/खुदीराम बोस के बहाने जरा एक नज़र छह साल की उम्र में स्वतंत्रता सेनानी बनने वालों पर

खुदीराम बोस के बहाने जरा एक नज़र छह साल की उम्र में स्वतंत्रता सेनानी बनने वालों पर

 

– शिवनाथ झा ।।

इसे किसी भी हालत में विधि का विधान नहीं कहा जा सकता है। यह ‘ संवेदनहीन’ समाज के लोगों, अधिकारियों और शासन तंत्र में जुड़े लोगों द्वारा रचित विधान है। जिसकी सुविधा ’विवेकहीन लोग’ स्वतंत्रता सेनानी बनकर भारत सरकार द्वारा अनुदानित सुविधा का लाभ उठा रहे है। आप को यह जानकर बहुत ही आश्चर्य होगा कि देश में सत्तर वर्ष से कम आयु के लोग भी स्वतंत्रता सेनानियों की सूची में शामिल है। इसका अर्थ यह हुआ कि आजादी के वक्त 1947 में उनकी उम्र छह साल या उससे भी कम रही होगी। खास बात यह है कि सूची में शामिल लोग सरकार द्वारा दी जा रही धनराशि का प्रत्येक माह लाभ भी उठा रहे हैं।

खुदीराम बोस का एक दुर्लभ चित्र

बहरहाल, वह दिन दूर नहीं है जब गृह मंत्रालय शीघ्र ही पूरे देश में स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की सूची की जांच केंद्रीय स्तर पर करने जा रही है। जिससे कि अनापेक्षित खर्च होने वाली राशियों में कटौती की जाय। इसके साथ ही यह भी पड़ताल होगी कि किस अधिकारी या शासन के दौरान संबंधित स्वतंत्रता सेनानियों कि अर्जी को अनुशंषित कर केंद्र को भेजा गया था।

गृह मंत्रालय के वर्तमान आंकड़ों पर नज़र डालें तो, सम्पूर्ण भारत में कुल एक लाख सत्तर हजार पांच सौ पैंतालिस स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पेंशन का लाभ उठा रहे हैं। जिसमें सर्वाधिक संख्या बिहार की है, यहां चौबीस हज़ार आठ सौ बहत्तर सेनानी पेंशन पा रहे हैं। हैरत वाली बात तो यह है कि सैकड़ों की संख्या में ऐसे लोगों का नाम दर्ज है, जिनकी आयु सत्तर वर्ष से कम है। भारत सरकार प्रत्येक माह कुल एक अरब, तिरान्यवे करोड़, चौबीस लाख, पैंतालीस हज़ार तीन सौ पंचान्यवे रुपये इस मद पर खर्च करती है।

गृह मंत्रालय एक अधिकारी का कहना है कि जिस व्यक्ति की आयु आज के अनुसार सत्तर वर्ष है। स्वाभाविक है कि 15 अगस्त 1947 को उसकी आयु छह वर्ष से अधिक नहीं रही होगी। ऐसे में छह वर्ष के बच्चे से क्या अंदाजा लगाया जा सकता है। जब उसने यह पूछा गया कि यह स्थिति सिर्फ बिहार की है या अन्य राज्यों की। इस जवाब देते हुए उन्होंने बताया कि भारत सरकार या गृह मंत्रालय वैसे कानूनी तौर पर इसका निरीक्षण करती रहती है। लेकिन किसी ने पेंशनधारी के उम्र पर कभी ख्याल नहीं किया। बिहार के अतिरिक्त अन्य राज्य जैसे आंध्र प्रदेश, जम्मू कश्मीर, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल में भी अनियमितताएं देखने को मिली है।

देश की राजधानी भी इससे अछूती नहीं है। लेकिन जब तक सम्पूर्ण रूप से इसकी जांच पड़ताल नहीं की जाएगी, तब तक इस विषय पर कोई टिप्पणी नहीं की जा सकती है। वैसे भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में बिहार की भूमिका अग्रणी है, चाहे वह 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम हो या फिर महात्मा गांधी की चंपारण यात्रा। चंपारण यात्रा में ही महात्मा गांधी को बापू की उपाधि से अलंकृत किया गया था। लेकिन यह सवाल जनमानस में कौंध रहा है कि सत्तर वर्ष की आयु के लोग भी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पेंशन की सुविधा का लाभ कैसे उठा रहे है?

आज ग्यारह अगस्त को ही महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी खुदीराम बोस को मुजफ्फरपुर जेल में ग्यारह अगस्त 1908 को फांसी पर लटकाया गया था। खुदीराम बोस को बिहार का नहीं माना जा सकता है, क्योंकि वे बगांल के मिदनापुर क्षेत्र के रहने वाले थे और मुजफ्फरपुर अपने साथी के साथ एक मिशन पर आये हुए थे। खुदीराम बोस के अतिरिक्त, मुजफ्फरपुर के शुक्ल परिवार के ही दो लोग चाचा और भतीजा बैकुंठ शुक्ल को फांसी लगी थी। जबकि साथ ही स्कूली बच्चे 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में पटना सचिवालय के पास अंग्रेजों के गोली के शिकार हुए थे।

गृह मंत्रालय के आंकड़े के अनुसार आंध्र प्रदेश में 14 हजार छह सौ पैंतालीस, अरुणाचल प्रदेश में शून्य, असम में 4 हजार चार सौ अड़तीस, बिहार व झारखंड में 24 हजार आठ सौ चौहत्तर, गोवा में 1 हजार चार सौ पंद्रह, गुजरात में 3 हजार पांच सौ अनठानबे, हरियाणा में 1 हजार छह सौ सतासी, हिमाचल प्रदेश में छह सौ चौबीस, जम्मू कश्मीर में 1 हजार आठ सौ सात, कर्नाटक में 10 हजार अठासी, केरला में 3 हजार दो सौ पंचान्यवे, मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ में तीन हजार चौ सौ एकहत्तर, महाराष्ट्र में सत्रह हजार आठ सौ अठाइस, मणिपुर में बासठ, मेघालय में छियासी, मिजोरम में चार, नागालैंड में तीन, ओडिशा में 4 हजार एक सौ नब्बे, पंजाब में 7 हजार सोलह, राजस्थान में आठ सौ बारह, सिक्किम में शून्य, तमिलनाडु में 4 हजार एक सौ आठ, त्रिपुरा में आठ सौ सतासी, उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड में 17 हजार नौ सौ तिरान्यवे, पश्चिम बगांल में 22 हजार चौ सौ सतासी, अंडमान व निकोबार दीप समूह में तीन, चंडीगढ़ में इकान्यवे, दादर व नागर हवेली में तिरासी, दमन व दीव में तैतीस, दिल्ली में 2 हजार चौवालीस, पुडुचेरी में तीन सौ सत्रह और आईएनए में बाइस में चार सौ अड़सठ लोग भारत सरकार के इस योजना का लाभ उठा रहे हैं।

अधिकारी का कहना है कि कुल 1 लाख 70 हज़ार 545 स्वंतत्रता सेनानियों पर (1857-1947) पर प्रत्येक माह 1 अरब, 93 करोड़, 24 लाख, 45 हज़ार 395 रुपये खर्च किए जाते हैं। बहरहाल, यह वक्त ही बताएगा कि सरकार की दिशा किस ओर उन्मुख होती है।

(लेखक शिवनाथ झा बहुचर्चित पत्रकार हैं, जिन्होंने स्वतंत्रता सेनानियों के बदहाली में जी रहे वंशजों को ढूंढ निकालने और उनके कल्याण के लिए एक राष्ट्रव्यापी मुहिम चला रखी है।)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.