/तहलका के तरुण तेजपाल को राजीव थेपरा का ख़त

तहलका के तरुण तेजपाल को राजीव थेपरा का ख़त

राजीव थेपरा ने इस पत्र में कुछ ऐसे सवालिया निशान खड़े किये हैं जिन्हें आसानी से नकारा नहीं जा सकता.. 

प्रिय तरुण जी,राम-राम,

“तहलका’में प्रकाशित बच्चों के अपराधी बन जाने की कथा पढ़ी और तब से, बल्कि रिपोर्ट पढ़े जाते समय से ही मन बहुत खराब है और कुछ ज्यादा ही खराब है तथा यह सोच कर और भी ज्यादा खराब है कि मैंने फिर भी अपना व्यापार ही करना है और बहुत चाह कर भी अन्दर से एकदम पीड़ित होने के बावजूद भी इस या ऐसी बहुतेरी दिशाओं में सिवाय रोष प्रकट करने या कुछ लिख-लाख कर कहीं छप-छपा जाने के आलावा कुछ नहीं कर पाना है !!और दरअसल हमारी तमाम समस्याएँ कहीं-ना-कहीं यहीं शुरू होती हैं और बस शुरू होकर रह जाती हैं,ख़त्म कभी नहीं होती,कि हम बहुत सारे लोग ऐसी रिपोर्ट बना कर छप-छपा जाकर खुद अपनी पीठ थप-थपा कर निश्चिन्त हो जाते हैं, आगे कुछ नहीं कर पाते,याकि इससे आगे बढ़ने या किसी के लिए कुछ कर पाने के प्रयत्नों के प्रति हमारी कोई सदिच्छा नहीं दिखाई पड़ती और भला ऐसा क्योंकर हो,हमारे अनुसार हमारा जो काम है वो हम कर रहे हैं याकि हमारा जो काम है वो हमने कर ही दिया है अब आगे जिसका काम है वो जाने ना !!tarun-tejpal

प्रिय तरूण जी, समाज में घट रही हरेक घटना पर बुरी तरह तिलमिलाता हूँ,कसमसाता हूँ और मैं ही नहीं अन्य बहुतेरे लोग भी,शायद आप भी….सीने में दर्द उठता तो बहुत है….मगर इतना भयानक नहीं कि हम उसके ईलाज को तत्पर हो सकें….क्योंकि हमें ऐसा लगता है कि यह काम हमारा नहीं बल्कि किसी और का है,याकि यह समस्या हमारी नहीं बल्कि किसी और की है,कि हम उखाड़ ही क्या लेंगे !!कुल मिलाकर मैं कहना यह चाहता हूँ कि हमारा उद्वेलन हमें इस हद तक झकझोर नहीं पाता कि हम एकदम से समाज की ऐसी बहुत-सी बुराईयों को समूल नष्ट कर देने का संकल्प कर सकें अथवा जोखिम उठा सकें !! हम ऐसी बुराईयों की रिपोर्ट बनाते हैं, कुछ पन्ने रंगीन या काले करते हैं….कोई डॉक्युमेंट्री बनाते हैं या ऐसा ही कुछ करते हैं और कुछ समय तक मीडिया में छाकर बैक टू पवेलियन हो जाते हैं, बिना यह जानने की चेष्टा किये कि उसके बाद आखिर क्या हुआ, आखिर हुआ क्या उसके बाद !!
सिस्टम गड़बड़ है यह तो ठीक है, हम विरोध कर रहे हैं, यह भी ठीक है मगर अपने ही द्वारा जिए जा रहे जीवन में हम सिस्टम को बनाए रखने में क्या प्रयास करते हैं, पल-पल हम जो जीते हैं, घर में बाहर में, दफ्तर में, व्यापार में, क्या कसौटियां हैं हमारी, हमारे अपने जीवन के लिए !! जिस किसी भी तरह का समाज हम अपने लिए चाहते रहें हैं, उसको पाने या बनाने का कौन-सा सद्प्रयास हम करतें हैं या करने की सोचते हैं !!
प्रिय तरुण जी, विषयांतर तो नहीं करना चाहता मगर समाज की प्रत्येक घटना के भीतरी तार दरअसल इस तरह आपस में गुत्थमगुत्था हैं कि किसी भी बात की अलग से चर्चा हो ही नहीं सकती, जब होगी तब पूरे समाज की ही होगी, इस तरह हमारी अपनी भी होगी और यह आपको शायद बड़ा भयानक लगे कि हर ऐसी बुराई में हम-आप और सब शामिल हैं,तरुण !!शामिल ही हैं !!
मैंने देखा है तरुण हर बार, कि हमारे पास कोई मदद मांगने आता है तो हमारे दिमाग में आदमी की तमाम कारस्तानियों और उसके द्वारा की जाती तमाम धोखेबाजियों का समस्त इतिहास एक पूर्वाग्रह के रूप में अमिट रूप से छाया हुआ होता है और हम ज्यादातर अपनी औकात के बनिस्पत बहुत छोटी-सी मदद भी करने से इनकार कर देते हैं, बिना यह सोचे कि अब इसके बाद मदद मांगने वाला कहाँ जाएगा या क्या करेगा, हम यह भी जान या सोच नहीं पाते कि उसके बाद वो कहाँ गया कि उसका क्या हुआ !! और तरुण जरा कल्पना करो कि क्या-क्या हो सकना संभव है उसके बाद मैं यह फेहरिस्त उजागर नहीं करना चाहता !!
बच्चे समाज की धरोहर हैं यार !! उनसे कुकर्म करना तो भयानक है ही, उन्हें इस तरह अपराध में धकेलना और भी भयानक है और ऐसा करने वाले तमाम हरामजादों को उसी अनुपात में दंड दिया जाना अपेक्षित है, अनिवार्य है मगर तरुण, हम जो हरामी नहीं हैं याकि सभ्य-सुसंस्कृत हैं, उनमें से कितनों का व्यवहार हमारे सुसंस्कृत होने के उसी अनुपात में है, कि जिस अनुपात में अपने समाज में हम अभिजात्य हैं ?? बेघर-लावारिस बच्चों का, गरीब लोगों के बच्चों के लिए हम कब-क्या और कितना करने को अग्रसर होते हैं ?? और तो और,ऐसे बेसहारा बच्चों को हाड़-तोड़ मेहनत लेकर कौन सी उचित कीमत या समुचित व्यवहार करते हैं !!
तरुण, हमारे चारों और बहुत कुछ माकूल और मुकम्मल नहीं है, मगर उसमें से बहुत सारा कुछ हमारी चन्द कोशिशों और हमारे औकात के बनिस्पत बहुत कम मदद से बदल सकता है, ठीक हो सकता है और इस प्रकार चंद नेक कार्य (हा-हा-हा-हा !!अपने जरुरी और अनिवार्य अच्छे कार्यों को नेक कार्य के रूप में प्रचारित कर अपनी पीठ थपथपाना भी मेरे लेके आदमी की भयानक दुष्टताओं में से एक है,शायद आदमी यही सब करने को अभिशप्त है कि साला जहां भी मौक़ा मिले-बटोर लो श्रेय !!)चंद लोगों की मदद ही नहीं कर सकते बल्कि समाज की भरोसे की दीवार को फिर से मजबूत कर सकते हैं,कमजोर तबकों को बड़े भाई-सा आसरा दे सकते हैं, मगर मेरे भाई, मैं यह सब किससे और क्यों कह रहा हूँ ?? जहां समूचा समाज चंद रुपयों के लिए अपने भाई-बंधू और किसी की भी गर्दन काटने को तत्पर है, अग्रसर है और मजा यह कि फिर भी सभी शालीन हैं-अभिजात्य है और समाज की नज़र में भी “महाजन”!!
लिखना तो बहुत कुछ चाहता हूँ और लिखूंगा भी,मगर अभी तो बस इतना ही और कि बहुत-सी छोटी-छोटी बातें अगर हम कर लें तो बहुत से बड़े-बड़े काम हो सकते हैं,किस तरह ??….इस तरह की आदमियत का एक पूरा खाका मेरे दिमाग में है !!राज्य-प्रशासन और देश का भी…मगर ऐसा है कि मेरे जैसे बावलों की भी कोई कमी नहीं इस धरती, सो मेरे इस बयान को भी एक बावले का बयान समझ कर विस्मृत कर देना,उपेक्षित कर देना, क्योंकि शायद यही नियति हो !

सादर,

राजीव थेपरा

(फेसबुक पर श्री राजीव थेपरा की वॉल से)

तहलका पर मासूम गिरोहों की दिल्ली

 

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.