/हाईटैक लडाई में गहलोत को पछाड़ वसुन्धरा आगे

हाईटैक लडाई में गहलोत को पछाड़ वसुन्धरा आगे

-धीरज कुलश्रेष्ठ||

भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे के अनशन में सोशल मीडिया की सक्रिय भूमिका ने न केवल सबको चौंका दिया बल्कि सभी को इस मीडिया की ताकत को स्वीकारने पर भी मजबूर कर दिया है. उसके बाद नरेन्द्र मोदी ने गुजरात चुनाव में सोशल मीडिया के साथ वेब की हाईटैक तकनीक का सफल इस्तमाल करके, एक तरह से वेब की पहुंच, पकड और ताकत पर मोहर लगा दी.Suraj_Sankalp_Yatra_BJP_Rajasthan_raje

इसी का परिणाम है कि कांग्रेस और भाजपा सहित सभी पार्टियों ने सोशल मीडिया का उपयोग करने के लिए अलग से प्रकोष्ठ बना लिए हैं और इसके लिए मार्केटिंग कम्पनियों की सेवाएं भी ले रहीं हैं. अपना पक्ष रख रखने, विरोधी पक्ष की काट करने तथा उस पर प्रहार करने के लिए यथासंभव इसके उपयोग पर जोर दिया जा रहा है.

वैसे सबसे पहले लालकृष्ण आडवानी ने इसकी ताकत को भांप लिया था और पिछले लोकसभा चुनावों में उन्होंने अपने चुनावी अभियान की शुरुआत ही गूगल पर विज्ञापन के साथ की थी. उनकी यह कोशिश युवाओं को आकर्षित करने में तो सफल रही लेकिन उन्हें वोटों में नहीं बदल सकी.

गुजरात में नरेन्द्र मोदी ने एक कदम आगे बढकर सोशल मीडिया के साथ-साथ हाईटैक तकनीक का इस्तेमाल कर सबका ध्यान आकर्षित कर इस अभियान में नए आयाम जोड दिए हैं.उन्होंने इन्टरनेट की तकनीक का इस्तेमाल कर इस अभियान में नए आयाम जोड दिए हैं, उन्होंने इंटरनेट की तकनीक को हथियार की तरह इस्तेमाल करके अपने प्रचार अभियान को न केवल ग्लैमर प्रदान किया मार्केटिंग एजेन्सियों की मदद से उसे मल्टीप्लाई करके भी दिखा दिया.उन्होंने पहले लाइव वेबकास्ट [हैंगआउट] तकनीक का इस्तेमाल कर सोशल मीडिया से जुडे वर्ग तक अपनी पहुंच बनाई, फिर थ्री डी होलोग्राफिक तकनीक का उपयोग कर एक साथ अनेक स्थानों पर आमसभाओं को सम्बोधित कर नया ग्लैमर भी पैदा किया. उनके इस अभियान ने देश भर के राजनेताओं के सामने प्रचार का नया मार्ग खोल दिया है.

जहां तक राजस्थान की राजनीति का सवाल है, वसुन्धरा राजे शुरु से ही हाईटैक तकनीक से जुडी रहीं हैं. वे प्रधानमंत्री कार्यालय में मंत्री के तौर पर इस तकनीक से जुड गईं थीं. राजस्थान में भाजपा की प्रदेशाध्यक्ष बनते ही उन्होंने मार्केटिंग कम्पनी की मदद से सफलतापूर्वक मनचाहे परिणाम हासिल करके दिखाए. वे देश की लैपटाप यूजर दूसरी मुख्यमंत्री थीं,जो फाइल और रिपोर्ट देखने की बजाए सीडी प्रजेन्टेशन देखना पसन्द करतीं थीं और अपने लैपटाप पर पुराने प्रजेन्टेशन से तुलना कर तुरंत लफ्फाजी करने वाले अफसरों की क्लास ले लेती थीं. इस बार भी वह हाईटैक तकनीक का इस्तेमाल में

cp-joshi

वह सबसे आगे हैं.उन्होंने पूरे चार साल बाद अपनी सक्रिय वापसी के साथ ही तकनीक और उसकी ताकत का भी इस्तेमाल कर रही हैं. उन्होंने फेसबुक पर कई एकाउन्ट खोलकर अपने अभियान की शुरुआत की. ये एकाउन्ट मुख्य रुप से प्रशंसकों को जोडने के लिए हैं,जो उनकी गतिविधियों की जानकारी यूजर्स को देते रहते हैं.इनमें से एक एकाउन्ट तो वसुन्धरा राजे नेक्स्ट सीएम के नाम से है, जो उनकी महत्वाकांक्षा को सीधे दिखाता है. वहीं उनके नाम से मार्केटिंग कम्पनियों ने पेज और ग्रुप भी बना रखे हैं. वैसे केन्द्रीय मंत्री डा सी पी जोशी कांग्रेस खेमे में तकनीक का उपयोग करने में सबसे आगे हैं.वे अपने प्रशंसकों तक पहुंचने के लिए न केवल फेसबुक का ही उपयोग कर रहे हैं बल्कि उनसे सीधे संवाद कायम करने वाले प्रदेश के पहले नेता हैं.वे गूगल हैंगआउट की मदद से अब तक दो बार सार्वजनिक संवाद कर चुके हैं.इसके बाद तकनीक के उपयोग में घनश्याम तिवाडी सबसे आगे नजर आते हैं.वे अने फेसबुक अकाउन्ट,पेज और ग्रुप के साथ साथ अपने सविनय अवज्ञा आन्दोलन का प्रचार भी कर रहे हैं. राजस्थान भर के फेसबुक यूजर को उनका विज्ञापन नजर आता है-दिल से-रार नहीं ठानूंगा-हार नहीं मानूंगा.बना रखे हैं. लेकिन वसुन्धरा यहीं नहीं रुकीं. उन्होंने अपनी सुराज संकल्प  यात्रा की वेबसाइट भी बनवाई है जो न केवल उनके पूरे कार्यक्रम की जानकारी देती है बल्कि उनके कार्यक्रम की हर दस मिनट बाद अपडेट खबर देने के साथसाथ उनके भाषण का ताजा वीडियो भी दिखाती है. यही नहीं मोबाइल धारकों तक अपने ताजा अपडेट पहुंचाने के लिए उन्होंने वसुन्धरा राजे एप्प भी जारी किया है. सूत्रों के अनुसार वसुन्धरा राजे ने अपने प्रचार की जिम्मेदारी उसी कम्पनी को सौंपी है जिसने गुजरात में नरेन्द्र मोदी के प्रचार का काम संभाला था.इसका मतलब यह है कि वह चुनाव में भी थ्री डी होलोग्राफी तकनीक का इस्तमाल करके एक साथ कई चुनाव सभाओं को सम्बोधित करने की तैयारी भी कर चुकीं हैं.वे जिस गाडी में सवार हो कर यात्रा पर निकलीं हैं वह भी तमाम हाईटैक सुविधाओं से युक्त है.उसमें पांच सितारा सुविधाएं हैं.

वैसे मुख्यमंत्री अशोक गहलोत भी तकनीक के उपयोग से नहीं चूके हैं. फेसबुक पर उनके भी कई अकाउन्ट,पेज और ग्रुप चल रहे हैं, जो मुख्यमंत्री कार्यालय से संचालित किए जाते हैं. देश की मशहूर एजेन्सी एएनआई के पास उनके कार्यक्रमों की वीडियो कवरेज अनुबंध है तो प्रिंट मीडिया के लिए जनसम्पर्क निदेशालय हाजिर है ही. लाइव कवरेज के लिए ई टीवी सहित अन्य चैनलों की सेवाएं ली जा रहीं हैं. वसुन्धरा की तर्ज पर उन्होंने भी अशोक गहलोत एप्प भी जारी कर दिया है. हां –इन्टरनेट यूजर को एक्सिस करने के लिए व्यक्तिगत वेबसाइट और लाइव वेबकास्टिंग के मामले में फिलहाल वे पीछे हैं. लेकिन यह माना जा रहा है कि जादूगर मुख्यमंत्री अपने पिटारे से ऐन मौके पर सामान निकाल कर लोगों को चौंकाने में माहिर हैं.ashok-gehlot-facebook

वैसे इस समय तो सभी नेताओं में मीडिया के ज्यादा से ज्यादा इस्तमाल की होड लगी हुई है.बीना काक अपने विभाग के विज्ञापनों के सहारे सारे चैनलों पर छाई हुई हैं,तो श्रम मंत्री मांगीलाल गरासिया और आवासन मंडल के अध्यक्ष परसराम मोरदिया भी पीछे नहीं हैं. इसी तरह फेसबुक का इस्तमाल करने से कोई भी राजनेता चूकना नहीं चाहता.इनमें तीसरे मोर्चे के लिए सक्रिय डा किरोडी लाल मीणा हो या कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष डा चन्द्रभान. विधानसभा अध्यक्ष दीपेन्द्र सिंह शेखावत,ऊर्जा मंत्री डा जितेन्द्र सिंह,उद्योग मंत्री राजेन्द्र पारीक,पूर्व भाजपा अध्यक्ष अरुण चतुर्वेदी सहित लगभग सभी बडे नेता अपने प्रशंसकों तक अपनी बात पहुंचाने के लिए फेसबुक पर मौजूद हैं और उनके प्रशंसक उनके समर्थन में सक्रिय हैं.

हाईटैक तकनीक और सोशल मीडिया की ताकत को स्वीकार करते हुए सभी चुनावाकांक्षी इसका उपयोग कर रहे हैं और एक बात तय है कि जैसे-जैसे चुनाव आएंगे यह इस्तेमाल और भी सघन होता जाएगा.लेकिन इसका सबसे ज्यादा फायदा उसे ही मिलेगा,जो इस तकनीक का बेहतर इस्तेमाल करेंगा.

(धीरज कुलश्रेष्ठ वरिष्ठ पत्रकार हैं. इनसे [email protected] पर संपर्क किया जा सकता है) 

Facebook Comments

संबंधित खबरें:

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.