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बंसल और अश्विनी मंत्रीमंडल से हटाए गए…

By   /  May 11, 2013  /  5 Comments

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आखिरकार अपनी और साथ ही सरकार की तमाम छीछालेदर के बाद रेल मंत्री पवन कुमार बंसल और कानून मंत्री अश्विनी कुमार केंद्रीय मंत्री परिषद से विदा हो गए. इन दोनों दागी मंत्रियों के इस्तीफे तब हुए जब खुद सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री के आवास जाकर उनसे इसके लिए कहा. माना जाता है कि राहुल गांधी भी इन दोनों मंत्रियों की छुंट्टी होते हुए देखना चाहते थे. रिश्वत लेकर प्रमोशन करने के मामले में फंसे रेल मंत्री पवन बंसल शुक्रवार रात प्रधानमंत्री आवास गए और वहां से निकलते ही अपने इस्तीफे की पुष्टि कर दी, लेकिन कोयला घोटाले की सीबीआइ जांच रपट में छेड़छाड़ करने के गंभीर आरोप से घिरे कानून मंत्री अश्विनी कुमार प्रधानमंत्री के समक्ष अपने बचाव में दलीलें देते रहे. इसके चलते कुछ क्षणों के लिए यह भ्रम फैला कि शायद एक कुमार गए और दूसरे बच गए. अंतत: अश्विनी कुमार के इस्तीफे की भी पुष्टि हुई. यह पहली बार है जब भ्रष्टाचार के अलग-अलग मामलों से घिरे दो केंद्रीय मंत्रियों को एक साथ इस्तीफे देने पड़े हैं.bansal-ashwini-minister10

इस मामले पर भाजपा प्रवक्ता शाहनवाज हुसैन ने कहा कि आखिरकार सरकार को अपनी गलती मानकर भ्रष्ट मंत्रियों पर कार्रवाई करनी पड़ी. हम जानना चाहते हैं कि कानून मंत्री किसे बचाना चाह रहे थे. भाजपा सिर्फ दो मंत्रियों के इस्तीफे पर चुप नहीं रहेगी.

सूत्रों के मुताबिक, कांग्रेस आलाकमान की प्रधानमंत्री से मुलाकात के बाद ही पवन कुमार बंसल और अश्विनी कुमार को इस्तीफे का फरमान सुना दिया गया था. लिहाजा रात करीब 8:30 बजे दोनों प्रधानमंत्री से मिलकर अपना इस्तीफा सौंपने गए. बंसल ने तो जल्दी ही वहां से निकलकर अपने इस्तीफे की पुष्टि कर दी, लेकिन अश्विनी को लेकर असमंजस की स्थिति बनी रही. उनके इस्तीफे में इसलिए देर हुई, क्योंकि वह प्रधानमंत्री को यह समझाने की कोशिश में लग गए कि उन्हें कानून मंत्री की कुर्सी क्यों नहीं छोड़नी चाहिए. हालांकि प्रधानमंत्री अश्विनी कुमार के प्रति शुरू से ही नरमदिली दिखा रहे थे, लेकिन सोनिया गांधी के स्पष्ट रुख के चलते उनकी दाल नहीं गली.

दरअसल, सोनिया गांधी इस नतीजे पर पहुंच गई थी कि इन दागी मंत्रियों के कारण कांग्रेस की साख पर बंट्टा लग रहा है और कर्नाटक जीत की आड़ लेना व्यर्थ है.

बंसल के हटने के साथ ही केंद्रीय श्रम मंत्री मल्लिकार्जुन खड़गे व भूतल परिवहन मंत्री सीपी जोशी में किसी एक को अगला रेल मंत्री बनाने की भी चर्चाएं शुरू हो गई हैं. बताते हैं कि रिश्वत कांड में बंसल के भांजे की गिरफ्तारी के बाद खुलती परतों के साथ ही उन पर कार्रवाई की जमीन तैयार हो गई थी. जबकि कानून मंत्री का मामला भी गंभीर था, फिर भी उनके मामले में प्रधानमंत्री अनिच्छुक थे.

इन स्थितियों के बावजूद बंसल और अश्विनी पर तत्काल कार्रवाई महज इसलिए नहीं हुई, क्योंकि कांग्रेस इसका श्रेय विपक्ष और खासतौर से भाजपा को नहीं देना चाहती थी. चूंकि अब संसद सत्र खत्म हो चुका है और कर्नाटक विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की बड़ी जीत के साथ उसका मुख्यमंत्री भी तय हो गया है. लिहाजा अब कांग्रेस और सरकार ने बंसल और अश्विनी की ‘फाइलों’ का निस्तारण कर दिया.

पार्टी ने शुक्रवार को दिन में ही दोनों मंत्रियों पर कार्रवाई के संकेत दे दिए थे. कांग्रेस प्रवक्ता भक्तचरण दास ने बंसल और अश्विनी पर पत्रकारों के सवाल के जवाब में कह दिया था,’ कांग्रेस किसी भी प्रकार के भ्रष्टाचार को नहीं बर्दाश्त करने वाली है. जो कोई भी किसी भ्रष्टाचार या किसी गड़बड़ी में शामिल है, उसे नहीं छोड़ा जाएगा’. उन्होंने यह भी जोड़ा कि कांग्रेस ने भ्रष्टाचार के मुद्दे को हमेशा गंभीरता से लिया है और बंसल व अश्विनी के मामले को भी गंभीरता से देख रही है.

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

5 Comments

  1. ज्यादा भावुक मत होइए जनाब,ये कोई भी दूध के धुले नहीं.बड़ी मज़बूरी थी जो इस्तीफा देना पड़ा, जैसे य़ेड्डी को.सब अपने को आदर्श का पुतला बताते हैं,पर है कोई नहीं.हमाम में यह सब नंगे हैं.

  2. Ramesh Kumar Thakur says:

    श्री नितिन गडकरी जी के कर्णधार, माननीय यदुरप्पा जी के पोषक, भारतीय जनमानस से अपने आप को ऊपर समझने वाले अहंकारी प्रवृति के प्रतिमूर्ति, और असहाय ,किंकर्तव्यविमूढ़, विचारशून्यता से ओतप्रोत एक तथाकथित राष्ट्रीय धर्मान्ध राजनीतिक के अध्यक्ष तथा दल के लिय एक मिशाल है दो-दो केंदीय मंत्री का इस्तीफा, इन दलों को मेरी निजी सलाह है कि – एक चिंतन शिविर आहूत करें और राष्ट्र-हित के लिय क्षुद्रताओं से ऊपर उठ कर सोंचे. उम्मीद है कि ये दल भविष्य में अपने आचार, शील, अनुशासन, अभिव्यक्ति के मर्यादित शब्द और व्यवहार का परिचय अवश्य ही देंगे, ताकि प्यार और प्रगति की शीतल वयार वहती रहें.

    • MAHENDRA GUPTA says:

      ज्यादा भावुक मत होइए जनाब,ये कोई भी दूध के धुले नहीं.बड़ी मज़बूरी थी जो इस्तीफा देना पड़ा, जैसे य़ेड्डी को.सब अपने को आदर्श का पुतला बताते हैं,पर है कोई नहीं.हमाम में यह सब नंगे हैं.

  3. बहुत देर कर दी सनम आते आते.यह काम पहले भी हो सकता था.काश देश का जो पैसा हल्ले गुल्ले में बर्बाद हुआ वह न होता.जो सोनिया कल सुबह तक इस्तीफे के खिलाफ थी,शाम तक कैसे मान गयी.सब जानते हैं,कि कोंग्रेस में सोनिया कि इच्छा के खिलाफ पत्ता नहीं हिलता.सब को सोनिया राहुल कि आँख से डर लगता है, दस्त लगते हैं.पवन कुमार,अश्विनी कुमार या मनमोहनसिंह,कोई भी हो,इनके विरुद्ध नहीं जा सकता.संसद में गतिरोध होने पर सोनिया खुद कह चुकी थी कि कांग्रेसी भा ज पा का विरोध करें और तब ही सारे कांग्रेसी भोपूं सक्रिय हो गए थे.फिर एकाएक ऐसा क्या हो गया?
    सच तो यह है कि यह सब खेल सोनिया के दरबारियों व चापलूसों द्वारा रचित था.सोनिया के प्रभाव को दिखाने कि वह कितनी शक्तिशाली है,जो समय समय पर पार्टी व देश के लोगों ,को दिखाना जरूरी है,व मनमोहनसिंह कि छवि को बिगाड़ने का षड़यंत्र था, ताकि युवराज कि ताजपोशी के लिए मार्ग प्रशस्त किया जा सके.सुबह से मीडिया में यह न्यूज़ जान बूझ कर चलाई गयी कि,सोनिया हटाने के पक्ष में हैं,मनमोहनसिंह नहीं.ताकि बुरे मने तो मनमोहन सिंह,भली रहें सोनिया,भाई अगर ऐसा था तो सोनिया का पी एम,बंसल व अश्विनी को एक फ़ोन करना ही प्रयाप्त था.पर ऐसा नहीं किया गया,शाम को मीडिया में प्रचारित कर वह पी एम के घर गयी और फिर इस नाटक का समापन होना चालू हुआ.और प्रचार किया गया कि सोनिया व राहुल दोनों इस इस्तीफे के पक्ष में थे.पर मनमोहनसिंह अड़े हुए थे.क्या मनमोहन सिंह के इस्तीफे के लिए अब भी विपक्ष नहीं अड़ेगा?क्या संसद का समय फिर बर्बाद नहीं होगा?कांग्रस कि अंदरूनी राजनीती व टांग पूंछ खींचने कि आदत ने देश को बेवकूफ बनाने की कोशिश की.बाकी जनता अब सब समझती है.विपक्ष की तो गलती है ही,पर उसका यह काम है,लेकिन कोंग्रेस ने भी देश को कम नुक्सान नहीं पहुचाया.चमचों कि चोकड़ी ने अपने नेताओं को हीरो बनाने के लिए यह खेल खेला,और जनता शिकार हो गयी.

  4. mahendra gupta says:

    बहुत देर कर दी सनम आते आते.यह काम पहले भी हो सकता था.काश देश का जो पैसा हल्ले गुल्ले में बर्बाद हुआ वह न होता.जो सोनिया कल सुबह तक इस्तीफे के खिलाफ थी,शाम तक कैसे मान गयी.सब जानते हैं,कि कोंग्रेस में सोनिया कि इच्छा के खिलाफ पत्ता नहीं हिलता.सब को सोनिया राहुल कि आँख से डर लगता है, दस्त लगते हैं.पवन कुमार, अश्विनी कुमार या मनमोहनसिंह, कोई भी हो,इनके विरुद्ध नहीं जा सकता.संसद में गतिरोध होने पर सोनिया खुद कह चुकी थी कि कांग्रेसी भा ज पा का विरोध करें और तब ही सारे कांग्रेसी भोपूं सक्रिय हो गए थे.फिर एकाएक ऐसा क्या हो गया?
    सच तो यह है कि यह सब खेल सोनिया के दरबारियों व चापलूसों द्वारा रचित था.सोनिया के प्रभाव को दिखाने कि वह कितनी शक्तिशाली है,जो समय समय पर पार्टी व देश के लोगों को दिखाना जरूरी है व मनमोहनसिंह कि छवि को बिगाड़ने का षड़यंत्र था, ताकि युवराज कि ताजपोशी के लिए मार्ग प्रशस्त किया जा सके.सुबह से मीडिया में यह न्यूज़ जान बूझ कर चलाई गयी कि सोनिया हटाने के पक्ष में हैं, मनमोहनसिंह नहीं. ताकि बुरे मने तो मनमोहन सिंह, भली रहें सोनिया. भाई अगर ऐसा था तो सोनिया का पी एम,बंसल व अश्विनी को एक फ़ोन करना ही प्रयाप्त था.पर ऐसा नहीं किया गया,शाम को मीडिया में प्रचारित कर वह पी एम के घर गयी और फिर इस नाटक का समापन होना चालू हुआ.और प्रचार किया गया कि सोनिया व राहुल दोनों इस इस्तीफे के पक्ष में थे.पर मनमोहनसिंह अड़े हुए थे.क्या मनमोहन सिंह के इस्तीफे के लिए अब भी विपक्ष नहीं अड़ेगा ?क्या संसद का समय फिर बर्बाद नहीं होगा?कांग्रस कि अंदरूनी राजनीती व टांग पूंछ खींचने कि आदत ने देश को बेवकूफ बनाने की कोशिश की.बाकी जनता अब सब समझती है.विपक्ष की तो गलती है ही,पर उसका यह काम है,लेकिन कोंग्रेस ने भी देश को कम नुक्सान नहीं पहुचाया.?चमचों कि चोकड़ी ने अपने नेताओं को हीरो बनाने के लिए यह खेल खेला,और जनता शिकार हो गयी.

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