में है। कोयला माफिया का एजेंट कभी नीले, कभी पीले तो कभी सफेद रंग के पेपर पर बंद ट्रकों के नंबर और एजेंट का नाम तथा मुहर अंकित करता है।माफिया का एक और तंत्र रेलवे वैगनों से कोयला चोरी के रैकेट के तौर पर फल-फूल रहा है। गरीब और कमजोर तबके के लोगों को इस काम में इस्तेमाल किया जाता है। रैकेट का संचालक कोई बड़ा आदमी होता है, जिसका नेटवर्क रांची, बोकारो, हजारीबाग, रानीगंज, वर्दवान, बनारस, लखनऊ, रायपुर, उड़ीसा तक फैला होता है।
यह किस्सा कोरबा, धनबाद झरिया और रानीगंज आसनसोल में सर्वत्र लागू है। खान सुरक्षा निदेसालय हो या कोलियरी दफ्तर या फिर कोलकाता में कोल इंडिया का सदर दफ्तर, मर्जी तो कोयला माफिया की ही चलती है। केंद्र और राज्यसरकारों की जानकारी में, तमाम केंद्रीय एजंसियों की मौजूदगी क ममें यह कारोबार चल रहा है। ​

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कोयला मापिया की शक्ति का अंदाजा लगाने के लिए एक उदाहरण पेश है। कोयला माफिया तथा अवैध व्यापारियों से परेशान देश की एक प्रमुख कोयला कंपनी ने आगाह किया है अगर यही हालात रहे तो कोयले की आपूर्ति बाधित होने से बिजली संकट और गहरा सकता है। पश्चिम बंगाल और झारखंड में कोयला निकालने वाली सरकारी क्षेत्र की इस कंपनी का कहना है कि कोयला माफिया और असामाजिक तत्वों के चलते हर माह उसका 40 हजार टन कोयले का उत्पादन प्रभावित हो रहा है। आस पास के बिजलीघरों और बड़े कारखानों को कोयला आपूर्ति बनाए रखने में उसे मुश्किल हो रही है। इंस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (ईसीएल) के बयान में कहा गया है कि उसकी खदानों में उत्पादन कोयला माफिया तथा कुछ स्थानीय समूहों ने जबरदस्ती बंद करवा रखा है। वहीं अवैध व्यापारी अवैज्ञानिक तथा खतरनाक तरीके से खनन कर रहे हैं जिससे आसपास की बस्तियों, खेतों व ईसीएल की उत्पादनशील खदानों पर खतरा मंडराने लगा है। बयान में कहा गया है कि ईसीएल को उत्तरी सियारसोल व नारयणकुडी खनों से ही हर महीने लगभग 12 करोड़ रूपये का नुकसान हो रहा है और सरकार को रायल्टी के रूप में आय घटी है। कंपनी ने आगाह किया है कि अगर हालात नहीं सुधरे तो देश में बिजली संकट और गहरा सकता है। विग्यप्ति में यह भी कहा गया है कि कंपनी ने स्थानीय प्रशासन को स्थिति से कई बार अवगत करा चुकी है। उत्पादन प्रभावित होने से कंपनी की माली हालत पर असर पड़ रहा है जो पहले से ही खराब है।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.