/वंदेमातरम् : धर्म नही देश पहले है..

वंदेमातरम् : धर्म नही देश पहले है..

– राजीव गुप्ता||

बसपा के माननीय सांसद शफीकुर्रहमान बर्क कहते है, ‘यह सच है कि मै सांसद हूँ, पर मुसलमान पहले हूँ. मै इस्लाम के खिलाफ नही जा सकता. इसलिए मै लोकसभा छोड़कर चला गया. अगर भविष्य में भी ऐसी स्थिति आई तो मैं वही करूंगा, जो आज किया है.’ समाजसेवी श्री अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के वंदेमातरम्-नाद को अभी देश की जनता भूल भी नही पायी होगी कि श्री अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के उसी ‘वंदेमातरम्-नाद’ पर ही विवाद खडा हो गया. दरअसल यह सारा विवाद 8 मई 2013 को खडा हुआ. देश की सबसे बडी पंचायत अर्थात लोकसभा को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित किए जाने से पहले सदन में ‘वंदेमातरम्’ की धुन बजायी गई. धुन बजने के दौरान संभल से बहुजन समाजवादी पार्टी के माननीय सांसद श्री शफीकुर्रहमान बर्क सदन से उठकर बाहर चले जाते है. लोकसभा अध्यक्षा मीरा कुमार माननीय सांसद के इस कदम पर कड़ी नाराजगी जाहिर करते हुए उन्हें भविष्य में ऐसा नहीं करने की सख्त चेतावनी देते हुए कहती है कि ‘एक माननीय सांसद वंदेमातरम् की धुन बजने के दौरान सदन से बाहर चले गए. मैंने इसका गंभीर संज्ञान लिया है. मैं जानना चाहूंगी कि ऐसा क्यों किया गया. ऐसा आगे कभी भी नहीं होना चाहिए.’ राजनेताओ की इस पूरे वाकया पर टिप्प्णियाँ आती है. barkपूर्व लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी भी बर्क के इस व्यवहार से असहमत है. पूर्व केन्द्रीय मंत्री आरिफ मुहम्मद खान जी कहते है कि दुनिया के हर मजहब मे मातृभूमि के प्रति आदर, सम्मान, समर्पण की व्यवस्था है. जो मातृभूमि का आदर नही कर सकता उससे कानून द्वारा कराया जा सकता है. बसपा के माननीय सांसद द्वारा उठाये गये इस अपमानजनक कदम पर कांग्रेस के नेता और देश के विदेश मंत्री श्री सलमान खुर्शीद ने कहा कि वंदेमातरम् गाना कतई बुरा नही है. उन्होने यह भी कहा कि जमीयत उलेमा-ए-हिन्द ने भी वंदेमातरम् को राष्ट्रीय गीत के रूप मे स्वीकार कर लिया था. ध्यान देने योग्य है कि 4 नवंबर 2009 को देवबंद मे उलेमाओ ने वंदेमातरम् न गाने का एक प्रस्ताव पारित किया था. जिस पर राष्ट्रवादी विचारधारा के लोगो ने कडी आपत्ति जताई थी. भारतीय जनता पार्टी के नेता श्री सैयद शाहनवाज हुसैन ने कहा कि सदस्यों को राष्ट्रीय गीत के अपमान का कोई अधिकार नहीं है. परंतु अभी इस गंभीर मुद्दे पर बीएसपी की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं दी गई. इसके उलट माननीय सांसद शफीकुर्रहमान बर्क ने देश से माफी मांगने की बजाय अपनी हेकडी जमाते हुए ऐसा तर्क दिया है, जिससे विवाद और बढ गया. देश की भावनाये आहत हो रही है.

वंदेमातरम् का इतिहास

डा. भूपेन्द्र नाथ अपनी पुस्तक मे लिखते है कि 1760 मे एक बार भारत मे भयंकर अकाल पडा. उस समय भारत मे ईस्ट इंडिया का राज था और अंग्रेजो के खिलाफ संयासी अपने उद्घोष मे ‘ओम वंदेमातरम्’ कहा करते थे. 1866 के ओडिशा के अकाल को देखकर चिंतित हुए बंकिम चन्द्र ने एक उपन्यास लिखना प्रारंभ किया और 1882 मे उन्होने ‘वंदेमातरम्’ को अपने उपन्यास ‘आनन्द मठ’ मे शामिल कर लिया. कालांतर मे महर्षि अरविन्द ने वंदेमातरम् को नये-मंत्र की संज्ञा दी. यह पवित्र मंत्र ‘वंदेमातरम्’ कोलकाता मे भारतीय कांग्रेस के दूसरे अधिवेशन मे पहली बार गाया गया. 28 दिसंबर, 1896 को कांग्रेस के अधिवेशन मे श्री रविन्द्रनाथ ठाकुर ने स्वयं ही वंदेमातरम् को संगीतबद्ध कर दिया, और उसी अधिवेशन मे वंदेमातरम् को हर अधिवेशन गाने के प्रस्ताव को सर्वसम्मति से पारित कर दिया गया. 1905 मे बंग-भंग के आन्दोलन मे वंदेमातरम् नामक इस मंत्र का ऐसा जादू चला कि इसके उद्घोष ने ब्रिटिश सरकार की चूले हिला दी. हालत यह हो गयी थी कि हर वंदेमाbandematramतरम् बोलने वाले व्यक्ति को ब्रिटिश हुकुमत जेलो मे बन्द कर देती थी. हलाँक 1905 मे बनारस के अधिवेशन मे कुछ विवाद खडा हो गया था, परंतु उस विवाद को सुलझा लिया गया था और श्रीमती सरला देवी चौधरानी जी ने पूरा वंदेमातरम् गाया. 1906 मे जब ब्रिटिश सरकार ने वंदेमातरम् बोलने पर अडचन डालनी चाही तो आनन्द बाज़ार पत्रिका के संपादक श्री मोतीलाल घोष ने यहाँ तक कह दिया था, ‘चाहे गर्दन रहे या न रहे परंतु मैं तो वंदेमातरम् गाउंगा.’ गाँधी जी के 1920 के असह्योग आन्दोलन का प्रमुख नारा यही था. 1922 तक कांग्रेस के हर अधिवेशन मे वंदेमातरम् को गाया जाता रहा. यहाँ तक कि महात्मा गाँधी जी, दक्षिण अफ्रीका से लौटने के लगभग 2 वर्षो तक अपने सभी पत्रो का अंत वंदेमातरम् से ही करते थे. 1 जुलाई 1931 को गाँधी जी ने हरिजन मे भी लिखा, ‘मुझे कभी नही लगा कि वंदेमातरम् हिन्दुओ का गीत है. दक्षिण भारत के राष्ट्र कवि सुब्रह्मण्यम भारती ने खुद लिखा, ‘ आओ इसकी अर्चना करे हम वंदेमातरम्.’ विपिन चन्द्र पाल, लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक लाला हरदयाल, महर्षि अरविन्द जैसे स्वतंत्रता सेनानियो ने वंदेमातरम्-गान को अंगीकृत किया.

वंदेमातरम् का विरोध

1908 मे मुस्लिम लीग ने अपने अमृतसर अधिवेशन मे सबसे पहले इस वंदेमातरम् – गान का विरोध किया और 1937 तक आते-आते यह उसके एजेंडे का विषय बन गया. कम्युनिष्ट विचारधारा के मानने वालो ने वंदेमातरम्-गान की जगह इंकलाब-जिन्दाबाद को अपनाया. 1923 मे मोहम्मद अली जो कि कांग्रेस के इस अधिवेशन के अध्यक्ष थे, ने वंदेमातरम् के गान का जोरदार विरोध किया. वंदेमातरम्-गान का विरोध इतना अधिक बढ गया कि कांग्रेस के हरिपुर अधिवेशन मे वंदेमातरम्-गान पर विचार करने हेतु 4 लोगो की एक समिति बनायी गयी और इस समिति ने यह तय किया कि वंदेमातरम्-गान के पहले 2 पद ही गाये जायेंगे.

स्वतंत्रता-पश्चात

14 अगस्त 1947 की मध्य रात को भी वंदेमातरम् के 2 पद गाये गये. भारतीय संविधान द्वारा वंदेमातरम् को भी राष्ट्रीय गान की तरह राष्ट्रीय गीत का दर्जा दिया गया. परंतु इसे देश का दुर्भाग्य ही कहेंगे कि वर्तमान के राजनेता वंदेमातरम्-गान को धर्म से जोडकर देखने लगे है जबकि वंदेमातरम्-गान स्वतंत्रता-प्राप्ति का सिद्ध मंत्र था. मई 1965, मे भारत के तीसरे कानून आयोग की 28वीं रिपोर्ट (दि इंडियन ओथ्स एक्ट 1873) पेश की गई, जिसके चेयरमैन जस्टिस जे.एल.कपूर थे. इस रिपोर्ट मे हिन्दू-मुश्लिम दोनो के लिये भारत के शपथ-फार्म मे यह स्पष्ट लिखा गया है कि मैं ईश्वर की शपथ लेता हूँ कि जो कहूंगा, सच कहूंगा. कुछ इसी तरह की अर्हता-संबंधी बात जन-प्रतिनिधियो के लिये संविधान के अनुच्छेद 84(क) और अनुच्छेद 173 (क) मे तथा संविधान की तीसरी अनुसूची मे यह साफ-साफ लिखा गया है कि “मै, अमुक, जो राज्य सभा (या लोक सभा) का सद्स्य निर्वाचित (या नामनिर्देशित) हुआ हूँ, ईश्वर की शपथ लेता हूँ कि मै विधि द्वारा स्थापित भारत के संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा रखूंगा, मैं भारत की संप्रभुता और अखंडता अक्षुण्ण रखूंगा तथा जिस पद को मैं ग्रहण करने वाला हूँ उसके कर्तव्यों का श्रद्धापूर्वक निर्वहन करुंगा.” यही शपथ बहुजन समाजवादी पार्टी के माननीय सांसद श्री शफीकुर्रहमान बर्क जी ने भी ली है. उनके इस अपमानजनक कृत्य से क्या यह मान लिया जाय कि इन्होने विधि द्वारा स्थापित भारत के संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा की झूठी कसम खायी थी, क्योंकि इन्होने अपने इस दंभ के चलते देश की जनता को और उन महान हुतात्माओ को जिन्होने देश को स्वतंत्र कराने हेतु अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया, को भी लजा दिया. अब समय आ गया है कि संसद यह सुनिश्चित करे कि किसी भी ‘राष्ट्रीय-मानको’ का अपमान किसी भी सूरत-ए-हाल मे सहन नही किया जायेगा.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.